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मेनहर्ट घोटाला- 3 : जिन काले कारनामों को सामने लाया गया है, वे सब अक्षरश: सही हैं, उसके बाद क्या होना चाहिए था और क्या हुआ?

Saryu Roy

Ranchi: 2006 में झारखंड विधानसभा के तत्कालीन अध्यक्ष श्री इंदर सिंह नामधारी ने विधान सभा की एक नयी समिति का गठन किया. इसका नाम रखा-कार्यान्वयन समिति. विधानसभा की कई समितियां होती हैं जो कार्य एवं प्रक्रिया नियमावली के अधीन काम करती हैं. विधानसभा का सत्र नहीं चलने की अवधि में भी ये समितियां कार्यरत रहती हैं. इसलिए इन्हें लघु विधानसभा भी कहा जाता है. इनमें से कुछ समितियां स्थायी होती हैं और कुछ विधानसभा अध्यक्ष के विवेकानुसार समय और परिस्थिति के अनुसार गठित की जाती हैं.

कार्यान्वयन समिति ऐसी ही एक समिति थी जिसे माननीय सभा अध्यक्ष द्वारा एक विशेष उद्देश्य से गठित किया गया था. विधानसभा की विभिन्न स्थायी-अस्थायी समितियों की अनुशंसाओं को सरकार से कार्यान्वित कराना और कार्यान्वयन की समीक्षा करना इस समिति का उद्देश्य था. इसके पहले तक झारखंड विधानसभा की विभिन्न समितियां अपनी अनुशंसाओं का क्रियान्वयन सरकार से स्वयं कराया करती थीं. अब विधानसभा की सामान्य प्रयोजन समिति यह दायित्व निभाती है. माननीय सभा अध्यक्ष ने महसूस किया कि विधानसभा समितियां अपनी अनुशंसाओं का कार्यान्वयन तत्परता पूर्वक सरकार से नहीं करा पा रही हैं. संबंधित समितियां विषय वस्तु के विविध पहलुओं का गहन विश्लेषण के उपरांत मेहनत करके अनुशंसा तो दे देती हैं, परंतु सरकार से इन अनुशंसाओं का कार्यान्वयन कराने के प्रति उतना सक्रिय एवं सजग नहीं रहती हैं. इससे विधायिका की साख प्रभावित हो रही है. विधानसभा अध्यक्ष इस मान्यता के प्रति दृढ़ थे कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है. यह मान्यता केवल सिद्धांत में ही नहीं बल्कि व्यवहार में भी परिलक्षित होनी चाहिए. इसलिए विभिन्न समितियों की अनुशंसाओं का कार्यान्वयन तत्परता से कराने के लिए उन्होंने विधानसभा की एक अलग समिति बना दी. इस समिति का नाम रखा-कार्यान्वयन समिति. मुझे उन्होंने इस समिति का पहला सभापति नामित किया. कार्यान्वयन समिति ने काम करना आरम्भ किया तो विधान सभा सचिवालय ने विधान सभा की विभिन्न समितियों की अनुशंसाओं से संबंधित समस्त संचिकाएं कार्यान्वयन समिति के पास भेज दीं जिनका कार्यान्वयन सरकार के स्तर पर लंबित था. इनमें रांची के सिवरेज-ड्रेनेज के लिए मेनहर्ट को परामर्शी बनाने में हुई अनियमितता की जांच करने के लिए विधानसभा द्वारा गठित विशेष जांच समिति का प्रतिवेदन भी शामिल था.

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कार्यान्वयन समिति की पहली बैठक 24.6.2006 को हुई, जिसमें सभा समितियों की अनुशंसाओं का अध्ययन कर इनके क्रियान्वयन की प्रगति के बारे में संबंधित विभागों से प्रतिवेदन मांगने का निर्णय हुआ. नगर विकास विभाग ने तत्परता पूर्वक सूचित किया कि मेनहर्ट परामर्शी की नियुक्ति में अनियमितता की जांच करने के लिए सभा अध्यक्ष द्वारा गठित विधान सभा की विशेष जांच समिति का प्रतिवेदन लागू कर दिया गया है. उल्लेखनीय है कि परामर्शी नियुक्ति में हुई अनियमितता को लेकर सदन पटल पर लगातार तीन दिनों (7, 8 और 9 मार्च 2006) तक तत्कालीन नगर विकास मंत्री श्री रघुवर दास के विरूद्ध भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के गंभीर आरोप लगते रहे. सदन बार-बार स्थगित होता रहा. तब जाकर सरकार ने आरोपों की जांच सदन से कराना स्वीकार किया. तदुपरांत आरोपों की जांच विधानसभा की विशेष जांच समिति से कराने का सभा अध्यक्ष का नियमन हुआ.

