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न्यूनतम मजदूरी दर पुनरीक्षण : मजदूर नेताओं का दावा- सरकार ने की नियम की अनदेखी, श्रमिक नेताओं को शामिल किये बिना बना ली एडवाइजरी कमिटी

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  • राज्य गठन के बाद से दो बार ही की गयी मजदूरी दर की समीक्षा, नियमतः तीन साल में करनी होती है समीक्षा

Chhaya

Ranchi : राज्य में मजदूरों की दशा दयनीय है. इस पर राज्य सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की जा रही. इस साल श्रम, नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग की ओर से न्यूनतम मजदूरी दर तय करने के लिए एडवाइजरी कमिटी का गठन किया गया. लेकिन, इस कमिटी में श्रमिक संघ के नेताओं को शामिल नहीं किया गया है. मजदूर नेताओं का कहना है कि नियम के मुताबिक, बिना श्रमिक नेताओं की उपस्थिति के कमिटी कोई भी फैसला नहीं ले सकती. सीटू, एटक, इंटक, मजदूर संघ के श्रमिक नेताओं ने बताया कि एडवाइजरी कमिटी के गठन में श्रमिक नेताओं की उपस्थिति जरूरी है.

राज्य गठन के बाद से दो बार ही हुआ पुनरीक्षण

राज्य गठन के बाद से अब तक सिर्फ दो बार ही न्यूनतम मजदूरी दरों का पुनरीक्षण संभव हो पाया है. पहली बार साल 2003 में न्यूनतम मजदूरी दर तय की गयी थी. जबकि, लंबे समय के बाद साल 2012 में मजदूरी दर तय की गयी. राज्य में वर्तमान न्यूनतम मजदूरी दर 270 रुपये है. भारत सरकार की नियमावली के अनुसार कम से कम तीन साल में एक बार न्यूनतम मजदूरी दरों का पुनरीक्षण किया जाना है. इसके बावजूद राज्य में मजदूरों के अधिकारों के साथ विभिन्न सरकारों ने खानापूर्ति करने का काम किया है.

जनवरी-फरवरी तक लिया जायेगा निर्णय

श्रम विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि न्यूनतम मजदूरी दर पुनरीक्षण के लिए एडवाइजरी कमिटी का गठन किया जा चुका है. उन्होंने बताया कि कमिटी में श्रम मंत्री, विभागीय सचिव, श्रमायुक्त, श्रमिक नेता समेत अन्य संबंधित अधिकारियों को शामिल किया जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि राज्य में न्यूनतम मजदूरी दर तय करने की प्रक्रियाएं चल रही हैं. विभाग की ओर से जनवरी-फरवरी तक न्यूनतम मजदूरी दर तय कर ली जायेगी.

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अधिकतर श्रमिक नेताओं को नहीं जानकारी

एक तरफ विभाग का कहना है कि दर तय करने के लिए एडवाइजरी कमिटी का गठन कर लिया गया है, जबकि सीटू, एटक, इंटक, मजदूर संघ जैसे राज्य के प्रमुख मजदूर संगठनों का कहना है कि उन्हें एडवाइजरी कमिटी के गठन की जानकारी ही नहीं है. इंटक के आशीष चक्रवर्ती ने बताया कि इंटक कार्यालय में इस तरह की सूचना नहीं है. सीटू के महासचिव प्रकाश विप्लव ने कहा कि कमिटी का गठन श्रमिक नेताओं के बिना नहीं किया जा सकता. राज्य के श्रमिक नेताओं को कमिटी में शामिल न कर विभाग खुद से सारे निर्णय ले रहा है, जो गलत है. उन्होंने कहा कि बगैर श्रमिक और श्रमिक नेताओं के कमिटी का गठन नहीं हो सकता. एटक के पीके गांगुली ने कहा कि कमिटी के गठन की कोई जानकारी नहीं है. न्यूनतम मजदूरी दरों का पुनरीक्षण जरूरी है, लेकिन इस तरह से नहीं किया जा सकता.

अधिकारियों ने दिया गोलमोल जवाब

श्रम विभाग के अधिकारियों ने इस संबध में अलग-अलग जवाब दिये. संयुक्त श्रमायुक्त अजीत कुमार पन्ना से जब पूछा गया कि एडवाइजरी कमिटी में श्रमिक नेताओं को क्यों शामिल नहीं किया गया, तो उन्होंने बताया कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा कि जो फाइल डील करते हैं, उनसे जानकारी मिलेगी, उनसे पूछ लें. हर अधिकारी का काम अलग-अलग है. हर विषय में जानकारी रखना संभव नहीं है. वहीं, जब संयुक्त श्रमायुक्त सह न्यूतम मजदूरी दर निदेशक श्याम सुंदर पाठक से इस बाबत पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि कमिटी का कार्य प्रचारित है. नेताओं को जानकारी नहीं होगी. जब उनसे पूछा गया कि कमिटी का गठन बगैर श्रमिक नेताओं के कैसे हो गया, तो उन्होंने कहा कि निर्णय सरकार लेती है. हर नेता को शामिल किया जाये, यह संभव नहीं. वहीं, प्रचारित का मतलब जब संयुक्त श्रमायुक्त उमेश प्रसाद से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि इसका मतलब है कमिटी का गठन हो चुका है. हर श्रमिक नेता की भागीदारी इसमें होगी ही, संबंधित अधिकारी इसका जवाब देंगे.

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