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MGNREGA:15 वर्षों में भी नहीं बदला मनरेगा कर्मियों के मानदेय का पैटर्न, केंद्र को लिखी गयी चिट्ठी

Ranchi: राज्य के मनरेगा कर्मियों की शिकायत है कि उनके मानदेय में सुधार के लिये 15 सालों से कोई पहल नहीं हुई है. समय बदला, सरकार बदली, महंगाई भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची. पर मनरेगा कर्मियों का मानदेय स्थिर ही रखा गया है.

इसे लेकर मनरेगा कर्मी महासंघ और इसके सदस्यों ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री, श्रम मंत्री और विभागीय अधिकारियों से गुहार लगायी है. उन्हें पत्र भेजने के अलावा मेल भी किया है.

कहा है कि डेढ़ दशकों में भी केंद्र सरकार ने मनरेगाकर्मियों को बेहतर पारिश्रमिक दिलाने की दिशा में कोई संशोधन और मार्गदर्शन राज्य सरकारों को नहीं दिया. ऐसे में मनरेगा कर्मियों में उत्साह की कमी है. केंद्र सरकार पहल करे.

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हो गये 15 साल, हाल बेहाल

झारखंड प्रदेश मनरेगा कर्मी महासंघ के प्रदेश उपाध्यक्ष महेश सोरेन के मुताबिक 2 फरवरी, 2006 से मनरेगा अस्तित्व में आया. अब इसके 15 वर्ष होने वाले हैं. इस दरम्यान इस कानून में कई संसोधन हुए.

मनरेगा मजदूरी, MIS, DBT और योजना कार्यों में व्यापक बदलाव हुआ. परंतु इन कार्मिकों के लिए 2006 में बने मानदेय प्रारूप में एक बार भी बदलाव नहीं हुआ.

पिछले 15 बरस में व्यापक स्तर पर बदलाव देश समाज में हुए परंतु मनरेगा कर्मियों का मानदेय स्थिर है. जब मनरेगाकर्मियों का मानदेय प्रारूप शुरुआती दौर (2006) में बनाया गया तो उस समय के न्यूनतम वेतन, श्रम कानूनों औऱ समान काम समान वेतन के प्रावधानों की  अनदेखी की गयी.

उसका परिणाम यह हुआ कि कर्मियों से कार्य तो तकनीकी कर्मचारियों के रूप में लिया जाता है पर पारिश्रमिक एक दिहाडी मजदूर से भी कम दिया जा रहा है. बगैर बीमा व सामाजिक सुरक्षा के इनका भविष्य अंधकारमय है. उनका हाल बेहाल है.

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6% आकस्मिकता निधि में संशोधन की दरकार

अल्प मानदेय और उपेक्षा पूर्ण व्यवहार के कारण देश भर में मनरेगा कर्मियों का आंदोलन चलता रहा है. इस दौरान राज्य सरकारों से होने वाले वार्ता में सरकारों ने स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार का 6% आकस्मिकता निधि (contingency) ही सभी समस्याओं की जड़ है.

जब तक इस निधि में संशोधन नहीं होगा, भविष्य में भी मनरेगा कर्मियों का मानदेय स्थायी कर्मचारियों के समान नहीं हो पायेगा. इसलिए यह आवश्यक है कि मनरेगा कानून के इस अंश में संशोधन किया जाए. आकस्मिकता मद में संशोधन का अधिकार केंद्र सरकार को ही है जिसके लिये उचित प्रयास की जरूरत है.

केंद्र प्रायोजित योजनाओं में मनरेगाकर्मियों के शोषण का मुख्य जिम्मेदार केंद्र सरकार ही है. कर्मियों के हित में मनरेगा कानून के आकस्मिकता मद में सुधार हो. कर्मियों को देय मानदेय को श्रम कानून, न्यूनतम वेतन और समान काम, समान वेतन के अनुसार पुनर्निर्धारित किया जाए.

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