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मेनहर्ट घोटाला-5 : जिस काम को ओआरजी चार करोड़ में करता उसे मेनहर्ट ने 22 करोड़ में किया

Saryu Roy

ओआरजी और स्पैन की छुट्टी

वित्त एवं नगर विकास मंत्री श्री रघुवर दास ने 8 मार्च 2006 को विधानसभा में मंतव्य दिया. उन्होंने स्वीकार किया कि ‘‘जनहित याचिका संख्या – 3858/02 में माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने रांची शहर में सिवरेज-ड्रेनेज का निर्माण शीघ्र करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया था. तदनुसार पूर्ववर्ती सरकार ने खुली निविदा के आधार पर ‘‘ऑपरेशन रिसर्च ग्रुप प्रा. लि. (ओेआरजी) नामक एक परामर्शी का चयन किया था. समीक्षा में इनका कार्य संतोषप्रद नहीं पाये जाने के कारण वर्तमान सरकार ने इन्हें हटा दिया और परामर्शी चयन के लिए नये सिरे से ग्लोबल टेंडर निकाल कर ‘‘पारदर्शी’’ तरीके से मेनहर्ट को नया परामर्शी बहाल किया गया.’ सवाल यह है कि क्या केवल ओआरजी को ही बहाल किया गया था? या किसी अन्य कंसलटेंसी को भी इसके ही साथ बहाल किया गया था. सच्चाई यह है कि तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इस काम के लिए ‘ओआरजी’ के साथ ही ‘स्पैन ट्रायवर्स मॉर्गन’ को भी उस समय परामर्शी बहाल किया गया था?

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यह तथ्य मंत्री जी ने सदन को नहीं बताया कि ‘स्पैन ट्रायवर्स मॉन’ का काम भी संतोषप्रद था या नहीं था या मेनहर्ट को अधिक कीमत पर बहाल करना था, इसलिए येन-केन-प्रकारेण ‘ओआरजी और स्पैन ट्रायवर्स’ मॉर्गन को रास्ते से हटा दिया गया? इस बारे में सदन में किसी ने सवाल भी नहीं किया. वस्तुस्थिति यह है कि रांची नगर निगम क्षेत्र को दो भागों में बांट कर सिवरेज और ड्रेनेज निर्माण के लिये जुलाई 2003 में राज्य सरकार द्वारा एक निविदा प्रकाशित हुई. इसके लिए दो परामर्शियों का चयन हुआ. वार्ड संख्या 1 से 24 तक के लिये मे. ऑपरेशन रिसर्च ग्रुप (ओआरजी) का और वार्ड संख्या 25 से 37 तक के लिए मे. स्पैन ट्रायवर्स मॉर्गन का. 11 अक्टूबर 2003 को इनके साथ राज्य सरकार और रांची नगर निगम का एग्रीमेंट हुआ. इन्हें रांची नगर निगम क्षेत्र के लिए ड्रेनेज एवं सिवरेज सिस्टम स्थापित करने के लिए निर्माण और पर्यवेक्षण का विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (डीपीआर) तैयार करना था. इन्होंने काम शुरू किया. इनके काम की देख-रेख और जांच-पड़ताल के लिए रांची के उपायुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय कमिटी बना दी गयी. 2005 में झारखंड विधानसभा का चुनाव हुआ. श्री अर्जुन मुंडा पुन: राज्य के मुख्यमंत्री बने. पर नगर विकास विभाग के मंत्री बदल गये. 2005 के पहले झरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्री बच्चा सिंह इस विभाग के मंत्री थे. अब जमशेदपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्री रघुवर दास नगर विकास विभाग के मंत्री बन गये. 1 जून, 2005 को नगर विकास विभाग की समीक्षा बैठक मंत्री जी की अध्यक्षता में हुई. बैठक में ओआरजी द्वारा अब तक किये गये कार्य की समीक्षा की गयी. इनके कार्य प्रतिवेदन को संतोषजनक मान कर ओआरजी को 30 अगस्त, 2005 तक फाइनल डीपीआर दे देने के लिए निर्देश दिया गया. निर्णय हुआ कि इस डीपीआर के आधार पर शीघ्र रांची नगर निगम के 10 वार्डों में सिवरेज और ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जायेगा.

