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मेनहर्ट घोटाला 13: ‘सांच को आंच क्या’ का दंभ भरने वाले अपनी चमड़ी बचाने के लिये जांच की आंच पर राजनीति का पानी डालने में लग गये

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Saryu Roy

तकनीकी परीक्षण कोषांग: आरम्भिक जांच- निगरानी ब्यूरो के आइजी श्री एमवी राव के 16 अक्टूबर 2009 के पत्र का संज्ञान निगरानी आयुक्त ने नहीं लिया और श्री रघुवर दास एवं अन्य पर मुकदमा दर्ज कर मामले का अनुसंधान करने की अनुमति निगरानी ब्यूरो को नहीं दिया. लेकिन श्री एमवी राव ने जिस परिवाद का संदर्भ लिया था, उसपर जांच की कार्रवाई अलग से आरम्भ हो गयी. नगर विकास विभाग की एक संचिका पर राज्यपाल के सलाहकार श्री जी कृष्णन ने मामले की निगरानी जांच का आदेश 23 सितम्बर 2009 को ही निगरानी आयुक्त को दे दिया था. उस समय झारखण्ड में राष्ट्रपति शासन था, विधानसभा निलंबित थी. कारण कि मुख्यमंत्री पद पर रहते श्री शिबू सोरेन तमाड़ विधानसभा क्षेत्र से उपचुनाव हार गये थे और कांग्रेस समर्थित उनकी सरकार गिर गयी थी.

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राज्यपाल के सलाहकार के इस आदेश के बाद भी निगरानी आयुक्त ने निगरानी ब्यूरो को जांच करने की अनुमति नहीं दिया. उन्होंने निगरानी विभाग के तकनीकी परीक्षण कोषांग के अधीक्षण अभियंता और कार्यपालक अभियंता को मामले के समस्त कागजात का अध्ययन करके इसके तकनीकी पहलुओं की जांच करने के बारे में तीन दिन से पांच दिन के भीतर मंतव्य देने का आदेश निगरानी विभाग की संचिका पर दे दिया. निगरानी विभाग (तकनीकी परीक्षण कोषांग) के कार्यपालक अभियंता और अधीक्षण अभियंता ने अपनी संयुक्त टिप्पणी के साथ 18 दिसंबर 2009 को विधिवत जांच करने का आदेश लेने के लिये संचिका मुख्य अभियंता को भेज दिया. मुख्य अभियंता ने उसी दिन उनकी संयुक्त टिप्पणी को स्वीकार कर लिया और टिप्पणी के प्रासंगिक अंश पर जांच करने का आदेश प्राप्त करने के लिये संचिका निगरानी आयुक्त के पास भेज दिया. निगरानी आयुक्त ने भी इसकी जांच निगरानी विभाग के तकनीकी परीक्षण कोषांग से कराने का आदेश दे दिया. यह आदेश उन्होंने संचिका पर भी दिया कि इससे संबंधित अन्य कोई संचिका या कागजात किसी अन्य विभाग में हो तो उन्हें भी लेकर तकनीकी परीक्षण कोषांग को दे दिया जाये. अर्थात निगरानी ब्यूरो के पास भी जो कागजात हैं उन्हें भी तकनीकी परीक्षण कोषांग को दे दिया जाये. निगरानी विभाग के तकनीकी परीक्षण कोषांग के अधीक्षण अभियंता और कार्यपालक अभियंता ने जांच का आदेश प्राप्त करने के लिए प्रासंगिक संचिका पर मुख्य अभियंता को जो मंतव्य प्रेषित किया है, वह आँखें खोलने वाला है. सर्वसामान्य की जानकारी के लिये इसे हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है :-

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मुख्य अभियंता को प्रेषित कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता का मंतव्यः

