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मेनहर्ट घोटाला-4 : विपक्ष सिर्फ यह चाहता था कि मामले की जांच विधानसभा की समिति करे, दोषियों पर कार्रवाई से कोई सरोकार नहीं था

Saryu Roy

Ranchi: विधान सभा में मेनहर्ट- 7 मार्च 2006. झारखंड विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था. प्रश्न काल के दौरान ‘विभिन्न चर्चा’ में सदन के वरिष्ठतम सदस्य श्री स्टीफेन मरांडी ने सवाल उठाया कि सरकार के कैबिनेट ने कल रांची के सिवरेज-ड्रेनेज के लिए मेनहर्ट नामक कंसल्टेंट की बहाली 22 करोड़ रुपये की लागत पर की है. उन्होंने कहा कि एक ओर वित्तीय वर्ष के अंत में खर्च करने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है और दूसरी ओर सरकार खजाने का दुरुपयोग कर रही है. यह बहुत गम्भीर मामला है, यह पैसे की लूट है. इस पर माननीय अध्यक्ष श्री इन्दर सिंह नामधारी ने वित्त एवं नगर विकास मंत्री श्री रघुवर दास को निर्देश दिया कि ‘‘उसके पीछे क्या मकसद है यह बतायें. ‘‘ श्री रघुवर दास ने बताया कि ‘‘भारत सरकार ने ड्रेनेज व सिवरेज के लिए झारखंड सरकार को कहा है कि कंसल्टेंट नियुक्त करके डीपीआर मास्टर प्लान बनायें. ड्रेनेज सिवरेज में जो खर्च होगा, उसमें 50 परसेंट पैसा भारत सरकार देगी. इसी को ध्यान में रख कर हमलोगों ने कंसल्टेंसी बहाल की है.’’ इस पर काफी शोरगुल हुआ. इस कारण विधानसभा की पहली पाली में अन्य कोई काम नहीं हुआ.

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8 मार्च 2006. विधानसभा की कार्यवाही आरम्भ होते ही व्यवधान शुरू हुआ. सत्ता पक्ष और विपक्ष के सभी माननीय सदस्य वेल में आ गये. सभा अध्यक्ष ने कहा- ‘‘कल जो तनाव के क्षण थे जिस समय माननीय विपक्ष के सदस्यों ने कंसल्टेंसी का विषय उठाया था और कई तरह के नारे दिये थे, उसके उत्तर में माननीय वित्त मंत्री जी के मुंह से भी कुछ शब्द निकले थे, उस पैन्डेमोनियम (शोरगुल) में मैंने किसी का नोटिस नहीं लिया. क्योंकि अगर आप किसी को कमीशनखोर कहते हैं तो आपके पास कोई साक्षात प्रमाण होना चाहिए. इस पर नेता प्रतिपक्ष श्री सुधीर महतो ने कहा- ‘‘अध्यक्ष महोदय, प्रमाण है, प्रमाण है अध्यक्ष महोदय.’’ इसके कुछ देर बाद मंत्री श्री रघुवर दास ने कहा-‘‘सांच को आंच क्या.’’ मैं जांच कराने के लिए तैयार हूं. दूसरी बात, अगर कल की (मेरी) बातों से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचा, तो मैं खेद प्रकट करता हूं. इस पर श्री स्टीफेन मरांडी ने कहा कि विधान सभा की समिति से इसकी जांच करा दी जाये. माननीय सभा अध्यक्ष ने कहा कि मैं बीच का रास्ता निकालता हूं. मैं फाइल मंगवा लूंगा, 3-4 लोग अपोजिशन के रहें, मंत्री जी को भी साथ में बैठा लूंगा. इसके बाद लगता है कि सदन की सर्वदलीय समिति बननी चाहिए तो मैं आश्वासन देता हूं कि वो कर दिया जायेगा.

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मंत्री श्री रघुवर दास ने सभाध्यक्ष से मुखातिब होकर कहा कि 4-5 को बुलाने की जरूरत नहीं है. श्री स्टीफेन मरांडी ने सवाल उठाया है उनको बुला लीजिये. इस पर श्री स्टीफेन मरांडी ने कहा कि जिनके विरुद्ध अभियोग है, उनको क्यों बैठाइयेगा. इस पर सभाध्यक्ष ने नियमन दिया कि कल इस पर ‘अल्पकालीन चर्चा’ होगी.

