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मूलवासी संस्कृति बचाने के लिए प्रयासरत मीनाक्षी, युवाओं को कर रहीं एकजुट

अपने प्रयास से पांच गितिओड़ा शहरी क्षेत्र में स्थापित  किया

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Ranchi: मूलवासियों के समक्ष जितनी बड़ी समस्या अपने जल, जंगल और जमीन बचाने की है. उतनी ही बड़ी चुनौती संस्कृति बचाने की भी है, आधुनिकता के तामझाम में इनकी संस्कृति भी अब खोने लगी है. इसी संस्कृति को बचाने का प्रयास हेहल निवासी मीनाक्षी मुंडा कर रही हैं. जो पिछले कई सालों से लगातार आदिवासियों की संस्कृति वापस लाने के लिए कार्यरत हैं. पेशे से शिक्षिका मीनाक्षी, युवाओं को एकजुट कर अपनी पहचान बरकरार रखने की जानकारी देती हैं. अपने कार्यों के कारण ही मिनाक्षी को साल 2010 में  एशिया यंग इंडिजिनियस पीपल्स नेटवर्क का एशिया  लेवल प्रेसिडेंट चयनित किया गया. साल 2015 में पुनः चुनाव में इन्होंने अपना स्थान एशिया लेवल प्रसिडेंट में बनाया. इसके बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि इतने बड़े मंच के साथ जब शुरुआत में जुड़ीं तो लगा कि अपने राज्य और देश की समस्या ही बड़ी होगी, लेकिन ऐसा नहीं था. दूसरे देशों में भी आदिवासियों की समस्याएं काफी गंभीर हैं. उन्होंने बताया कि गांव छोड़कर युवा पढ़ने शहर आते हैं, ऐसे में युवाओं का रूझान अपनी परंपरा-संस्कृति से दूर हो जाती है. जो भी प्राचीन रीति रिवाज हैं, उनसे वे दूर हो जाते हैं.

मीनाक्षी मुंडा

पांच गितिओड़ा किया स्थापित

मुंडा समाज में युवाओं को परंपरा संस्कृति सिखाने के लिये गितिओड़ा या यूथ डारमिटॉरी एक महत्वपूर्ण अंग था. जहां लड़कों और लड़कियों को अलग-अलग प्रशिक्षण  दिया जाता था. मिनाक्षी ने बताया कि सुदूर गांवों में गितिओड़ा तो अब भी किसी न किसी स्थिति में है, लेकिन शहरों में अब ये पंरपरा खत्म होते जा रही थी, ऐसे में इनके युवा समूह के साथ मिलकर इन्होंने रांची के आस-पास के क्षेत्रों में पांच गितिओड़ा स्थापित किया. जिसमें दो नामकोम, दो डिबडीह और एक खूंटी में है. जहां वर्तमान में सरना आदिवासी युवाओं को संस्कृति की सीख दी जा रही है. अपने कॉलेज के दिनों से ही ये मूलवासियों की संस्कृति बचाने के लिए कार्यरत थीं.

दूसरे देशों की समस्याएं और भी गंभीर हैं

मीनाक्षी ने बताया कि भारत में झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, उड़ीसा में आदिवासी मूलवासियों की समस्याएं अधिक हैं, जहां विकास के नाम पर इन्हें उजाड़ा जा रहा है, लेकिन अगर दूसरे देशों से मुकाबला किया जाये तो ये काफी कम है, क्योंकि दूसरे देशों में मूलवासियों को विस्थापित न कर उन्हें नुकसान पहुंचाया जाता है. जेनेवा, साउथ अफ्रीका जैसे देशों का उदाहरण देकर बताया कि इन देशों में समय-समय जंगल जलने की जो खबरें आती हैं, वास्तव में मूलवासियों को हटाने के लिए ऐसा किया जाता है.

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