इस कार्य के लिए हुडको 90 प्रतिशत ॠण देगा और शेष 10 प्रतिशत राशि राज्य सरकार लगायेगी. यह खबर अगले दिन 2 जून को रांची के प्रभात खबर सहित अन्य अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित हुई. 2 जून 2005 को अचानक मंत्री जी के कार्यालय कक्ष में फिर एक बैठक बुलाई गयी. उसमें निर्णय हुआ कि ‘ओआरजी और स्पैन ट्रायवर्स मॉर्गन’ को परामर्शी के काम से हटा दिया जाये क्योंकि इन्होंने काम पूरा करने में देरी की है और इनका काम संतोषजनक नहीं है. विस्तार से यह नहीं देखा गया कि ओआरजी और स्पैन ने कितना काम किया है? अब तक इन्होंने कितने आरम्भिक (inception) प्रतिवेदन और कितने प्रारम्भिक ((Preliminary) परियोजना प्रतिवेदन जमा किया है? इनमें से कितने प्रतिवेदन स्वीकृति के लिए रांची नगर निगम के यहां या सरकार के यहां कितनों दिनों से लंबित हैं? इनके प्रतिवेदनों की समीक्षा करने के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति का इनके कार्यों के बारे में क्या आकलन है? इन्हें किस-किस काम का कितना भुगतान हुआ है? आदि आदि. इस पर भी विचार नहीं हुआ कि ओआरजी और स्पैन के साथ रांची नगर निगम का जो एग्रीमेंट हुआ है, उसमें इन्हें हटाने की शर्तें क्या हैं? यह सब विचारे बिना नगर विकास मंत्री की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में इन्हें हटाने का एकतरफा निर्णय कर लिया गया. विभाग ने 15 जून 2005 को ओआरजी और स्पैन को काम से हटाने का आदेश जारी कर दिया. रांची नगर निगम के प्रशासक ने अपना पल्ला झाड़ते हुए 17 जून 2005 को इन्हें सूचना भेज दी कि राज्य सरकार ने 15 जून 2005 को आदेश दिया है कि रांची के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण के लिए आपकी सेवा नहीं ली जाये. इसलिये 11 अक्टूबर 2003 को आपके साथ हुआ एग्रीमेंट रद्द किया जाता है. यदि आपका कोई बकाया है तो 27 जून 2005 तक नगर निगम कार्यालय को बतायें. उल्लेखनीय है कि इनका एग्रीमेंट रांची नगर निगम के साथ हुआ था, राज्य सरकार या नगर विकास विभाग के साथ नहीं.

ओआरजी का मुकदमा रांची नगर निगम और झारखंड सरकार में विभिन्न स्तरों पर वार्ता एवं पत्राचार का कोई नतीजा नहीं निकला तो इस आदेश के खिलाफ ओआरजी हाइकोर्ट चली गयी. स्पैन ट्रायवर्स मॉर्गन चुपचाप बैठ गयी. लंबी मुकदमेबाजी के उपरांत झारखंड हाइकोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत फैसला करने के लिए केरल हाइकोर्ट के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति यूपी सिंह को इस केस में आर्बिट्रेटर (मध्यस्थ) बहाल कर दिया. न्यायमूर्ति सिंह ने लंबी सुनवाई के बाद 30 मई 2012 को फैसला दिया कि झारखंड सरकार द्वारा ओआरजी को काम से हटाना सही नहीं था. ओआरजी ने सरकार के साथ हुए एग्रीमेंट के अनुसार काम किया है. इसे नगर निगम के उप प्रशासक ने भी और उच्चस्तरीय समिति के अध्यक्ष सह रांची के उपायुक्त ने भी अलग-अलग तिथियों को जारी अपने परिपत्रों में स्वीकार किया है. एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन करते हुए ओआरजी को काम से हटाने के एकतरफा निर्णय को गलत बताते हुए विद्वान न्यायाधीश ने कहा कि ओआरजी द्वारा किये गये काम के एवज में मेहनताना और हर्जाना मिला कर 3,61,98,816 (तीन करोड़ इकसठ लाख अन्ठानवे हजार आठ सौ सोलह) रुपये लेने का हकदार है, जिसका भुगतान सरकार करे.