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निगरानी ब्यूरो के पत्रांक 593/09 दिनांक 16.10.2009 के द्वारा (पृष्ठ 62-1/प.) श्री रघुवर दास, तत्कालीन मंत्री, नगर विकास विभाग एवं तदेन मुख्य अभियंता, नगर विकास प्राधिकार तथा उनके सहयोगी एवं निविदा की तकनीकी मूल्यांकन के उपसमिति के सदस्यों विरूद्ध परिवाद पत्र की प्रति देते हुए अग्रेतर कार्रवाई हेतु मार्गदर्शन की मांग की गयी है. इस संबंध में निगरानी आयुक्त द्वारा पूर्ण कागजात का अध्ययन कर मंतव्य देने का निर्देश दिया गया है. परिवाद पत्र के अवलोकन से ज्ञात होता है कि आरोपकर्ता के द्वारा रांची शहर के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण हेतु आमंत्रित परामर्शी के चयन की निविदा में, निविदा की शर्तों के अनुसार अयोग्य होने के बावजूद सिंगापुर की परामर्शी कम्पनी मेनहर्ट को परामर्शी नियुक्त करने एवं इस मद में करीब आठ करोड़ रूपये का अनियमित भुगतान करने का आरोप मुख्य रूप से लगाया गया है. परिवाद पत्र के साथ संलग्न किये गये अभिलेखों, जो संचिका में रक्षित हैं, के अवलोकन से ज्ञात होता है कि :-

  1. अक्टूबर 2003 में रांची शहर के सिवरेज एवं ड्रेनेज के निर्माण हेतु ओआरजी कम्पनी से परामर्शी के रूप में रांची नगर निगम के द्वारा एकरारनामा किया गया है. 11 पृष्ठ के एकरारनामा में से मात्र एक पृष्ठ ही संलग्न है, शेष पृष्ठ संलग्न नहीं है. इस प्रकार एकरारनामा से संबंधित अभिलेख अधूरा है.
  2. ओआरजी कम्पनी के द्वारा वार्ड सं.- 1 से 24 तक के लिए 10 प्रतियों में पीपीआर दिनांक 13.12.2004 को समर्पित किया गया है.
  3. पृष्ठ 49/प. पर प्रशासक, नगर निगम रांची के पत्रांक 1315 दिनांक 17.06.05 द्वारा ओआरजी को यह पत्र दिया गया कि राज्य सरकार के आदेश सं.- 1158 दिनांक 15.06.05 द्वारा उनके फर्ङ्क से सिवरेज एवं ड्रेनेज योजना हेतु परियोजना प्रतिवेदन तैयार किये जाने संबंधी कोई कार्य नहीं किया जाये एवं नगर निगम के साथ फर्ङ्क के एकरारनामा को रद्द किया जाय. राज्य सरकार का उपर्युक्त पत्र संलग्न नहीं है.
  4. ओआरजी से एकरारनामा रद्द होने के पश्चात् क्यूबीएस. (नवालिटी बेस सिस्टम) के आधार पर ग्लोबल टेंडर निकालने एवं उसके तकनीकी प्रस्ताव के मूल्यांकन के बाद सर्वाधिक अंक के आधार पर निविदा के निस्तार की बात कही गयी है. (निविदा से संबंधित अभिलेख संलग्न नहीं है). परिवाद में यह बताया गया है कि क्यूबीएस आधारित निविदा में कोई फर्म कार्य के योग्य नहीं पाया गया. दिनांक 12.08.05 को तकनीकी समिति की बैठक की कार्यवाही 47/प. के अनुसार पुन: निविदा आमंत्रित करने एवं वित्तीय डॉक्यूमेंट में यथावर्णित विभिन्न शर्तों में आवश्यक परिवर्तन की बात कही गयी है, ताकि क्वालिटि एवं कॉस्ट (टउइड) दोनों को निविदा में शामिल किया जा सके. पुन: दिनांक 17.08.05 को हुई बैठक की कार्यवाही पृ. 45/प. पर रक्षित है, जिसमें माननीय मंत्री, नगर विकास विभाग की अध्यक्षता में यह दर्शाया गया है कि मुख्य समिति एवं तकनीकी उपसमिति का पुन: अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुंचे.
  5. परिवाद पत्र के अनुसार निविदा तीन मुहरबन्द लिफाफों में प्रस्तुत करना था, जिसमें निम्न प्रस्ताव दिये जाने थे :-

