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मनरेगा : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 17 करोड़ 85 लाख रुपये का भुगतान पेंडिंग

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Ranchi : मनरेगा योजना में कार्य करनेवाले मजदूरों की मजदूरी के भुगतान में होनेवाली देरी को लेकर 18 मई को सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश आया था. स्वराज अभियान की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि केंद्र सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) की मजदूरी और मुआवजे का समय पर भुगतान सुनिश्चित करे. लेकिन, अभी तक ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस मुद्दे पर केवल एक बैठक ही की है, जबकि कोर्ट ने मजदूरी भुगतान को लेकर ठोस कार्ययोजना पर दो महीने में अमल करने का आदेश दिया था. अब दो महीने पूरे हो चुके हैं और अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठया गया है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद पिछले पांच दिनों में झारखंड के मनरेगा मजदूरों की मजदूरी समेत मनरेगा योजना मद में 17 करोड़ 85 लाख रुपये का भुगतान आज भी पेंडिंग है. मजदूरों की मजदूरी के साथ मनरेगा योजना मद में 13 जुलाई के बाद से भुगतान नहीं किया गया है, जबकि केंद्र से इस मद में राज्य को राशि उपल्बध करा दी गयी है.

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यह है भुगतान की प्रक्रिया

वर्तमान समय में मनरेगा मजदूरों को काम करने के 15 दिनों के अंदर अपनी मजदूरी मिलनी है. भुगतान में देरी होने पर वे मुआवजे के हकदार बनते हैं. मजदूरी भुगतान की प्रक्रिया में दो चरण हैं. पहले चरण में वे सब प्रक्रियाएं आती हैं, जो राज्य में होनी हैं, जैसे मजदूरों की कार्यस्थल पर उपस्थिति की एमआईएस में एंट्री, काम की मापी, वेतन सूची का सृजन, फंड ट्रांसफर ऑर्डर (एफटीओ) का सृजन और एफटीओ को पहले और दूसरे हस्ताक्षरी द्वारा स्वीकृति दी जाती है. इसके बाद दूसरे चरण में मंत्रालय द्वारा फंड रिलीज आदेश बनाना है. इसके बाद केंद्र द्वारा राज्य के खाते में राशि हस्तांतरित होती है और इसके बाद मजदूर के खाते में मजदूरी हस्तांतरित की जाती है. मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, एफटीओ मस्टर रोल बंद होने की तारीख के आठ दिनों के अंदर द्वितीय हस्ताक्षरी द्वारा स्वीकृति हो जानी चाहिए, लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हो पा रहा है. इससे द्वितीय चरण की प्रक्रियाओं के पूरा होने में देरी होती है और मजदूरों को समय पर मजदूरी नहीं मिल पाती है.

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द्वितीय चरण की प्रक्रियाओं में लम्बे विलम्ब

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स्वराज अभियान की जनहित याचिका ने सरकार को यह मानने के लिए मजबूर किया कि जो वह ससमय मजदूरी भुगतान की दर बता रही थी, वह वास्तव में केवल ससमय द्वितीय हस्ताक्षरी द्वारा एफटीओ स्वीकृत होने का ही समय है. याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार द्वारा कोर्ट को दिये गये दस्तावेजों के अनुसार 2016-17 में केवल 17% द्वितीय चरण की प्रक्रियाएं समय पर हुईं और 2017-18 में केवल 43%.

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मुआवजा मिलने में भी पेंच

वर्तमान समय में सिर्फ मजदूरी भुगतान में पहले चरण में हुए विलंब के लिए ही मजदूरों को मुआवजा मिलता है. और तो और, कार्यक्रम अधिकारियों को यह मुआवजा अस्वीकार करने का अधिकार मिला हुआ है. इस छूट के कारण 2013-14 से 2017-18 तक गणित मुआवजे का केवल 4% ही स्वीकार हुआ है. स्वीकृत मुआवजा राशि के भी 61% का ही वास्तव में मजदूरों को भुगतान हुआ है. कई मजदूरों को तो उनकी मजदूरी मिलती ही नहीं है. इसके कई कारणों में से एक है एफटीओ ट्रांजैक्शन का रिजेक्ट हो जाना. पिछले वित्तीय वर्ष में देशभर के 2.4% एफटीओ ट्रांजैक्शन रिजेक्ट हुए हैं.

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