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गांधी होने का मतलब

इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.

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Faisal Anurag

दुनिया में गांधी की प्रासंगिकता लगातार बढ़ती जा रही है. गांधी ने आधुनिक विकास और सभ्यता के खिलाफ एक वैकल्पिक नजरिया प्रस्तूत किया और वे दुनिया के प्रभावी चिंतकों और अपने विचारों पर पूरी तन्मयता के साथ विमर्श करने वाले विभूतियों में अपना स्थान सुरक्षित कर लिया. गांधी के अहिंसा और सत्य के प्रयोग को आज पूरी दुनिया महसूस करती है. इसके साथ ही सांप्रदायिकता और फासीवाद के खिलाफ उनके संघर्षों को भी दुनिया अनुकरणीय मानती है. अनेक असहमितयों के बावजूद गांधी को नकारा नहीं जा सकता. गांधी ने एक वैकल्पिक विश्व नजरिया पेश किया और उन्होंने एक नयी सभ्यता की वकालत की. दक्षिण अफ्रीका से गिरमिटिया मजदूरों के इंसाफ का संघर्ष करते हुए गांधी भारत में गरीब किसानों और मजदूरों के हकों के पक्ष में खडे हुए. अपने जीवनीकार लुई फीशर के साथ एक बातचीत में गांधी ने भारत में जमींदारी के उन्मूलन और समानता के आर्थिक और सामाजिक पक्ष की पैरोकारी की है. फीशर ने यह बातचीत गांधी की हत्या के कुछ दिनों पहले ही की थी और गांधी की जीवनी में उसपर विस्तार से चर्चा किया है. गांधी जी ने भारत में सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार संघर्ष किया और भारत में किसी भी तानाशाही के उभार के खिलाफ आवाज बुलंद की. इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी.

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गांधी के सपनों का भारत आज बहुत पीछे छूट गया है. गांधी जी जानते थे कि सभ्यताओं के निर्माण की प्रक्रिया तुरंत स्वीकार नहीं की जा सकती है. गांधी जी यह भी जानते थे कि भारत जिस रास्ते को स्वीकार कर रहा है, यह वक्त की जरूरत तो हो सकती है लेकिन इसके अपने खतरे हैं. उनकी चिंता प्रकृति, मनुष्य और मानवता को लेकर है. जिसका लगातार क्षरण किया जाता रहा है. गांधी जी समझते थे, भारत ने जिस आजादी को हासिल किया है, वह बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन उन्होंने इस विमर्श को बनाए रखा कि इससे और आगे जाने की जरूरत है. गांधी जी के बारे में बहुत सारे लोग कहते हैं कि अपने जीवन में अनेक तरह के अंतर्विरोधों के बीच उन्होंने कई तरह के नए रास्ते निकाल लिये. यह उनके नेतृत्व की क्षमता ही थी कि भारत में एक व्यापक जनसमर्थन वाले आंदोलनों को खड़ा किया और अपने विरोधियों का भी मान-सम्मान रखा. हालांकि बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो उनकी अहिंसा और अपने विचारों के प्रति दृढता को जिद की हद तक अमल में लाने वाले व्यक्ति के रूप में पहचान करते हुए भारत के राजनीतिक आंदोलनों के अनेक भावनाओं की चर्चा करते हैं. लेकिन गांधी का नजरिया साफ था, वे मानते थे कि केवल अहिंसा के रास्ते ही हासिल किया गया, मकसद उनका लक्ष्य है. अहिंसा को नकारकर वे कुछ भी करने को तैयार नहीं थे और इस कारण अनेक ऐसे लोग उनसे अलग हो गए, जो मानते थे कि भारत की आजादी बिना हिंसा के संभव नहीं है. बावजूद इसके अलग हुए सभी व्यक्तियों के दिल में गांधी जी के प्रति गहरा सम्मान बना रहा और उन्होंने गांधी जी की जरूरत को हमेशा जरूरी समझा.

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गांधी जी ने प्रगतिशीलता के कई रास्ते बहुत धीरे -धीरे ही बनाया. वे एक ओर हिंदू धर्म के आग्रही थे, लेकिन दूसरे धर्मों को वे सम्मान और बरारबरी से देखते थे. उन्होंने भीषण सांप्रदायिक दंगों के बीच सभी समूहों की उग्रता को मौके पर जाकर गलत ठहराया और आजीवन हिंदु-मुसलमान भाईचारे के प्रति आग्रही बने रहे. इस कारण कट्टर धार्मिक समूह उन्हें नापसंद करते रहे और ऐसे ही एक कट्टर हिंदू समूह ने उनकी हत्या कर दी. गांधी जी मानते थे कि भारत का भविष्य सभी धर्मों के सहकार पर ही निर्भर है. भारत की पूरी नयी सभ्यता का यह प्रमुख आधार तत्व है. गांधी जी की यह अपील भारत की बहुसंख्या के साथ परिपक्व हुआ और भारत के बहुमत गांधी जी के इस विचार को अपनाया भी, जिसे पिछले तीन दशकों से भारत में तार-तार किया जा रहा है और धार्मिक सहभाव की जगह धार्मिक श्रेष्ठता के पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है. ऐसे तत्वों को बार-बार गांधी विचार से टकराना पड़ रहा है. इसलिए ऐसे तत्व पहले तो गांधी का विरोध करत रहे, लेकिन अब देखा जा रहा है,  गांधी विचार की मूल आत्मा के बरखिलाफ गांधी को टुकड़े में पेश कर रहे हैं. उन्हें पता है कि व चाहकर भी गांधी के विचारों के सामने टिक नहीं सकते, क्योंकि गांधी जी के लिए धर्म की राजनीति का औजार नहीं था, बल्कि उनकी जीवनशैली थी और उनका विश्वास था. जबकि उनके विचारों को सीमित करने वाले तत्वों के लिए धर्मिक श्रेष्ठता राजनीतिक हथियार मात्र है. गांधी जी ने पूंजीवादी शोषण और उसके आधार तत्वों की जबरदस्त आलोचना की है, जबकि ये तत्व पूंजीवादी बाजार के शोषण और लूट के पक्षधर के रूप में उभरकर कर सामने आए हैं. यह वैचारिक संघर्ष मानवता के नजरिए को लेकर भी है. साथ ही गांधी की समग्रता को नजरअंदाज करने की राजनीतिक प्रक्रियाओं ने उन्हें दुनियाभर में और भी ज्यादा प्रासंगिक करता है, क्योंकि गांधी पूरी समग्रता के साथ ही नए मानव समाज के प्रखर विचारक हैं.

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भारत में गांधी बनाम अंबेडकर और गांधी बनाम वामपंथ की बहस को खड़ा किया जा रहा है, जबकि विचारों की असहतियां होने के बाद भी गांधी को संभावना भरी उम्मीद से इन दोनों तबकों के बीच भी देखा जाता है.

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