अगले दिन 9 मार्च 2006. 10 बजे पूर्वाह्न विधानसभा में रांची शहर में सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण के लिए कंसल्टेन्सी की नियुक्ति पर ‘अल्पकालीन चर्चा’ शुरू हुई. चर्चा के दौरान पक्ष-विपक्ष में तीखी नोकझोंक होती रही. विधानसभा अध्यक्ष को पांच बार सदन की कार्रवाई स्थगित करनी पड़ी. विपक्ष के सदस्य कहते थे कि मेनहर्ट को परामर्शी नियुक्त करने में भारी अनियमितता हुई है, इसकी जांच विधानसभा की समिति से करायी जाये. जबकि सत्ता पक्ष कहता था कि नियुक्ति टेंडर से हुई है. टेंडर विश्व बैंक के मानदंड पर हुआ है, टेंडर का मूल्यांकन पारदर्शी तरीके से हुआ है. इसलिए जांच की कोई जरूरत नहीं है. मंत्री श्री रघुवर दास ने सदन को बताया कि ‘‘राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समाचार पत्रों में दिनांक 30.6.2005 को निविदा का प्रकाशन किया गया. निविदा की प्रमुख शर्त थी कि निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में (तकनीकी और वित्तीय प्रस्ताव के लिए अलग-अलग) आमंत्रित की गयी. विश्व बैंक की मार्गदर्शिका के आधार पर दो लिफाफा पद्धति अपनाते हुए क्वालिटी बेस्ड सेलेक्शन हुआ. अध्यक्ष महोदय, हमने इसे टेंडर पेपर में भी अंकित किया था कि किसे हमें खोलना है और क्वालिटी में जो बेस्ट आयेगा उसी का टेंडर खुलेगा. यह हमने टेंडर पेपर में भी अंकित कर दिया था. इसमें तकनीकी रूप से सर्वोच्च अंक पाने वाले का ही वित्तीय बिड खोला जाता है तथा दर वार्ता करके शुल्क का अंतिम रूप से निर्णय होता है. अध्यक्ष महोदय, आपने जो प्रश्न उठाया था तो जो टेंडर डाक्युमेंट है उसके अनुसार हम नहीं करते, तो दूसरा पार्टी कोर्ट चला जाता. महोदय, मुख्य समिति ने 18.9.2005 को तकनीकी उपसमिति के प्रतिवेदन पर विचार किया. सभी फाइलों की विस्तृत समीक्षा मुख्य समिति द्वारा की गयी. मुख्य समिति के स्तर पर अंतिम निर्णय नहीं हो सका. मुख्य समिति ने सभी तथ्यों को नगर विकास विभाग को भेजते हुए राज्य सरकार के स्तर पर यथोचित कारवाई करने की अनुशंसा की. मंत्री स्तर से भी हमने कार्रवाई की है. मंत्रिपरिषद द्वारा मेसर्स मेनहर्ट सिंगापुर प्रा. लि. को 21 करोड़ 40 लाख रुपये के शुल्क खर्चे पर परामर्शी नियुक्त करने हेतु सहमति दी गयी.

मंत्री के वक्तव्य को विपक्ष के सदस्यों ने सिरे से नकार दिया और जांच कमिटि बनाने की मांग पर अड़े रहे. सदन दो बार स्थगित करने के बाद भी बात नहीं बनी तो सभाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा से हस्तक्षेप करने के लिए कहा. मुख्यमंत्री ने परामर्शी नियुक्त करने की जरूरत के बारे में विस्तार से सदन को बताया और कहा कि मंत्रिपरिषद में जाने के पहले संचिका मेरे पास भी आयी थी. मैंने एक प्रेजेंटेशन भी देखा था. मैंने कहा कि विश्व बैंक के जो मापदंड हैं, उन सारी चीजों को ध्यान में रख कर किया गया है कि नहीं, इन सारी चीजों को देख कर के मंत्रिपरिषद में लाया जाये. ये सोच कर हमने किया है और ट्रांसपरेंट वे में किया है. परंतु माननीय सदस्यों को इस बात की आशंका है, तो मैं उस आशंका को भी ध्यान में रखते हुए मंत्रिपरिषद में फिर से, हमलोग इस गंभीर विषय में, फिर से जिन विषयों पर आपने प्रकाश डाला, उन सारे विषयों को ध्यान में रखते हुये फिर से इसकी समीक्षा करेंगे. इसके बाद विपक्ष के सदस्य वेल में आ गये. सभाध्यक्ष ने समझाया कि ‘‘मुख्यमंत्री जी कह रहे हैं कि इसको हमलोग फिर से कैबिनेट में ले जाते हैं, पूरा रिव्यू कर लेते हैं, आप सभी सीट पर चले जाइये. विपक्ष का हंगामा नहीं थमा तो सभाध्यक्ष ने सदन को तीसरी बार स्थगित कर दिया. दूसरी पाली में सदन पुन: बैठा तो विपक्ष ने पुन: हंगामा शुरू किया, वेल में आ गये. सभाध्यक्ष ने चौथी बार 10 मिनट के लिए सदन को स्थगित कर दिया. स्थगन के बाद सभाध्यक्ष के आसन ग्रहण करते ही विपक्षी सदस्य पुन: वेल में आ गये. कुछ देर बाद सभाध्यक्ष के आग्रह पर विपक्ष के सभी सदस्य अपने स्थान पर चले गये. सभाध्यक्ष ने कहा कि नगर विकास मंत्री रघुवर दास कुछ कहना चाहते हैं. इस पर विपक्ष के सभी सदस्य पुन: वेल में आ गये. वे श्री रघुवर दास को सुनने के लिए तैयार नहीं थे.

