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मिशन ओलंपिक : कोच, साइकोलॉजिस्ट व मोटिवेटर की कमी से झारखंड की राह नहीं है आसान

Ranchi : हर खिलाड़ी का सबसे बड़ा सपना ओलंपिक में शामिल होना होता है. झारखंड सरकार यहां के खिलाड़ियों के इस सपने को पूरा किये की दिशा में पहल कर रही है. झारखंड स्पोटर्स प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएसपीएस) के जरिये 437 खिलाड़ियों को मिशन ओलंपिक के लिए तैयार किया जा रहा है.

सरकार की मंशा राज्य में सिल्वानुस डूंगडूंग, मनोहर टोपनो जैसे खिलाड़ियों की नयी पौध खड़ा करने की है. पर जेएसएसपीएस की तैयारी कुछ मायने में कमजोर नजर आती है. कोच, साइकोलॉजिस्ट, मोटिवेटर की कमी, प्लेयर्स के लिए पर्सनल इक्विपमेंट्स और दूसरे पहलुओं को दुरुस्त किये बिना मिशन ओलंपिक की डगर मुश्किल दिखाई दे रही है.

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कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी से कोचों में बेरुखी

जेएसएसपीएस की ओर से बच्चों को 10 खेलों की ट्रेनिंग दी जाती है. ये हैं- एथलेटिक्स, आर्चरी, ताइक्वांडो, बॉक्सिंग, साइक्लिंग, वेट लिफ्टिंग़, कुश्ती, स्विमिंग, फुटबॉल और शूटिंग. इन खेलों में ट्रेनिंग के लिए चीफ कोच, कोच और असिस्टेंट कोच 3 सालों के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर रखे जाते हैं. पर ये नौकरी कइयों को रास नहीं आती. यही कारण है कि 2016 से अब तक अलग-अलग खेलों में 6 कोचों ने कहीं और की राह पकड़ ली. इनमें एथलेटिक्स, आर्चरी के 2-2 और ताइक्वांडो तथा अन्य खेलों के 1-1 चीफ कोच शामिल हैं. ऐसे में असिस्टेंट कोच के भरोसे ही बच्चों को मिशन ओलंपिक की तैयारी करनी पड़ती है. हालांकि असिस्टेंट कोच भी बाहर निकलने का मौका तलाशते रहते हैं, खास कर जिनके सामने उम्र पड़ी है. बार-बार अच्छे कोचों के छोड़ कर जाने से ट्रेनिंग क्वालिटी पर असर पड़ता है. जेएसएसपीएस को भी बार-बार नया विज्ञापन जारी कर कोचों को बुलाना पड़ रहा है. पिछले साल (2019)अगस्त-सितंबर में तीसरी बार विज्ञापन जारी किया गया है जिसके लिए नियुक्ति प्रक्रिया प्रोसेस में है.

मोटिवेटर और साइकोलॉजिस्ट की कमी

मिशन ओलंपिक के सपने को साकार करने को जेएसएसपीएस अभी 437 बच्चों को रेसिडेंसियल ट्रेनिंग दे रहा है. सेलेक्टेड बच्चे किस खेल में बेहतर कर सकेंगे और उन्हें ओलंपिक के हिसाब से कैसे मोटिवेट किया जाये, इसके लिए मोटिवेटर और साइकोलॉजिस्ट की कमी है. इसी तरह प्लेयर्स के लिए पर्सनल इक्विपमेंट का अभाव है और इससे खेल प्रैक्टिस पर असर पड़ता है.

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एडमिनिस्ट्रेशन में बार-बार प्रयोग

जेएसएसपीएस में एडमिनिस्ट्रेटिव लेवल पर बार-बार बदलाव भी समस्या है. साल भर होते-होते दूसरा सीइओ (मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी) आ जाता है. पिछले 5 सालों के भीतर 4 सीइओ बदले जा चुके हैं. विक्रांत मल्हान, आलोक कुमार, के पांडेय और अब वी चौधरी. खेल विशेषज्ञों के अनुसार मिशन ओलंपिक के हिसाब से अगले 10-15 सालों के हिसाब से योजना बनाये जाने की जरूरत है. ऐसे में एक सीइओ को रेगुलर बनाये रखना जरूरी है. ऐसे में इन सबके चलते मिशन ओलंपिक 2029-30 या आगे की राह आसान नहीं.

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