क) योग्यता की न्यूनतम शर्तों का प्रस्ताव

ख) तकनीकी प्रस्ताव

ग) वित्तीय प्रस्ताव

न्यूनतम योग्यता की एक शर्त थी कि विगत तीन वर्षों में फर्मों के औसत टर्न ओवर 40 करोड़   रूपया या अधिक होनी चाहिए एवं प्रत्येक वर्ष में फर्म को मुनाफा होना चाहिए.  Pre Bid Meeting में यह प्रश्न उठने पर कि किन-किन तीन वर्षों को टर्न ओवर हेतु रखी जाये, यह निर्णय दर्शाया हुआ है कि 2002-03, 03-04 एवं 04-05 के तीन क्रमश: वर्ष होंगे. साथ ही यह निर्णय दर्शाया हुआ है कि 2002-03 एवं 03-04 के लिए टर्न ओवर का बाह्य अंकेक्षित प्रतिवेदन तथा 2004-05 के लिए आंतरिक अंकेक्षित प्रतिवेदन निविदाकारों के द्वारा प्रस्तुत किया जाय.

  1. चार फर्मों द्वारा निविदा में भाग लिया गया, जिसमें एक फर्म का unaudited

turnover रहने के कारण तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित किया गया है. मेनहर्ट द्वारा वर्ष 2002-03 एवं 03-04 का टर्न ओवर प्रस्तुत करने एवं वर्ष 04-05 का टर्न ओवर नहीं प्रस्तुत करने का प्रमाण पृष्ठ 39-38/प. पर मुख्य समिति एवं तकनीकी उपसमिति के द्वारा दिनांक 17.08.05 की बैठक में दिये गये तुलनात्मक विवरणी एवं मूल्यांकन से स्पष्ट होता है. निविदा के शर्तों के अनुसार मेनहर्ट को वर्ष 2004-05 का टर्न ओवर नहीं प्रस्तुत करने के कारण अयोग्य किया जाना चाहिए था, लेकिन मुख्य समिति एवं तकनीकी उपसमिति द्वारा तकनीकी बीड के मूल्यांकन में मेनहर्ट को अधिकतम अंक प्रदान कर योग्य दिखाया गया है.

  1. इस नियुक्ति के मामले की जांच के लिए माननीय विधायक श्री अशोक कुमार की संयोजकत्व में विधानसभा की विशेष जांच समिति के गठन का परिवाद पत्र में उल्लेख है. विधानसभा की विशेष समिति द्वारा अनुशंसा किया गया है कि अपेक्षित जांच करवाते हुए सरकार आगे की कार्रवाई करे, जिसके आलोक में गठित उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का प्रतिवदेन पृष्ठ 20-15/प. पर द्रष्टव्य है, जिसमें World Bank norms के आधार पर निविदा का तकनीकी मूल्यांकन किये जाने का जिक्र है. World Bank guideline के अनुसार टर्न ओवर हेतु 5 अंक ही आबंटित किया जाना एवं उसके विरूद्ध तीनों निविदादाताओं को टर्न ओवर के मामले में 5-5 अंक दे देने का जिक्र है. परिवाद पत्र के साथ मूल्यांकन संबंधी पूर्ण अभिलेख संलग्न नहीं है.
  2. परिवाद पत्र के कंडिका 14 के आलोक में परिशिष्ट-14 पृष्ठ 23-22/प. पर

रक्षित पत्र में निविदा के प्रमुख शर्त में दो मुहरबंद लिफाफा पद्धति World

Bank मार्गदर्शिका के आधार पर Quality Based Systemके अनुसार तकनीकी रूप से सर्वोच्च अंक पाने वाले निविदादाता का वित्तीय बीड खोलने की चर्चा है. यह अभिलेख बिना किसी हस्ताक्षर एवं reference का प्रतीत होता है. इस तरह उपलब्ध अभिलेखों से चयन प्रक्रिया दो लिफाफा/तीन लिफाफा पद्धति एवं QBS/QCBS पर आधारित होने का अभिलेख संचिका में नहीं है.