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न्यायमूर्ति यूपी सिंह के फैसले में अंकित तथ्य चौंकानेवाले हैं जिनसे साबित होता है कि ओआरजी ने अपना काम समय पर पूरा कर दिया था. फैसला में कहा गया है कि इसने आरम्भिक (Inception) रिपोर्ट जमा की थी जिसके लिए नगर निगम ने भुगतान किया है. इसने प्रारंभिक परियोजना प्रतिवेदन भी जमा किया था जिसे सरकार द्वारा रांची के उपायुक्त के नेतृत्व में गठित समिति ने स्वीकार किया था. इसने 10 वार्डों का पुनरीक्षित परियोजना प्रतिवेदन भी जमा किया था. 1 जून, 2005 को नगर विकास मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में इन्हीं 10 वार्डों में सिवरेज-ड्रेनेज कार्य शीघ्र शुरू करने का निर्णय हुआ था. जिस दिन नगर विकास विभाग के मंत्री की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में ओआरजी को हटाने का निर्णय हुआ, उसके एक दिन पहले तक इसने अपने प्रतिवेदन जमा किये थे. सवाल है कि इस समीक्षा बैठक में किसी विभागीय अधिकारी ने इन तथ्यों को मंत्री महोदय के सामने रखा या नहीं? यदि इसे रखा तो फिर किस कारण से ओआरजी को हटाने का निर्णय हुआ?

रांची नगर निगम के उप प्रशासक ने नगर विकास विभाग के अपर सचिव का 02.07.2005 और 22.10.2005 को दो पत्र लिखे. ये दोनों पत्र ओआरजी को हटा दिये जाने के बाद लिखे गये हैं. 2 जुलाई 2005 को लिखे गये पत्र में अंकित थी कि ‘ओआरजी’ की आरम्भिक रिपोर्ट को रांची के उपायुक्त ने स्वीकार किया है. इसके बाद ‘ओआरजी’ को इसके लिए 96 लाख रुपये का भुगतान किया गया था. इस पत्र में आगे कहा गया है कि ‘ओआरजी’ द्वारा दिये गये ये सभी प्रतिवेदन उपायुक्त, रांची की अध्यक्षता वाली ‘हाई लेबल कमिटी’ के पास भी और सीधे सरकार के पास भी जमा किये जाते रहे हैं. इस बारे में किये जानेवाले निर्णयों के लिए हुई बैठकों की कार्यवाहियां भी नियमित रूप से सरकार और उपायुक्त, रांची की अध्यक्षता वाली समिति के पास भेजी जाती रही हैं. जिस दिन नगर विकास मंत्री की अध्यक्षता वाली कमिटि में ‘ओआरजी’ को हटाने का निर्णय हुआ उसके एक दिन पहले भी ‘ओआरजी’ के प्रतिवेदन सौंपे गये हैं. एक बार पूर्व में 3 फरवरी 2005 को भी कभरिंग लेटर (व्याख्या पत्र) के साथ इन्हें भेजा गया है. 22 अक्टूबर 2005 के पत्र मे अंकित है कि ‘ओआरजी’ द्वारा प्रारम्भिक परियोजना प्रतिवेदन जमा कर दिया गया है और रांची के उपायुक्त की अध्यक्षता वाली कमेटी ने इसे स्वीकार भी कर लिया है. इसके लिए परामर्शी द्वारा जमा बिल का भुगतान किया जाना उचित है. स्पष्ट है कि ‘ओआरजी’ को काम से हटाने के लिए दिये जानेवाले तर्कों में कोई दम नहीं है. ‘ओआरजी’ ने प्रतिवेदन जमा किया था जिनमें से कुछ के लिए भुगतान भी सरकार से हुआ है. वस्तुतः ओआरजी को गलत तरीका से हटाने के निर्णय के साथ मेनहर्ट को अनियमित रूप से बहाल करने के तार जुड़े हुए हैं. ज्ञातव्य है कि हटाने के पहले सरकार ‘ओआरजी’ को 96 लाख रुपये का भुगतान कर चुकी थी. ‘ओआरजी’ को हटाया जाना सही नहीं था, इस कारण कि एक ओर माननीय न्यायमूर्ति यूपी सिंह ने अपने पंच फैसला में उसके नुकसान की भरपाई करने के लिए 3 करोड़ 61 लाख 98 हजार 816 रुपये का हर्जाना देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया था. दूसरा कि जब सरकार ने यही काम करने के लिए 21.40 करोड़ रुपये में मेनहर्ट को बहाल कर लिया तो ‘ओआरजी’ द्वारा किये गये इस कार्य को भी उसे 96 लाख रुपये में बेच दिया. यदि ‘ओआरजी’ का काम सही नहीं था तो आखिर क्यों मेनहर्ट ने इसके लिए 96 लाख रुपये दिये. वस्तुतः ओआरजी ने रांची के सिवरेज-ड्रेनेज का डीपीआर (विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन) तैयार करने का काम पूरा कर लिया था. डीपीआर को सरकार द्वारा स्वीकृत कर देने के बाद अधिक से अधिक 3 माह के समय के भीतर इन संशोधनों को समाहित कर ‘ओआरजी’ पूर्ण परियोजना प्रतिवेदन सरकार को सौंप देता. इसी काम के एवज में न्यायमूर्ति यूपी सिंह ने उसे 3.62 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया था. इस तरह ओआरजी का यह काम 4 करोड़ रुपये के आस-पास खर्च पर पूरा हो जाता, जिसके लिए ‘मेनहर्ट’ को 21.40 करोड़ रुपये देने की बात तय हुई. ‘ओआरजी’ द्वारा किया गया पूरा आधारभूत कार्य भी मेनहर्ट को मात्र 96 लाख में मिल गया.