भ्रष्टाचार के आरोपों की सभा अध्यक्ष के आदेश से जांच के लिए सदन के सात माननीय वरिष्ठ सदस्यों की ‘विशेष जांच समिति’ गठित हुई. विधान सभा द्वारा गठित इस विशेष जांच समिति की अनुशंसा थी कि कतिपय तकनीकी पहलुओं की जांच करने के बाद सरकार आगे की कार्रवाई कर सकती है. सभापति के नाते मैंने नगर विकास विभाग के अधिकारियों से जानकारी मांगी कि इस विशेष जांच समिति की अनुशंसा के इस बिन्दु का कार्यान्वयन किस भांति हुआ है. साथ ही मैंने रांची के सिवरेज-ड्रेनेज के निर्माण एवं पर्यवेक्षण के लिए परामर्शी नियुक्त करने की प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी मांगी. कार्यान्वयन समिति की बैठकों में विभागीय सचिव एवं अन्य अधिकारियों के साथ विमर्श कर विधान सभा के विशेष जांच समिति की अनुशंसा के तकनीकी पहलुओं को समझने का प्रयास हुआ. प्रथमदृष्ट्या शंका हुई कि दाल में कुछ काला है. पर नगर विकास विभाग द्वारा इस बारे में उपलब्ध कराये गये दस्तावेज के अध्ययन एवं पदाधिकारियों से की गयी पृच्छा के बाद स्पष्ट हो गया कि केवल दाल में कुछ काला नहीं है, बल्कि यहां तो पूरी दाल ही काली है. इस पृष्ठभूमि में काफी उम्मीद से गठित विधानसभा की विशेष जांच समिति एक अति गम्भीर मामले (राज्य की राजधानी रांची में सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण के लिए परामर्शी चयन के बारे) में ऐसा सतही प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी, यह मेरी सोच से परे था, कल्पनातीत था, निराश करनेवाला था. बे-सिर-पैर वाली इसकी सतही अनुशंसा तो और भी विचित्र थी. झारखंड सरकार के नगर विकास विभाग द्वारा इसके त्वरित कार्यान्वयन का दावा उससे भी विचित्र था. कार्यान्वयन समिति ने इसकी तह तक जाने का निर्णय किया. इसके लिए माननीय विधान सभा अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त की गयी. तदुपरांत नगर विकास विभाग से संबंधित दस्तावेज मांगे गये. उनके अध्ययन के बाद निविदा के मूल्यांकन से जुड़े इंजीनियरों और अफसरों को समिति की बैठकों में बुला कर जानकारियां ली जाने लगीं. उनके बयान अंकित किये जाने लगे, उनसे प्रासंगिक कागजात सौंपने के लिए कहा जाने लगा, निविदा निष्पादन से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर सवाल किया जाने लगा तो मानो हड़कम्प मच गया, सूचनाएं छुपायी जाने लगीं. परेशान अफसरों और अभियंताओं ने अपनी चिंता नगर विकास मंत्री तक पहुंचा दी. तब श्री रघुवर दास नगर विकास विभाग के मंत्री थे, वे सरकार के वित्त मंत्री भी थे. विधानसभा में बहस के दौरान पहले तो वे इस मामले की जांच विधानसभा की विशेष समिति से कराने की विपक्ष की मांग को मानने से इंकार करते रहे. बाद में सभा अध्यक्ष का रुख देख कर जांच कराने पर राजी हुए.

विधानसभा के पटल पर चिल्ला कर उन्होंने कहा सांच को आंच क्या? पर जब कार्यान्वयन समिति ने सांच की जड़ तक पहुंचनेवाली जानकारियां उनके विभाग से मांगना शुरू की तो वे जांच को बाधित करने पर उतर आये. शुरू में वे इस प्रयास में कुछ हद तक सफल भी रहे. पर कार्यान्वयन समिति भी अपने निश्चय पर दृढ़ रही. जांच पूरी हुई, विधानसभा अध्यक्ष और सरकार के पास प्रतिवेदन भेजा गया. सरकार के आदेश से प्रतिवेदन की अनुशंसाओं मे विहित तथ्यों की उच्चस्तरीय जांच हुई, निगरानी विभाग के तकनीकी परीक्षण कोषांग ने भी जांच की. प्रत्येक जांच में कार्यन्वयन समिति का प्रतिवेदन खरा उतरा. साबित हो गया कि कार्यान्वयन समिति के प्रतिवेदन में जो अनियमितताए, त्रुटियां उजागर की गयीं. जिन काले कारनामों को सामने लाया गया है, वह सब अक्षरश: सही है. उसके बाद क्या होना चाहिए था और क्या हुआ? जो होना चाहिए था वह क्यों नहीं हुआ? अब क्या हो रहा है, और आगे क्या होना चाहिये? इसके बारे में सर्वसामान्य को जानकारी देना इस पुस्तक का उद्देश्य है.