सभाध्यक्ष के बार-बार कहने के बाद भी विपक्षी सदस्य अपने स्थान पर नहीं गये और वेल में ही डटे रहे तो सभाध्यक्ष ने पांचवीं बार 3.30 बजे अपराह्न तक सदन स्थगित कर दिया. स्थगन के बाद आसन ग्रहण करते ही सभाध्यक्ष ने मंत्री रघुवर दास से बोलने के लिए कहा. मंत्री रघुवर दास ने कहा कि ‘‘अध्यक्ष महोदय मैंने पूर्व में भी कहा था और अभी भी कह रहा हूं कि सांच को आंच क्या, इसलिए जब माननीय सदस्यों का सुझाव है,  सदन की कमेटी का तो सरकार को कोई आपत्ति नहीं है. सभा अध्यक्ष ने नियमन दिया कि इस पर सदन की समिति बना दी जायेगी. तदुपरांत इस तरह रांची के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण के लिए मेनहर्ट को परामर्शी नियुक्त करने में अनियमितता बरते जाने के विपक्ष के आरोपों पर झारखंड विधानसभा में तीन दिनों से जारी गतिरोध समाप्त हुआ. इसकी जांच के लिए विधानसभा की समिति गठित करने के लिए सभाध्यक्ष ने नियमन दिया.

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सार संक्षेप-

  1. परामर्शी की नियुक्ति पर विधानसभा में तीन दिन तक हुई हंगामेदार बहस हुई.

तदुपरांत विधानसभा अध्यक्ष ने विशेष जांच समिति गठित करने का नियमन दिया. विधानसभा के जिन माननीय सदस्यों ने जिन स्रोतों से मिली सूचना के आधार पर यह विषय सभा में उठाया, उनकी सूचना सही थी, परन्तु उन्होंने विषयवस्तु का गहन अध्ययन नहीं किया था. यदि अध्ययन किया था, तो सही तरीके से उसे प्रस्तुत नहीं कर सके. विधानसभाध्यक्ष ने जांच का नियमन दिया तो उसका कारण वाद-विवाद की गुणवत्ता नहीं, अपितु सदन के वेल में आकर विपक्षी सदस्यों का हंगामा करना था, उनके फेफड़ों की ताकत थी.

  1. नगर विकास मंत्री श्री रघुवर दास ने विधान सभा को गुमराह किया. विधान सभा अध्यक्ष से तथ्य ही नहीं छुपाया बल्कि झूठ भी बोला. उन्होंने जोर देकर सभा को बताया कि निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में मंगायी गयी थी. एक तकनीकी और दूसरा वित्तीय. जबकि सच्चाई यह है कि निविदा तीन लिफाफों में मांगी गयी थी. तीसरा लिफाफा योग्यता का था, जिसमें मेनहर्ट अयोग्य था. यह बात उन्हें पता थी, इसलिए उन्होंने निविदा में योग्यता के लिफाफा की बात छुपा ली, सदन से झूठ बोल दिया.
  2. सदन में वाद-विवाद के दौरान दो अवसर आये जब इस विषय पर गहन मंथन कर समाधान निकाला जा सकता था. पहला मौका था जब विधानसभा अध्यक्ष ने सदन में सवाल उठानेवाले सदस्यों से आग्रह किया कि वे ‘‘संबंधित कागजात अपने कार्यालय में मंगा लेते हैं, विपक्ष के दो-चार लोग रहें और नगर विकास के मंत्री रहें’’. पर इस पर पक्ष-विपक्ष के लोग राजी नहीं हुए. अन्यथा माननीय सभा अध्यक्ष के कार्यालय कक्ष में उसी समय इसका निपटारा हो गया होता.
  3. दूसरा मौका था जब सदन में मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि वे इस विषय में फिर से कैबिनेट में विचार करेंगे. यदि पहले मंत्रिपरिषद से कोई चूक हुई है तो दोबारा मंत्रिपरिषद में लाकर इसे सुधार लिया जायेगा. विपक्ष के सदस्य यदि मुख्यमंत्री का यह अनुरोध मान लिये होते तो मंत्रिपरिषद में पुनर्विचार के बाद मेनहर्ट को दिया गया आदेश उसी समय रद्द हो गया होता.
  4. यदि विपक्ष के सदस्य गम्भीर होते और विषय वस्तु का गहन अध्ययन किया होता तो सदन को झूठी जानकारी देने के लिए मंत्री श्री रघुवर दास के खिलाफ सदन अवमानना का प्रस्ताव लाते और मेनहर्ट की बहाली में हुई अनियमितता की पोल वहीं खुल जाती. पर विपक्ष के सदस्य तो अड़े रहे कि इसकी जांच सदन की सर्वदलीय समिति से ही करायी जाये.
  5. जब सभाध्यक्ष ने जांच के लिए विशेष समिति की घोषणा कर दी तो इसी के साथ इस विषय के बारे में सक्रियता भी समाप्त हो गयी. विपक्ष की मानो अनियमितता और भ्रष्टाचार को दूर करना और इसके दोषियों को चिन्हित करना नहीं बल्कि सदन की विशेष जांच समिति गठित करा कर सत्ता पक्ष को नीचा दिखाना ही इस विषय को उठाने का उनका मुख्य मकसद था.

डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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