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हाइकोर्ट भवन निर्माण पर मंत्री ने सदन में कहा- तीन महीने में जांच पूरी कर दोषियों पर होगी कार्रवाई

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Ranchi: झारखंड के नए हाइकोर्ट भवन निर्माण में अनियमितता को लेकर सदन में हंगामे के बीच प्रभारी मंत्री सीपी सिंह ने निरसा विधायक अरूप चटर्जी के सवाल का जवाब दिया. उन्होंने प्रश्न काल में पूछे गए एकमात्र सवाल का जवाब दिया. अरूप चटर्जी ने प्रभारी मंत्री से सवाल किया कि क्या सच में हाइकोर्ट भवन निर्माण करने में एस्टीमेट बढ़ाने में अनियमितता हुई है. इस पर सीपी सिंह ने कहा कि विभाग की तरफ से विधायक के सवालों का जवाब बिंदुवार दे दिया गया है. कहा कि कागज में जिन सवालों का जवाब दे दिया गया है, उसके अलावा कोई सवाल हो तो विधायक पूछें. इसपर अरूप चटर्जी ने कहा कि जवाब में कहा गया है कि अभियंताओं की एक समिति अब मामले की जांच कर रही है, तो बताया जाए कि समिति कितने दिनों में जांच पूरी कर लेगी और दोषियों पर कार्रवाई कबतक होगी. इसपर प्रभारी मंत्री ने साफ कहा कि तीन महीने के अंदर जांच पूरी कर ली जाएगी और दोषियों की पहचान कर उनपर कार्रवाई हो जाएगी.

विभाग ने माना कि हुई है अनियमितता

सवालः निरसा विधायक अरूप चटर्जी ने विभाग से सवाल किया कि क्या यह बात सही है कि राज्य में निर्माणाधीन हाइकोर्ट भवन के प्रशासनिक स्वीकृति 366 करोड़ के विरुद्ध पुनरीक्षित तकनीकी स्वीकृति 697 करोड़ पर किया गया है?

जवाबः विभाग ने इस बात को स्वीकारा है और इसके बदले जवाब में कहा है कि योजना पर क्रियान्वयन के दौरान प्राप्त उच्च स्तरीय निर्देश तथा भवन को पूरा करने के लिए कई प्रकार के काम किए गए जिसमें इंटरनल रोड एंड लैंडस्केपिंग, गेस्ट हाउस, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, वाईफाई कैंपस, इलेक्ट्रिफिकेशन डिस्पेंसरी, वॉच टावर, बैरक और इंटीरियर काम के लिए आवश्यकता के कारण ही पीडब्ल्यूडी कोड के नियमों के तहत प्राक्कलन की स्वीकृति का प्रस्ताव दिया गया है.

सवालः क्या यह बात सही है कि पांच सीनियर आइएएस जिनकी अध्यक्षता विकास आयुक्त कर रहे थे, उनकी जांच रिपोर्ट में अनियमितता की बात सामने आयी है?

जवाबः विभाग ने इस बात को आंशिक रूप से स्वीकार किया है और जवाब में कहा है कि जांच रिपोर्ट में चूक और वित्तीय अनुशासन के उल्लंघन के मामले चिन्हित किए गए हैं. समिति की अनुशंसा के तहत विभाग के स्तर से इंजीनियरों की टीम पूरे मामले की जांच कर रही है. जांच के बाद दोषियों को चिन्हित कर उनके विरुद्ध कार्रवाई करने और संवेदक को भुगतान के संबंध में भविष्य के भुगतान से समायोजन का प्रस्ताव है. मामला हाइकोर्ट में भी है.

विधायक के दूसरे सवालों का जवाब विभाग की तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया

कैसे लगी अनियमितता की बात पर मुहर

नए हाइकोर्ट भवन के निर्माण में अनियमितता की पुष्टि पांच सीनियर आइएएस अधिकारियों की जांच रिपोर्ट में हुई है. टेंडर के वक्त ही मनचाही कंपनी को काम देने के लिए एक बड़ा खेल हुआ. जिसका खुलासा जांच रिपोर्ट में हुआ है. इसी जांच रिपोर्ट को एक आधार मानते हुए अधिवक्ता राजीव कुमार ने हाइकोर्ट में पीआइएल दायर की है. पांच सदस्यीय टीम की जांच रिपोर्ट के पहले ही भाग में टेंडर के वक्त घोर अनियमितता की बात सामने आयी है. जांच रिपोर्ट में लिखा है कि योजना की प्रशासनिक स्वीकृति 366.0 3 करोड़ रुपए थी. लेकिन इसमें से 30.9 1 करोड़ रुपए के काम को हटा कर टेंडर निकाला गया. भवन निर्माण विभाग के सचिव ने समिति को बताया कि टेंडर की राशि और प्रशासनिक स्वीकृति की राशि में अंतर महंगाई बढ़ने, लेबर सेस, आकस्मिक व्यय की राशि को हटा देने के कारण हुआ है. लेकिन समिति सचिव की बातों से संतुष्ट नहीं है. रिपोर्ट में लिखा है कि समिति के सामने यह स्पष्ट नहीं किया जा सका कि निर्माण से संबंधित 30 करोड़ रुपए के काम को टेंडर करते वक्त क्यों हटा दिया गया. अगर किसी वजह से इन कामों को हटा देना जरूरी भी हो गया था, तो इन कामों के लिए दोबारा टेंडर क्यों नहीं निकाला गया. दोबारा उसी कंपनी से काम करवा लिया गया. जो कि घोर अनियमितता है.

25 के बदले बढ़ा दिया 300 फीसदी खर्च, विभाग को पता ही नहीं

किसी भी योजना में एस्टीमेट का ऊपर जाना लगभग स्वाभाविक हो जाता है. लेकिन जिस तरह से हाइकोर्ट निर्माण को लेकर एस्टीमेट बढ़ा वो कई तरह के सवाल खड़े करता है. कार्यपालक अभियंता, अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता योजना में अपनी तरफ से 10-25 फीसदी तक की वृद्धि कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें विभाग से अनुमति नहीं लेनी पड़ती है. लेकिन हाइकोर्ट निर्माण मामले में 300 फीसदी तक इस्टीमेट को बढ़ा दिया गया. जांच समिति ने पाया कि ऐसा करना पीडब्ल्यूडी के कोड के मुताबिक गलत है. 300 फीसदी एस्टीमेट में वृद्धि होने से ये भी सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग को इतने बड़े इजाफे की जानकारी नहीं हुई होगी. तत्कालीन सचिव राजबाला वर्मा के समय से ही एस्टीमेट में इजाफा होता आ रहा था.

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