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कहीं तेजस्वी का भूमिहार कार्ड पार्टी के लिए गले की फांस न बन जाये

Soumitra Priyadarshi

Patna : बिहार की राजनीति जातीय समीकरण के आधार पर चलती आ रही है. राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से लेकर वतर्मान मुख्यमंत्री सहित बीजेपी से लेकर अन्य राजनीतिक पार्टियां इसी आधार पर अपनी राजनीति करती आयी हैं. इसी स्टाईल की राजनीति के लिए अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को भी राजनीतिक गलियारे में जाना जाने लगा है. हाल के दिनों के उनकी कुछ सभाओं पर गौर करें तो कुछ ऐसा ही साबित हो रहा है. उन्होंने खुले मंच पर भूमिहार कार्ड खेल दिया है.

उच्च जातियों को अपने पक्ष में करने के लिए उनकी ओर से हर हथकंडा अपनाया भी जा रहा है. जिससे भविष्य में होनेवाले विधान सभा चुनाव में अगड़ी जातियों का वोट उन्हें मिल सके और वह सत्ता पर काबिज हो सकें. हालांकि उनके भूमिहार कार्ड की राजनीति से उनका परंपरागत वोट बैंक खिसकने का डर भी पार्टी के कुछ नेताओं को सताने लगा है.

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बीजेपी रही है पहली पसंद, कांग्रेस दूसरी

बिहार के राजनीतिक वोट बैंक की बात करें तो भूमिहार और ब्राह्मण शुरू से ही बीजेपी के खेमे में रहे हैं. विकल्प के तौर पर वह कांग्रेस को साथ लेकर चलते हैं. अन्य अग्रणी जातियों का भी कुछ ऐसा ही रहा है. इस समीकरण को अब तेजस्वी तोड़ने में लगे हैं और इस जाति को अपने पाले में करने के लिए जी जान से जुटे हैं.

कहीं राजद का परंपरागत वोट खिसक न जाये

दबी जुबान में राजद के कुछ नेता तेजस्वी के भूमिहार कार्ड वाली राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. उनका मानना है कि कहीं तेजस्वी की इस राजनीति से पार्टी का परंपरागत वोट खिसक न जाये. राजद का परंपरागत वोट यादव और मुसलमान रहे हैं. जिनकी बिहार की राजनीति में 28 प्रतिशत हिस्सेदारी है. बिहार के 1931 की जनगणना के अनुसार भूमिहार जाति का वोट 4.3 फीसदी, ब्राह्मण 4.9 फीसदी, यादव 11 फीसदी और मुसलमान 17 फीसदी हैं. हालांकि तेजस्वी अब अग्रणी जाति के 9.8 फीसदी वोट बैंक को अपने पक्ष में करने में लगे हैं. अब तो आनेवाले समय में देखना होगा कि तेजस्वी अग्रणी जातियों को अपने पक्ष में करने में कितने सफल होते हैं या उनका परंपरागत वोट भी उनके हाथ से निकल जाता है.

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