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प्रवासी मजूदरों को राज्य के कारखानों में काम तो मिल सकता है, लेकिन मजदूरी दर में है काफी अंतर

Ranchi :  अनलॉक वन के बाद से राज्य में औद्योगिक गतिविधि विधि शुरू हुई. लेकिन औद्योगिक गतिविधि शुरू होने के साथ ही कई समस्याएं भी हैं. तीन महीने के लॉकडाउन के बाद, अब उद्योगों के सामने पूंजी की मुख्य समस्या है. उत्पादन के लिए उद्योगों में निवेश की जरूरत होती है. पिछले तीन महीने से कारखानें बंद रहे. वहीं कामगारों और कर्मचारियों को वेतन दिया गया.

जिससे उद्योग घरानों की कमर टूट गयी. लॉकडाउन चार के बाद जब उद्योगों को रियायत दी गयी तो, उद्योगों को शुरू होने में ही 45 दिन लगे. राज्य सरकारों के अलग-अलग नियम भी उद्योगों में बाधा का कारण हैं. जो कच्चा माल ढुलाई और परिवहन को प्रभावित कर रहे हैं. राज्य सरकार प्रवासी मजदूरों को ला रही है. इन्हें रोजगार देने की बात भी की जा रही है.

राज्य के व्यवसायी इन मजदूरों को काम देना चाहते हैं. लेकिन प्रवासी मजदूरों के हुनर को ले राज्य के उद्यमी असमंजस में हैं. रोजगार सृजन नहीं हो पा रहा है. वहीं दूसरे राज्यों की मजदूरी दर और यहां की दर में काफी अंतर है. बता दें कि पिछले साल की आर्थिक मंदी से उद्योग उभर ही रहे थे कि अब कोरोना लॉकडाउन ने हाल खस्ता कर दिया.

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मजदूरी दर में है काफी असमानता

सिद्धीविनायक फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के राजेश सोमानी ने बताया कि प्रवासी मजदूरों को काम मिल सकता है. लेकिन हुनर काफी जरूरी है. नहीं तो राज्य के उद्योग में असर पड़ेगा. मजदूर अगर यहां काम करते हैं तो भी उन्हें मजदूरी दर में नुकसान होगा. ऐसे में समस्याएं तो है ही. अनलॉक वन भले हो गया हो, लेकिन अब भी गांव से मजदूर काम में आना नहीं चाहते हैं.

इन्होंने बताया कि गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में एक दिन में सात से आठ सौ रूपये मजदूरी दी जाती है. जबकि राज्य के उद्योगों में अधिकतम चार सौ रूपये प्रतिदिन की मजदूरी है. वहीं राज्य के उद्योग एंसीलरी, स्पेयर्स पार्ट, फूड प्रोसेसिंग के अधिक यूनिट्स हैं. ऐसे में स्किल्ड मजदूरी की जरूरत होती है. जो अभी मिल नहीं पा रहे.

कहीं 45 प्रतिशत मजदूर तो कहीं मात्र 8 से 12 मजदूर

लॉकडाउन के बाद कर्मचारियों की कमी हर जगह देखी जा रही है. परिवहन सुविधा नहीं होने के कारण कर्मचारी और मजदूर काम पर नहीं आ रहे. हिमगिरि वाटर टैंक के दीपक कुमार मारू ने कहा कि 80 से 90 मजूदर कारखाना में काम करते थे.

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अब 45 प्रतिशत मजदूरों के साथ काम लिया जा रहा है. काम पर लोग परिवहन के कारण नहीं आ रहे. मारू ने बताया कि उत्पादन तो हो रहा है. लेकिन मार्केट अभी अधिक नहीं है. महावीर रिफ्रेक्टरीज के सुरेंद्र सिंह ने बताया कि कारखाना तो पहले से खुला है. लेकिन आठ मजदूर ही काम पर आ रहे. जबकि पहले से जो ऑडर मदर कंपनियों से मिले थे, उसे अब पूरा करना है. ऐसे में परेशानी काफी है.

भावनी इंटरप्राइजेज के शशिभूषण सिंह ने बताया कि उनके काररखाने में 12 मजदूर ही काम रहे हैं. जबकि इनके पास अब कोई काम नहीं है और न ही पूंजी है.

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राज्यों की नीति के कारण व्यापार पर पड़ रहा प्रभाव

कुछ कारखाना संचालकों से दूसरे राज्यों से होने वाले व्यापार पर बात की गयी. राजेश सोमानी ने बताया कि चावल पैक करने वाली बोरियां पश्चिम बंगाल से आती हैं. लॉकडाउन के बाद से बंद है. जबकि राज्य में खाद्यान्न उद्योग खुले रहे हैं. वहीं अब बंगाल में बोरियां बनायी जा रहीं. लेकिन अब भी परिवहन की समस्या है. ऐसे में राइस मिल्स में पैकेजिंग की समस्या उभर आयी है.

स्पेयर्स पार्ट्स कि जानकारी देते हुए महावीर रिफ्रेक्टरीज के महावीर सिंह ने बताया कि स्पेर्य पार्ट्स के समान राज्य से तो उपलब्ध हो ही जाते है. लेकिन रबर, स्टील स्क्रैप जैसे मेटेरियल गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा आदि राज्यों से मंगाया जाता है. लॉकडाउन में इनकी सप्लाई पूरी तरह बंद है. जिन कारखानों में मेटेरियल है. वहां काम चालू है. वहीं राज्य में कपड़ा व्यवसाय पश्चिम बंगाल पर निर्भर है. जबकि गुजरात आदि राज्यों से भी संबंध है.

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