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मेनहर्ट घोटाला-9 : मंत्री रहते रघुवर गोल नहीं दाग सके तो गोल पोस्ट ही उठा कर गेंद की दिशा में रख दी और वाहवाही ले ली

Sayru Roy

Ranchi: निविदा का पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन-

निविदा प्रपत्र में निविदादाताओं की न्यूनतम योग्यता का मापदंड निर्धारित था. मंत्री, नगर विकास विभाग, श्री रघुवर दास के दबाव में तकनीकि उपसमिति और मुख्य समिति ने इसको अनुचित, अनैतिक, भ्रष्ट और अनियमित तरीके से बदल दिया. केंद्रीय सर्तकता आयोग के अनुसार निविदा खुल जाने के बाद शर्तों में मनोनकूल परिवर्तन करना भ्रष्ट आचरण करने की श्रेणी में आता है. इसके बाद तकनीकि उपसमिति ने इस बदली गयी कसौटी में निविदादाताओं की योग्यता का मूल्यांकन किया.

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योग्यता का मूल्यांकन :

योग्यता निर्धारण के लिए जो प्रमुख कसौटियां निविदा प्रपत्र में अंकित थीं. पहली महत्वपूर्ण कसौटी थी – निविदादाताओं के तीन पूर्ववर्ती वर्षों का औसत टर्नओवर औसत 40 करोड़ रुपये से अधिक होना चाहिए. और इन वर्षों में निविदादाता फर्म लगातार लाभ में रहना चाहिए. यह तीन वर्ष थे – 2002-03, 2003-04 और 2004-05. जिन्हें 18 जुलाई 2005 को हुई प्री बिड मीटिंग में निर्धारित किया गया था. इस शर्त के बारे में फ्री बिड मीटिंग में सवाल उठाया था. तहल इंजीनियरिंग कंसल्टेंसी लिमिटेड के प्रतिनिधि ने. उन्होंने कहा था कि निविदा टर्म ओवर के प्रमाण के रूप में विगत तीन वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट की सत्यापित प्रति मांगी जा रही है. परंतु 2004-05 का बाह्य ऑडिट रिपोर्ट देना संभव नहीं है. कारण यह कि यह ऑडिट जुलाई माह में होता है. तब यह तय हुआ कि निविदा के साथ 2002-03 और 2003-04 के बाह्य अंकेक्षित रिपोर्ट और 2004-05 की आंतरिक अंकेक्षित रिपोर्ट मान्य होगी. मेनहर्ट का प्रतिनिधि भी बैठक में उपस्थित था. उसने इसमें सहमति जतायी इस निर्णय का विरोध नहीं किया, इस पर कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं दी. यानी टर्न ओवर के संदर्भ में इन तीन वर्षों के निर्धारण पर मेनहर्ट को कोई आपत्ति नहीं थी. मेनहर्ट के प्रतिनिधि ने प्री बिड मीटिंग में एक ही सलाह दी थी. उन्होंने कहा था कि निविदा प्रपत्र में अंकित है कि सीवरेज के लिए 12 और ड्रेनज के लिए 12 विशेषज्ञ की जरूरत होगी. यह संख्या ज्यादा है. दोनों के लिए 3-3 विशेषज्ञ पर्याप्त ही हैं. इस पर सीवरेज और ड्रेनेज के लिए अलग-अलग 72 मानव माह उपलब्ध कराने पर मिटिंग में सहमति बनी. मेनहर्ट के प्रतिनिधि ने टर्न ओवर से संबंधित वित्तीय वर्षों के निर्धारण के बारे में प्रि-बिड मीटिंग में कुछ भी नहीं कहा. जब योग्यतावाले लिफाफे मूल्यांकन के लिए खुले तो मेनहर्ट के निविदा प्रपत्र में केवल दो वर्षों, 2002 और 2003, का ही अंकेक्षित टर्न ओवर दिया हुआ था. वर्ष 2004-05 के मूल्यांकनवाले खाना में लिखा था- अनुपलब्ध. इसके अलावा मेनहर्ट ने वर्ष 2001-02 का टर्न ओवर निविदा के साथ संलग्न किया था, जिसे न मांगा गया था, न जिसकी जरूरत थी और न तो जिसे मूल्यांकन में शामिल किया जाना था. परंतु तकनीकी उपसमिति ने मेनहर्ट के केवल दो वर्षों के टर्नओवर पर ही औसत निकाल दिया और उसे योग्य करार दिया. यह अनुचित था, अकल्पनीय था, भ्रष्ट आचरण था. यदि मेनहर्ट के 2004-05 टर्न ओवर को शून्य मान कर औसत निकाला जाता तो वह 40 करोड़ रुपये से कम होता. मूल निविदा में न्यूनतम योग्यता की दूसरी शर्त थी कि निविदादाता फर्म को विगत पांच वर्षों में कम से कम एक शहरी सिवरेज और ड्रेनेज के परियोजना प्रबंधन कंसल्टेन्सी का अनुभव होना आवश्यक है जिसकी कुल अनुमानित लागत 300 करोड़ रुपया होनी चाहिए.