  1. विधानसभा की विशेष जांच समिति की अनुशंसा पर गठित तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय तकनीकी समिति की अनुशंसा है कि परामर्शी की नियुक्ति में विहित प्रक्रिया एवं पारदर्शिता बरती गयी है एवं Negotiation कर निविदा के निर्धारित दर Economical एवं व्यावहारिक है.
  2. पृ.-8-7/प. पर विधानसभा की विशेष कार्यान्वयन समिति की अनुशंसा का जिक्र है एवं इसमें अनुशंसा की गयी है कि मेनहर्ट के कार्यादेश को अविलम्ब रद्द किया जाये एवं सरकार इसकी आवश्यक जांच करायें. उक्त अभिलेख में किसी का हस्ताक्षर अथवा अग्रसारण पत्र नहीं है. विधान सभा के कार्यान्वयन समिति की अनुशंसा पर गठित उच्चस्तरीय तकनीकी समिति अभियंता प्रमुख/मुख्य अभियंता के चार सदस्यों ने प्रतिवेदित किया है कि ‘‘तकनीकी कारणों से मेनहर्ट अयोग्य हो जाता है, परन्तु वित्तीय क्षमता के अनुसार योग्य है. फलत: राज्यहित में सरकार निर्णय ले सकती है.’’ एक सदस्य ने प्रतिवेदित किया है कि ‘‘Tender से लेकर मेनहर्ट के परामर्शी के चयन तक की प्रक्रिया में भूल हुई है.’’ परिवाद पत्र एवं उसमें संलग्न अनुलग्नक के अध्ययन से स्पष्ट हो रहा है कि मेनहर्ट के परामर्शी के रूप में नियुक्ति की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण है. निविदा से संबंधित परिवादी द्वारा प्रस्तुत अभिलेख अहस्ताक्षरित एवं अपूर्ण है. निविदा संबंधी सम्पूर्ण अभिलेखों के अध्ययन से ही वस्तुस्थिति स्पष्ट हो पायेगी. वर्णित परिस्थिति में नगर विकास विभाग से अनुरोध किया जा सकता है कि परिवाद पत्र में वर्णित आरोपों पर कंडिकावार मन्तव्य, संबंधित पूर्ण अभिलेखों के साथ उपलब्ध करावें. आवश्यक कार्यवाही हेतु संचिका उपस्थापित. इस बीच नवंबर-दिसंबर 2009 में झारखण्ड विधानसभा के चुनाव हुये. किसी दल को बहुमत नहीं मिला. विधानसभा में भाजपा की सीटें 30 से घटकर 18 पर आ गयीं. चुनावोपरांत राज्य में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और भाजपा की संयुक्त सरकार बनी. श्री शिबू सोरेन पुन: मुख्यमंत्री बने, श्री रघुवर दास उपमुख्यमंत्री बनाये गये. यह सरकार 6 माह में गिर गयी.

1 जून, 2010 को झारखण्ड में पुनः राष्ट्रपति शासन लग गया जो 11 सितंबर 2010 तक रहा. राष्ट्रपति शासन की अवधि में निगरानी विभाग (तकनीकी परीक्षण कोषांग) के अधीक्षण अभियंता ने अपनी जांच रिपोर्ट 5 अगस्त 2010 को अपने मुख्य अभियंता को सौंप दिया. निगरानी विभाग (तकनीकी परीक्षण कोषांग) के कार्यपालक अभियंता और अधीक्षण अभियंता की यह जांच रिपोर्ट हू-ब-हू पुस्तक के अगले खण्ड-11 में देखी जा सकती है. मुख्य अभियंता ने अगले दिन इस पर स्वीकृति प्रदान करते हुये इसे अग्रेतर कारवाई के लिये निगरानी आयुक्त के पास भेज दिया. परंतु राज्यपाल के सलाहकार के स्पष्ट आदेश के बावजूद निगरानी आयुक्त ने इसपर कारवाई करने या न करने के बारे में अपना मंतव्य नहीं दिया. वे 7 माह तक संचिका अपने पास रखे रहीं. कोई आदेश नहीं दिया. तब चर्चा गर्म थी कि किसी भी दिन राष्ट्रपति शासन हट सकता है और लोकप्रिय सरकार बन सकती है. हुआ भी ऐसा ही. 11 सितम्बर 2011 को भाजपा, झामुमो, आजसू की गठबंधन सरकार बन गई. श्री अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री और श्री सुदेश महतो और श्री हेमंत सोरेन सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गये. नगर विकास विभाग के अधिकारियों ने निगरानी आयुक्त से कई बार संचिका की मांग की. लिखकर भी की और मिलकर भी की. पर उन्होंने संचिका नहीं लौटाई. जब इस संचिका की खोज माननीय उच्च न्यायालय में दायर एक मुकदमा के सिलसिले में हुई, तब जाकर उन्होंने 25 फरवरी, 2011 को संचिका नगर विकास विभाग को उपलब्ध कराई. यहीं से इस मामले ने नया मोड़ लिया. निगरानी विभाग के तकनीकी परीक्षण कोषांग की जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गयी.