कार्यान्वयन समिति का प्रतिवेदन विधान सभा अध्यक्ष के सामने प्रस्तुत हुआ तो भारतीय जनता पार्टी, झारखंड प्रदेश के तत्कालीन संगठन महामंत्री श्री रंजन पटेल ने यह प्रतिवेदन देखने की जिज्ञासा प्रकट की. मैंने उन्हें प्रतिवेदन की छाया प्रति अवलोकनार्थ उपलब्ध करा दी. उन्होंने इस प्रतिवेदन या इस प्रतिवेदन के सार-संक्षेप के बारे में मौखिक या लिखित रूप में भाजपा के राष्ट्रीय अधिकारियों को दिखाया या बताया कि नहीं इसकी जानकारी मुझे नही मिली, लेकिन मुझ पर आरोप लगाये गये, मेरी मंशा पर संदेह व्यक्त किया गया कि मेरे इस प्रतिवेदन से राजनीतिक प्रतिद्वंद्दिता की झलक मिलती है. मुझे स्मरण है कि कार्यान्वयन समिति की कार्यवाही के दौरान उभर कर आ रहे तथ्यों के बारे में मैंने तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्री इंदर सिंह नामधारी को अवगत कराया था. उन्होंने मुझे और नगर विकास मंत्री को अपने कार्यालय कक्ष में बुलाया था. पर नगर विकास विभाग मंत्री की अकड़ के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी. उसी शाम विधानसभा अध्यक्ष ने हम दोनों को कांके रोड, रांची स्थित अपने आवास पर बुलाया. मैं तो ससमय पहुंच गया, पर मंत्री नहीं आये. नामधारी जी के आग्रह पर उन्होंने मुझसे दूरभाष पर इस बारे में संक्षिप्त वार्तालाप अवश्य किया. परंतु फिर वही ढाक के तीन पात. इस संदर्भ में भाजपा संगठन में जिला से लेकर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर तक मेरे विरुद्ध प्रचार हुआ. मिथ्या धारणा बनाने की सुनियोजित कोशिश हुई कि मैंने राजनीतिक दुर्भावना से इस मामले में तिल को ताड़ बनाया है. इस दुष्प्रचार में झारखंड भाजपा विचार परिवार के एक भारी भरकम वजनदार व्यक्तित्व भी शामिल थे. सत्य सुनने और उसपर गौर करने के लिए ये लोग तैयार नहीं थे. पर भाजपा के अधिकांश सामान्य कार्यकर्ताओं ने और राज्य के अन्य प्रबुद्ध लोगों ने मेरी बातों पर गौर किया, इसे सुना, समझा और इस पर भरोसा किया.

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उच्च स्तर पर कानाफूसी और मिथ्या प्रचार के बीच वरीय-कनीय भाजपा कार्यकर्ताओं एवं अन्य लोगों का स्नेह और समर्थन इस अवधि में मेरे लिए पर्याप्त संतोष का कारण बना रहा. आत्मीयजनों का यह विश्वास तनाव एवं असमंजस के इस लंबे कालखंड में मेरा बड़ा संबल बना रहा. यह पुस्तक उन्हें सादर समर्पित है. इस पुस्तक में कुल 19 खंड हैं. क्लिष्ट आंकड़ों के तकनीकी विश्लेषण पर और सरकारी संचिकाओं की अनावश्यक वक्र चाल पर आधारित यह पुस्तक पाठकों को नीरस और उबाऊ नहीं लगे एवं पुस्तक के कथानक का मर्म उन तक सुगमता से पहुंच जाये, इसके मद्देनजर विषय वस्तु की प्रासंगिक प्रस्तुतियों को विभिन्न खंडों में विभाजित किया गया है. यह सुनिश्चित करने के लिए भी इस बहुचर्चित विषय को पुस्तक के रूप में सार्वजनिक करना मुझे आवश्यक प्रतीत हुआ कि इस संदर्भ में जिन लोगों ने मुझपर भरोसा किया, वे सही थे.

