Opinion

मौलाना साद प्रकरण :  बिना पूरी जांच के किसी को दोषी ठहरा देने की प्रवृति राजनीति का नया हथियार बनती जा रही है

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Faisal Anurag

लॉकडाउन के बाद मीडिया ने मौलाना साद को कोविड-19 का सबसे बड़ा दोषी बता दिया. लेकिन दिल्ली पुलिस  कह रही है कि मौलाना साद के वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गयी है. इसी वीडियों को आधार मान कर और लॉकडाउन के बावजूद भीड़ जुटाने के आधार पर गैरइरादन हत्या का आरोप लगा कर मामला दर्ज किया है. मौलाना साद की गिरफ्तारी को ले कर भी खूब शोर-शराबा है. लेकिन उन्हें अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है.

सवाल उठता है कि बिना पूरी जांच के ही किसी को दोषी बता देने की प्रवृति के कारण पूरे देश में जिस तरह का माहौल बना है उसके लिए क्या किसी की जिम्मेदार तय होगी या नहीं. एफआइआर दर्ज होने के बाद मौलाना साद के कई वीडियो सार्वजनिक हुए. जिसमें उन्होंने लोगों से सरकार के साथ सहयोग की अपील की है. बावजूद पुलिस की जांच की रफ्तार अब तक उन तक नहीं पहुंच सकी है.

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वीडियो के साथ छेड़छाड़ होने के कई मामले देश में पहले भी आ चुके हैं. जिसमें जवाहरलाल नेहरू का वह वीडियो भी है, जिसके आधार पर वहां छात्रों पर चार्जशीट दाखिल किया गया है. इसमें कन्हैया भी शामिल हैं. पिछले कुछ समय से जिस तरह अदालत के किसी फैसले के पहले ही कुछ मामलों में दोषी करार देने की प्रवृति पैदा हुई, उसके प्रभाव का असर देखा जा रहा है.

सवाल उठता है कि मौलाना साद के मामले में पुलिस ने पहले जिस तत्परता का परिचय दिया वह गिरफ्तारी तक क्यों नहीं पहुंच पाया. कई मामले सामने आ चुके हैं जिसमें प्रचार और वास्तविकता की हकीकत उजागर हो चुकी है.

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पूरे देश में कोरोना के प्रकोप के साथ ही जिस तरह सांप्रदायिकता का जहर समाज में घुला है, उससे समाज में एक आदमी से दूसरे आदमी के बीच एक बड़ी दूरी बन गयी है. इस दूरी को बढ़ाने के हर अवसर का इस्तेमाल जिस तरह किया गया है उसकी राजनीति को भी बेपर्दा किये जाने की जरूरत है. यह तथ्य है कि तब्लीगी जमात के मरकज में दो हजार के आसपास लोगों की भीड़ जुटी है. उसमें अनेक लोग संक्रमित हुए.

उनके प्रभाव से देश के कई हिस्सों में लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हुए. लेकिन इस पूरे क्रम में इस तथ्य को चर्चा से बाहर कर दिया गया कि विदेशों से आने वाले जमात के लोगों को आखिर इजाजत कैसे मिली. जबकि दिसंबर के अंत में ही भारत में कोरोना संक्रमित रोगी मिला था. इसके बाद भी हवाई अड्डों पर जांच की प्रक्रिया को सख्त नहीं किया गया. इसमें जमात के लोग भी भारत आए और अन्य 15 लाख भारतीय भी. यह बात अब अतीत हो चुकी है. लेकिन जिस तरह अब भारत में कोविड का विस्तार हो रहा है वह नए किस्म का डर पैदा कर रहा है.

एक तरफ तो कोरोना के साथ जीने की बात जोरशोर से की जा रही है, वहीं भारत में तीन से चार दिनों में ही मरीजों की संख्या दस हजार बढ़ जा रही है. 40 हजार मरीजों के बाद जिस तेजी से मरीजों की संख्या में बढ़ोत्तरी दिख रही है, वह लॉकडाउन को ले कर भी कई सवाल पैदा कर रही है. इस बात के संकेत अब मिल रहे हैं कि लॉकडाउन से मुक्ति की छटपटाहट न केवल सरकार में बढ़ी है बल्कि उसके लिए माहौल भी तैयार है.

मौलाना साद प्रकरण से एक बात तो समझी ही जा सकती है कि एक गलती किसी तरह खतरनाक हो सकती है. सरकार कोरोना के साथ जीने के तरीके तो अभी तक लोगों को बता नहीं पायी है. मार्च में भीड़ का जुटना बेहद खतरनाक साबित हुआ है. लेकिन मई में किसी भी तरह की भीड़ उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकती है.

वीडियो से छेड़छाड़ के तथ्य को दिल्ली पुलिस ने उजागर किया है. औऱ उसे आगे की जांच के लिए लैब को भेजा है. दिल्ली पुलिस ने अब तक जमात प्रकरण में जांच प्रक्रिया में जिस तरह की  देरी की है, उसके भी कई अर्थ लगाए जा रहे हैं.

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