18 जुलाई 2005 को आयोजित प्री-बिड मीटिंग में किसी भी निविदादाता फर्म के प्रतिनिधि ने निविदा प्रपत्र में अंकित न्यूनतम योग्यता के इस प्रावधान पर प्रश्न नहीं किया था, इसमें बदलाव करने की मांग नहीं उठायी थी, सभी ने इसे मान लिया था. परंतु जब इनकी योग्यता के लिफाफे मूल्यांकन के लिए खुले तो कोई भी निविदादाता इस कसौटी को पूरा नहीं कर रहा था. इसीलिए निविदा मूल्यांकन कर रही तकनीकी उपसमिति और मुख्य समिति ने निर्णय किया कि यह निविदा रद्द कर दी जाये और इस काम के लिए नयी निविदा निकाली जाये. नयी निविदा क्वालिटी एंड कॉस्ट प्रणाली आधारित निकाली जाये, क्योंकि निविदा भरनेवालों में से कोई भी इस शर्त के आधार पर योग्य नहीं पाया गया है. परंतु जैसा कि पूर्व के खंड में देखा जा सकता है, तकनीकी मूल्यांकन समिति और मुख्य समिति की यह सिफारिश स्वीकार करने की जगह मंत्री, नगर विकास विभाग की अध्यक्षता में बैठक कर योग्यता मूल्यांकन की शर्त ही बदल दी गयी. सिवरेज और ड्रेनेज दोनों के परामर्शी अनुभव की जगह सिवरेज या ड्रेनेज में से किसी एक का अनुभव मान्य कर दिया गया. जब प्री-बिड मीटिंग में निविदादाताओं ने यह परिवर्तन नहीं सुझाया था तो मंत्री को इसे बदलने की क्या लगी थी? इसे ही कहते हैं मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त. गोलपोस्ट में गोल नहीं दाग सको तो गोल पोस्ट को ही उठा कर गेंद की दिशा में रख दो और गोल कर देने की वाहवाही लूटो, इनाम पाओ.