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सार संक्षेप

  1. ओआरजी को काम से हटाना सही नहीं था. न्यायमूर्ति यूपी सिंह के पंच फैसला से स्पष्ट है कि ओआरजी समय-समय पर प्रतिवेदन देता रहता था. प्रतिवेदन को स्वीकृत करने या सुझाव देकर लौटाने में सरकार के यहां देर होती थी. ओआरजी को काम करने दिया गया होता तो रांची नगर निगम के 1 से 24 वार्डों में सिवरेज-ड्रेनेज का काम अबतक पूरा हो गया होता जिस काम के लिए मेनहर्ट को 21.40 करोड़ पर बहाल किया गया वह काम करीब 4 करोड़ रुपये में हो गया होता.
  2. 1 जून 2005 को ओआरजी के काम को सही ठहरा कर 30 अगस्त, 2005 तक अंतिम प्रतिवेदन देने का आदेश नगर विकास मंत्री की अध्यक्षता में हुई सभी को बैठक में दिया गया और अगले दिन ही इनको काम से हटा देने का निर्णय हो गया. यह निर्णय सामान्य निर्णय नहीं है. उस रात जरूर कुछ न कुछ ऐसा हुआ है कि नगर विकास विभाग के मंत्री को अपना फैसला बदलना पड़ा.
  3. ओआरजी-स्पैन को हटाना एक बहाना था. सच तो यह है कि येन-केन-प्रकारेण मेनहर्ट को लाना था. पंचाट के फैसला अनुसार ‘ओआरजी’ सरकार से 3 करोड़ 62 लाख रूपया का मुआवजा लेने का हकदार है. इसकी वसूली मेनहर्ट को बहाल करने के दोषियों से की जानी चाहिए.
  4. ओआरजी ने ड्राफ्ट पीपीआर तक काम कर दिया था. न्यायमूर्ति यूपी सिंह ने इसकी कीमत 3.62 करोड़ रुपये लगायी है. सरकार ने ओआरजी का यह काम केवल 96 लाख रुपये में मेनहर्ट को दे दिया. यदि यह काम संतोषप्रद था तभी मेनहर्ट ने कीमत चुकायी. यह सरकार और मेनहर्ट के बीच साठ-गांठ का द्योतक है कि ओआरजी द्वारा किया गया 24 वार्डों का काम मेनहर्ट को सस्ते में मिल गया.

डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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