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कई अवसर आये पर इसका जिक्र तक नहीं हुआ. ‘‘निविदा दो मुहरबंद लिफाफों में आमंत्रित की गई थी’’ जैसी पुरानी राग फिर से अलापा जाने लगा. महाधिवक्ता द्वारा 2008 में दी गई एक गलत कानूनी राय संचिकाओं पर हर जगह दर्ज होने लगी. राज्य में भाजपा, झामुमो और आजसू की मिलीजुली सरकार का अस्थिर माहौल और अनियमितता के मुख्य किरदार का भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनकर दबाव डालने की स्थिति में आ जाने के कारण जांच के नतीजों के आधार पर कार्रवाई आगे बढ़ाना सम्भव नहीं हो पाया. ‘सांच को आंच क्या’ का दंभ भरने वाले अपनी चमड़ी बचाने के लिये जांच की आंच पर राजनीति का पानी डालने में लग गये.

सार संक्षेप :-

  1. 2009 में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल के सलाहकार ने निगरानी आयुक्त को मेनहर्ट की नियुक्ति में अनियमितता की जांच करने का आदेश दिया. कायदे से निगरानी आयुक्त को जांच करने का आदेश निगरानी ब्यूरो को देना चाहिए था क्योंकि निगरानी ब्यूरो ने ही परिवाद पत्र निगरानी आयुक्त को मार्गदर्शन के लिए भेजा था. परंतु निगरानी आयुक्त ने जांच का जिम्मा तकनीकी परीक्षण कोषांग को दे दिया और विषय की जांच को तकनीकी पहलुओं के जांच तक सिमटा.
  2. निगरानी ब्यूरो को जांच का आदेश देने के पहले निगरानी आयुक्त इसकी जांच करने के लिए अपने स्तर से ही तकनीकी परीक्षण कोषांग के कार्यपालक अभियंता और अधीक्षण अभियंता को आरंभिक जांच के लिए पृष्ठांकित कर दिया.
  3. इन अभियंताओं ने इसपर आगे बढ़ने का आदेश अपने मुख्य अभियंता से लिया. आदेश पाकर आरम्भिक जांच आरम्भ की.
  4. निगरानी के तकनीकी परीक्षण कोषांग के अभियंताओं ने आरम्भिक जांच के निष्कर्ष के आधार पर गहन जांच करने हेतु विधिवत आदेश प्राप्त करने के लिए संचिका पर जो मंतव्य दिया है, वह अपने आप में जांच का जिम्मा निगरानी ब्यूरो को देने के लिए पर्याप्त था. परंतु निगरानी आयुक्त ने ऐसा नहीं किया.
  5. निगरानी ब्यूरो जांच करता तो इसके आपराधिक पहलुओं की जांच आरम्भ करने के पहले प्राथमिकी दर्ज करता. जांच के फलाफल के आधार पर अभियुक्तों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होती. उनकी सम्पत्ति की जांच भी होती. दोषी व्यक्ति जेल के सलाखों तक पहुंच जाते, उन्हें आसानी से जमानत नहीं मिलती. मामले में आपराधिक षड्यंत्र बेनकाब हो जाता.
  6. इसे भी पढ़ें- मेनहर्ट घोटाला-4 : विपक्ष सिर्फ यह चाहता था कि मामले की जांच विधानसभा की समिति करे, दोषियों पर कार्रवाई से कोई सरोकार नहीं था

डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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