एक संवैधानिक दायित्व के निर्वहन के क्रम में दूध का दूध और पानी का पानी करने का मेरा प्रयास गलत या पक्षपातपूर्ण नहीं था, बल्कि विधानसभा सदस्य के नाते और विधान सभा की एक समिति के सभापति के रूप में दायित्व निर्वहन के परिप्रेक्ष्य में संविधान और कानून की शपथ के अनुरूप था. मुझे विश्वास है कि समय संदर्भ में एक सरकार के कतिपय किरदारों और सत्ता के गलियारों में विचरण करते रहनेवाले निहित स्वार्थी तत्वों के बीच की सांठगांठ के फलस्वरूप राज्यहित और जनहित पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव की एक झलक इस पुस्तक में अवश्य मिलेगी. इस पुस्तक में अंकित शत-प्रतिशत तथ्य सूचना अधिकार अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत राज्य सरकार के नगर विकास विभाग और निगरानी विभाग की आधिकारिक संचिकाओं, मसलन संचिका संख्या 3/न.वि./यो./102/09 और 2/न./वि./यो./सि/ड्रे./02/05 (खंड संचिका) में रक्षित दस्तावेज़ और टिप्पणियों पर आधारित हैं. इसका लेश मात्र भी मनगढ़ंत, अनुमान या पक्षपात पूर्ण विवेचना पर आधारित नहीं है. संचिकाओं में विस्तार से अंकित टिप्पणी पक्ष और पत्रकार पक्ष के प्रमाणों को पुस्तक में यथास्थान काफी संक्षेप में उद्धृत किया गया है. इस क्रम में पर्याप्त ध्यान रखा गया है कि संक्षेपीकरण के दौरान प्रमाणों के मूल स्वरुप एवं भाव के साथ रंच मात्र भी छेड़-छाड़ या तोड़-मरोड़ नहीं हो. किसी व्यक्ति या व्यक्ति समूह पर आक्षेप करना या जनता की नज़रों में किसी को नीचा दिखाना पुस्तक का उद्देश्य नहीं है. किसी घटना या प्रसंग को पुस्तक में समाहित करते समय शब्दों की मर्यादा का पूरा ध्यान रखा गया है. प्रयास किया गया है कि तथ्य का चित्रण सत्य पर तो आधारित हो, परन्तु नग्न या विद्रूप प्रतीत नहीं हो, इन पर शालीनता का आवरण रहे. फिर भी पुस्तक में अंकित सांच की आंच से किसी को मानसिक क्लेश हो या पुस्तक का कोई प्रसंग किसी को नागवार लगे तो इसके लिए मेरे सिवाय किसी अन्य को दोष देना मुनासिब नहीं होगा. पुस्तक के लिए प्रामाणिक सामग्री के चयन, लेखन एवं सम्पादन के समय शब्द चयन तथा वाक्य विन्यास के लिए मैं पूरी तरह जिम्मेदार हूं. इस बारे में सुझाव अथवा आलोचना का स्वागत है.

पुस्तक में विधानसभा की कार्यवाही तथा कतिपय अन्य कई दस्तावेज के अंश की भाषा मूल रूप में रखी गयी है. इस कारण उनमें निहित भाषाई अशुद्धियों को नजरअंदाज करने का अनुरोध है. कोविड-19 की विभीषिका के समय नोवेल कोरोना वायरस के साथ संघर्ष के आरम्भिक दिनों में देश में घोषित लॉकडाउन-1 और लॉक डाउन-2 के बीच के एकांतवास के दौरान इस पुस्तक रचना हुई. अपनी जान जोखिम में डाल कर हमारी रक्षा की खातिर कोरोना महामारी के साथ संघर्ष करते हुए दिवंगत होनेवाले देश-दुनिया के समस्त कोरोना योद्धाओं की पुण्यात्माओं को हमारा श्रद्धा सुमन निवेदित है. विश्वास है कि इनका अमर बलिदान विश्व को कोविड-19 महामारी पर विजय दिलाने में कामयाब होगा.

पुस्तक की पांडुलिपि का टंकन करने में तथा अनेक स्थानों पर बेतरतीब पसरी हुई संचिकाओं में से सार्थक सामग्रियों को एकत्र कर मेरे समक्ष प्रस्तुत करने में मेरे नवनियुक्त निजी सहायक श्री राजेश सिन्हा ने कठिन परिश्रम किया है. इसके लिए उन्हें जितना धन्यवाद दिया जाये, वह कम है. झारखंड प्रिंटर्स के श्री बालाजी ने विषय सामग्री को पुस्तक का सुगठित आकार प्रदान किया है जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं. झारखंड प्रशासनिक सेवा के अवकाश प्राप्त वरीय पदाधिकारी श्री एचएन राम ने पुस्तक की टंकित पाण्डुलिपि को पढ़ने और भाषागत त्रुटियों का निवारण करने का कष्ट किया है. उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद. इसके साथ ही झारखंड प्रिंटर्स के प्रबन्धन को इसलिए मेरा विशेष धन्यवाद कि उन्होंने पुस्तक का मुद्रण करने का मेरा आग्रह स्वीकार किया.

डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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