वास्तव में यह बदलाव भ्रष्ट आचरण का प्रतीक है. इतना होने पर भी मेनहर्ट योग्यता के इस पैमाने पर खरा नहीं उतर रहा था. उसके पास न तो ड्रेनेज के काम का परामर्शी अनुभव था और न सिवरेज के काम का ही परामर्शी अनुभव था. योग्यता के अपने लिफाफे के इस खाने में उसने लिखा था कि उसके पास ‘‘समान कार्य’’ का अनुभव है. यह समान कार्य क्या है? समान कार्य का उल्लेख निविदा प्रपत्र में भी नहीं है, प्री-बिड मीटिंग में भी किसी ने यह सुझाव नहीं दिया और बाद में जब मंत्री के दबाव में सिवरेज और ड्रेनेज दोनों के अनुभव की योग्यता को बदल कर उसकी जगह सिवरेज या ड्रेनेज में से किसी एक के अनुभव को योग्यता में शामिल करने का निर्णय हुआ, उस समय भी ‘‘समान कार्य’’ का अनुभव होने का पैमाना उसमें नहीं जोड़ा गया. यदि एक और बदलाव कर इसे भी जोड़ दिया होता तो बात बन जाने की ‘‘थेथरोलोजी’’ दी जा सकती थी. परंतु मूल्यांकन करनेवालों की बदनीयत और दुस्साहस तो देखिये. उन्होंने मूल्यांकन की दोनों कसौटियों पर मेनहर्ट को योग्य ठहरा दिया, जिन पर वह सर्वथा अयोग्य था. यदि ये बदले गये पैमाने विज्ञापित निविदा में दर्ज रहते, तो हो सकता था कि ऐसी योग्यता रखनेवाली कतिपय अन्य फर्मों ने भी निविदा प्रतिस्पर्द्धा में भाग लिया होता. योग्यता के मूल्यांकन में ऐसी बेईमानी, ‘‘न भूतो न भविष्यति.’’ तकनीकी मूल्यांकन न्यूनतम योग्यता पैमाने पर सफल करार दिये गये तीन निविदादाताओं की तकनीकी क्षमता का मूल्यांकन तकनीकी उपसमिति ने 28 सितंबर 2005 को किया. निविदा प्रपत्र में तकनीकी मूल्यांकन के जो मापदंड दिये गये थे, उनका विश्लेषण करने पर निष्कर्ष निकलता है कि इसमें पक्षपात की काफी गुंजाइश छोड़ी गयी थी. निविदा प्रपत्र में तकनीकी मूल्यांकन का विस्तृत मापदंड दिया हुआ था और इस आधार पर दिये जानेवाले अंक भी निर्धारित किये गये थे. मगर मापदंड का विखंडन उप-मापदंडों में नहीं किया गया था. परन्तु तकनीकी मूल्यांकन समिति ने मूल्यांकन करते समय इन मापदंडों को अपने हिसाब से विभिन्न उप-मापदंडों में विखण्डित कर दिया. निर्धारित एकमुश्त अंक को भी मनमाफिक विभिन्न उपखंडों में बांट कर मनमाना अंक बैठा दिया. उदाहरण के लिए, मूल निविदा में मुख्य विशेषज्ञों की योग्यता और क्षमता के लिए तालिका में एकमुश्त 50 अंक निर्धारित था. तकनीकी उपसमिति ने इस 50 अंक को दो भाग में खंडित कर डिजाइन टीम के लिए 30 अंक और सुपरविजन टीम के लिए 20 अंक कर दिया. डिजाइन टीम के लिए खंडित 30 अंक को इन्होंने पुन: 10 भागों में विखंडित कर विभिन्न श्रेणी के विशेषज्ञों के लिए 1 से लेकर 9 तक अंक निर्धारित कर दिया. इसी तरह का विखंडन निविदा के प्राय: सभी तकनीकी मापदंडों में तकनीकी उपसमिति ने कर दिया ताकि मनमाफिक मूल्यांकन किया जा सके. सवाल उठता है कि विश्व बैंक गुणवत्ता आधारित प्रणाली का ढिंढोरा पीटने वालों ने निविदा प्रकाशित करते समय इस ओर ध्यान क्यों नहीं दिया? निर्धारित निविदा मापदंडों का मूल्यांकन के समय उप-मापदंडों में मनमाना विखंडन करने की गुंजाइश क्यों छोड़ दी? यह सब निविदा प्रकाशन के बाद तकनीकी मूल्यांकन करते समय किया गया जो उचित नहीं है. यदि यह निविदा वाकई विश्व बैंक की गुणवत्ता आधारित प्रणाली के अनुरूप तैयार की गयी होती (जिसमें तकनीकी मूल्यांकन में सर्वाधिक अंक लाने वाले परामर्शी का ही वित्तीय लागत वाला लिफाफा खोला जाता) तो निविदा प्रपत्र तैयार करते समय यह ध्यान रखा गया होता कि मूल्यांकन करनेवालों को ऊपर के आदेश से मनमानी करने की गुंजाइश नहीं रहे. परंतु यहां तो तकनीकी मूल्यांकन करने वालों ने अपने मन से ही मापदंडों का विभाजन और अंकों का विखंडन कर लिया. इससे तकनीकी मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं रहा और मूल्यांकन की पारदर्शिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, मूल्यांकन की पारदर्शिता प्रभावित हुई.

