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आज भी हाशिये पर हैं बौद्धिक एवं विकासात्मक दिव्यांगजन

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Rahul Mehta

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आज भी हाशिये पर हैं बौद्धिक एवं विकासात्मक दिव्यांगजन
राहुल मेहता.

बौद्धिक एवं विकासात्मक दिव्यांगजनों के पुनर्वास के लिए किये गये प्रयासों के बावजूद आज भी ये हाशिये पर, वंचित और अनसुने हैं. दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत बौद्धिक दिव्यांगजनों को भी संपत्ति के मालिक होने और उसके वारिस होने का अधिकार है और वे अपने वित्तीय मामलों का नियंत्रण कर सकते हैं. लेकिन, आज भी अधिकतर बौद्धिक दिव्यांगजनों को अपने बारे में छोटे-छोटे निर्णय लेने का भी मौका नहीं दिया जाता, उनके लिए अन्य फैसले लेते हैं. यह उनके स्वनिर्भर बनने में बाधक बनता है. ऐसा मंशा में खोट के कारण नहीं होता. माता-पिता सहित अधिकतर लोग बौद्धिक दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं, लेकिन अधिकतर लोग मानते हैं कि बौद्धिक दिव्यांगजन नहीं जानते कि ‘उनके अधिकार क्या हैं, कैसे, क्या और किससे क्या बोलना है आदि.’ यहां मूल सवाल यह है कि ‘वे नहीं जानते या हमने सिखाया नहीं /सीखने का अवसर दिया नहीं?’

सेल्फ एडवोकेसी से मिलती है मदद

एडवोकेसी का अर्थ हमलोग धरना, प्रदर्शन, टकराव आदि से लगाते हैं. भारतीय संदर्भ में ”सेल्फ एडवोकेसी” शब्द बहुत कम जाना जाता है. कई लोग इसका नकारात्मक अर्थ बताते हैं. अक्सर यह शब्द एक निराकार कानूनी आभा मंडल सा प्रतीत होता है. लेकिन, सेल्फ एडवोकेसी का मतलब है अपनी चाहत, विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सक्षम बनना. बौद्धिक दिव्यांगजनों के लिए यह अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को जानना, उसके संरक्षण के लिए बोलना और जीवन को प्रभावित करनेवाले विकल्प और निर्णय का चयन करना भी है. सेल्फ एडवोकेसी बौद्धिक दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने के अलावा उनके आत्मविश्वास व आत्मसम्मान बढ़ाने, पहचान बनाने, जीवन को बेहतर बनाने, सामाजिक और शारीरिक अलगाव कम करने के साथ-साथ समाज की मानसिकता में भी परिवर्तन लाने में सहायक होती है.

सेल्फ एडवोकेसी कौशल बौद्धिक दिव्यांगजनों को यह तय करने में मदद करता है कि वे क्या चाहते हैं और उनके लिए क्या संभव है, उन्हें क्या उम्मीद करनी चाहिए. सेल्फ एडवोकेसी के लिए पहले यह तय करने की आवश्यकता है कि किस विषय में बात करनी है. तदुपरांत उसका योजना बनाकर खुद के लिए बोलने की जरूरत है. बौद्धिक दिव्यांगजनों को अपने लक्ष्यों को बनाने और प्राप्त करने के लिए सहयोग की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय उनका होना चाहिए. शुरुआत छोटे-छोटे निर्णयों, जैसे- खाना, कपड़े, खेल आदि का चयन, गुड-बैड टच आदि पर निर्णयों से हो सकती है.

झारखंड में भविष्य किरण संस्था के नेतृत्व में जन सेवा परिषद्, पहला कदम, झारखंड पेरेंट्स एसोसिएशन, सृजन फाउंडेशन, अशोक वाटिका डे केयर सेंटर, युवा, डिसेबल्ड स्पोर्ट्स एवं जन उत्थान समिति, प्रकाश कुंज, प्रेरणा, स्पंदन आदि संस्थाएं सेल्फ एडवोकेसी के माध्यम से बौद्धिक दिव्यांगजनों के समावेश की राह तैयार कर रही हैं.

(लेखक पुनर्वास विशेषज्ञ और राज्य निःशक्तता परामर्श समिति के सदस्य हैं.)

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