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इतना ही नहीं, तकनीकी मूल्यांकन के दौरान अंक देते समय तीन तकनीकी मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा प्रतिस्पर्धी परामर्शियों को दिये गये अंकों में भेदभाव साफ झलकता है. विखंडित उपमापदंडों के आधार पर अंक देने में एकरूपता नहीं बरती गयी. उदाहरण के लिए, समिति के अध्यक्ष शशिरंजन कुमार द्वारा तीनों निविदादाताओं को दिये गये अंकों में काफी कम अंतर है. जबकि केपी शर्मा द्वारा इन्हें दिये गये अंकों में काफी अधिक अंतर है. इन्होंने मेनहर्ट को अंक दिया है. काफी अधिक उदाहरण के लिए स्नातकोत्तर योग्यता के लिए 20 प्रतिशत अंक निर्धारित था. तहल कंसल्टेन्सी और मेनहर्ट दोनों के पास स्नातकोत्तर विशेषज्ञ थे. पर तकनीकी उपसमिति के सदस्य श्री उमेश गुप्ता ने इसके लिए मेनहर्ट के स्नातकोत्तर जेपी निगम को पूरा 20 प्रतिशत अंक दिया और तहल के स्नातकोत्तर जेके शर्मा को 15 प्रतिशत पर समेट दिया. सिवरेज सिस्टम डिजाइन इंजीनियर के मामले में भी उन्होंने ऐसा ही किया. मेनहर्ट के स्नातकोत्तर एस. कुमार को 20 प्रतिशत अंक दिया और तहल के स्नातकोत्तर पी कापला को मात्र 15 प्रतिशत अंक दिया. दूसरे तकनीकी सदस्य केपी शर्मा का झुकाव भी अंक देने के मामले में ऐसा ही पक्षपात पूर्ण रहा है. विशेषज्ञों के जीवन वृत (बायोडाटा) मूल्यांकन में विभिन्न विखंडित उपमापदंडों के लिए अलग-अलग अंक देने के बदले इन्होंने एक मुश्त अंक दे दिया, जिसका स्पष्ट कारण पता नहीं चलता. इनका मूल्यांकन पारदर्शी नहीं है. इन्होंने मेनहर्ट को सर्वाधिक 92.66 प्रतिशत अंक दिया है. शेष दोनों फर्मों को 80 और 50 अंकों पर समेट दिया. विडम्बना तो यह है कि मुख्य समिति के सदस्यों ने भी इन त्रुटियों को नजर अंदाज कर दिया. इससे पता चलता है कि योग्यता का तकनीकी मूल्यांकन करने के लिए निर्धारित निविदा शर्तों के आधार पर अयोग्य साबित हो चुके मेनहर्ट को योग्य करार देने की धृष्टता करने वाले तकनीकी मूल्यांकन समिति के सदस्यों ने तकनीकी मूल्यांकन में भी उसे अधिक अंक देकर पक्षपात किया. उन्होंने पारदर्शिता को प्रभावित किया और मेनहर्ट को अधिक अंक देकर केवल उसी का वित्तीय लिफाफा खुलना सुनिश्चित किया. वित्तीय निगोशियेशन (दर वार्ता) तकनीकी मूल्यांकन में मेनहर्ट को सर्वाधिक अंक मिलने के कारण केवल उसी का वित्तीय लिफाफा खुलना था. यह लिफाफा 19 अक्टूबर 2005 को खुला. पता चला कि मेनहर्ट ने डिजाइन चरण के लिए 22,81,14,000 रुपये और सुपरविजन चरण के लिए 14,47,12,440 रुपये यानी कुल 37,28,26,440 रुपये का शुल्क यह काम करने के लिए अपने वित्तीय निविदा प्रपत्र में उद्धृत किया है. निविदा में वित्तीय लागत को कम करने के लिए निगोशियेशन का प्रावधान था. 22 नवम्बर 2005 को तकनीकी समिति की एक बैठक नगर निगम के प्रशासक की अध्यक्षता में हुई जिसमें निविदा की शर्तों के अनुसार परियोजना प्रबंधन कंसलटेन्सी की मूल लागत का आकलन किया गया. इस बैठक में मुख्य समिति के एक सदस्य अनिल कुमार, मुख्य अभियंता भी उपस्थित हुए थे.

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आकलन किया गया कि डीपीआर तैयार करने पर करीब 9.25 करोड़ रुपये की लागत आयेगी. इसमें 10.2 प्रतिशत सर्विस टैक्स जोड़ देने पर कुल वित्तीय भार करीब 10.20 करोड रुपये आयेगा, जबकि मेनहर्ट की मांग इसके लिए 37 करोड़ रुपया से अधिक है. इस पर विचार करने के लिए मुख्य समिति की बैठक 5 दिसंबर 2005 को हुई. निर्णय हुआ कि तकनीकी उपसमिति 10 दिनों के भीतर तकनीकी एवं वित्तीय प्रस्तावों पर निगोशियेशन कर मुख्य समिति को सूचित करे. इस बीच मुख्य समिति ने सिवरेज-ड्रेनेज की पेचीदगियों एवं तकनीकी आवश्यकताओं को देखते हुए बाह्य विशेषज्ञों की सेवायें लेने तथा इनपर होने वाले व्यय के संबंध में आकलन करने और इसके बाद चयनित परामर्शी से निगोशियेशन (दर वार्ता) करने के लिए तकनीकी उपसमिति को निर्देश दिया. उल्लेखनीय है कि प्री-बिड मीटिंग में मेनहर्ट के प्रतिनिधि ने विशेषज्ञों की संख्या कम करने के लिए सुझाव दिया था. पर यहां मुख्य समिति ने बाह्य विशेषज्ञों को जोड़ने की बात कह दी. उपसमिति ने 29 दिसंबर 2005 को बैठक की और 10 बाह्य विशेषज्ञों की सेवायें लेने पर कुल व्यय भार 19,47,95,400 रुपये होने का आकलन किया. इस आकलन का कोई ठोस आधार नहीं था. फिर भी मेनहर्ट इस पर तैयार नहीं हुआ. उसने कुल 27,15,46,000 रुपये की मांग रखी. इसके बाद 18/19 जनवरी 2006 को मुख्य समिति ने बैठक की और तकनीकी उप समिति के आकलन में कमी बताते हुए इसे संशोधित किया और कुल 21,00,30,400 रुपया मेनहर्ट को देने की अनुशंसा की. लेकिन मेनहर्ट 25,40,00,000 रुपये से कम लेने पर तैयार नहीं था. ऐसी स्थिति में निगोशियेशन करने का जिम्मा सरकार स्तर पर भेज दिया गया. 24 जनवरी, 2006 को विभागीय मंत्री और मुख्य समिति ने मेनहर्ट के साथ बैठक कर 21,40,00,000 रुपये पर सहमति बनायी. नगर विकास विभाग की संचिका पर मंत्री के आदेश में परामर्शी को एकमुश्त 21.40 करोड़ रुपये देने का आदेश है. इसमें यह जिक्र नहीं है कि 21.40 करोड़ रुपये में से कितना व्यय डिजाइन फेज के लिए है और कितना सुपरविजन पर्यवेक्षण फेज के लिए है. 21.40 करोड़ रुपये के व्यय पर मंत्रिपरिषद की स्वीकृति 22 जून 2006 को मिली और 22 जून 2006 को ही नगर विकास विभाग से मेनहर्ट को कार्यादेश मिल गया. इस कार्यादेश में डिजाइन फेज के लिए 16.04 करोड़ रुपया और पर्यवेक्षण फेज के लिए 5.36 करोड़ का जिक्र था. सवाल उठता है कि निविदा प्रपत्र में प्री-बिड मीटिंग का प्रावधान नहीं होने के बावजूद 10 बाह्य विशेषज्ञों की सेवा लेने की जरूरत निविदा खुलने के बाद क्यों आ पड़ी? क्या निविदा प्रपत्र में इसका प्रावधान था?

प्री-बिड मीटिंग में तो मेनहर्ट के प्रतिनिधि ने विशेषज्ञों की संख्या घटाने का सुझाव दिया था तब यहां बाह्य विशेषज्ञों की संख्या क्यों बढ़ायी गयी? मात्र 10 बाह्य विशेषज्ञों की सेवा लेने के नाम पर वित्तीय भार का आरम्भिक आकलन 10.20 करोड़ रुपया से बढ़ कर 21.40 करोड़ रुपया कैसे हो गया? वित्तीय निगोशियेशन में इस लोचा का जवाब देने के लिए कोई तैयार नहीं था. स्पष्ट है कि योग्यता मूल्यांकन और तकनीकी मूल्यांकन से लेकर वित्तीय निगोशियेशन तक में मेनहर्ट के समर्थन में पक्षपात किया गया. अयोग्य होने पर भी उसे योग्य मान लिया गया. पक्षपात कर तकनीकी मूल्यांकन में उसे सबसे अधिक अंक दे दिया गया और वित्तीय निगोशियेशन में उसे काफी अधिक राशि दे दी गयी. मेनहर्ट पर सरकार की इस मेहरबानी का कोई तो कारण होगा. कौन है इसके पीछे और किस मंशा से है? क्या यह झारखंड सरकार में लोक सेवकों के भ्रष्ट आचरण का ज्वलंत उदाहरण नहीं है? इसे ‘‘भ्रष्टाचार का नंगा नाच नहीं कहा जाये तो क्या कहा जाये.’’

सार संक्षेप :-

निविदा के योग्यता मूल्यांकन के साथ ही उसके तकनीकी मूल्यांकन में भी मेनहर्ट के पक्ष में पक्षपात किया गया.

निविदा विश्व बैंक के गुणवत्ता आधारित प्रणाली के अनुरूप होने की घोषणा के बावजूद इसमें वित्तीय मूल्यांकन के मापदंडों में पक्षपात की गुंजाइश रखी गयी, जिसका दुरुपयोग तकनीकी उपसमिति और मुख्य समिति ने किया. इन्होंने एकमुश्त अंकों वाले प्रावधानों का मनोनुकूल विखंडन कर मनमाना अंक निर्धारित किया.

समान योग्यता के लिए मेनहर्ट के विशेषज्ञों को अधिक अंक और अन्य विशेषज्ञों को कम अंक दिये गये.

वित्तीय निगोशिएशन में बाह्य विशेषज्ञों के नाम पर 14 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया, जबकि इसका प्रावधान निविदा में नहीं था.

मंत्री स्तर पर निगोशिएशन में 21.40 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि पर मेनहर्ट को कार्य आदेश देने का निर्णय हुआ. इसमें डिजाईन फेज और पर्यवेक्षण फेज का विभाजन नहीं था. परन्तु जब यह विषय स्वीकृति के लिए मंत्रिपरिषद में गया तो नगर विकास विभाग द्वारा 21.40 करोड़ की राशि को डिजाईन फेज (16.04 करोड़ रु.) और पर्यवेक्षण फेज (5.36 करोड़ रु.) में बांट कर दिखाया गया. सवाल है कि यह विभाजन क्यों और किस आधार पर किया?

निविदा मूल्यांकन में हर स्तर पर केन्द्रीय सतर्कता आयोग के प्रावधानों की धज्जियां उड़ायी गयीं और नियम-कानून को ताखे पर रख कर मनोनुकूल परामर्शी की बहाली सुनिश्चित की गयी. कहा गया है-कामातुरानाय न भय, न लज्जा.

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