न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

मारबतः प्रतिरोध का एक ऐसा अनोखा पर्व है जो पूरी दुनिया में केवल नागपुर में मनाया जाता है

1,583

Sharad Kokaash

नागपुर का ‘मारबत’ नामक यह एक ऐसा पर्व है जिसमें भ्रष्टाचार, झूठ, बेईमानी, शराबखोरी, अश्लीलता जैसी बुराइयों के पुतले जलाये जाते हैं. यह एक ऐसा पर्व है जो ब्रिटिश शासन का साथ देने वाले गद्दारों के खिलाफ विरोध प्रकट करने के लिए और आज़ादी के दीवानों की याद में मनाया जाता है. आश्चर्य हो रहा होगा आपको जानकर कि क्या ऐसा भी कोई त्यौहार हो सकता है जिसका आधार धार्मिक न हो ?

Sport House

इसके लिए हमें पिछली की पिछली सदी में जाना होगा. यह सन 1881 की बात है, जब देश में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ वातावरण बन रहा था. लेकिन देश के कुछ राजा रजवाड़े अंग्रेजों का साथ दे रहे थे और ज़रा सी  लालच में उन्हें खुद पर शासन करने के लिए आमंत्रित कर रहे थे. उन्हीं में थी नागपुर की तत्कालीन शासक बका बाई भोंसले, जिसने तात्या टोपे के विद्रोह के आग्रह को ठुकरा दिया और अपने सिपहसालारों और दरबारियों को लेकर अंग्रेजों के साथ हो गयी. फलस्वरूप नागपुर अंग्रेजों के अधीन हो गया. लेकिन नागपुर की स्वतंत्रता प्रिय जनता से यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने अगले ही दिन अपने आक्रोश और विरोध को व्यक्त करने के लिए रानी का एक प्रतीतात्मक पुतला बनाया उसका जुलुस निकाला और उसे जला दिया.

यह जनता ग़रीब ज़रूर थी, पिछड़ी जाति की थी, दलित, शोषित, दमित थी लेकिन स्वाभिमानी थी, देशभक्त थी. फिर तो यह हर साल की परंपरा बन गयी और सावन मास समाप्त होते ही सावन की अमावस्या या पोला पर्व के अगले दिन यह उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा.

देश स्वतंत्र हुआ, अंग्रेज़ चले गये लेकिन यह परम्परा नहीं समाप्त हुई. अब भी देश में गद्दार तो थे ही, साथ ही जनता के पास तमाम दुखों के रूप में आज़ादी के स्वप्न का मोहभंग भी था.

Mayfair 2-1-2020

बस अब रानी के पुतले की जगह बुराई का पुतला था. महंगाई, बीमारी, शोषण, दमन, छुआछूत, भेदभाव का पुतला था. ग़रीब जनता ने इसे ही प्रतीकात्मक रूप से जलाना शुरू किया. इसे ‘काली मारबत’ का नाम दिया गया और साथ ही कुछ विशेष पुतले भी बनाये जाने लगे जिन्हें ‘बड़गा’ नाम दिया गया.

चलिये अब कुछ बात इस पर भी कि यह त्योहार मनाते कैसे हैं? नागपुर शहर में सावन के अंतिम दिन अमावस्या को पोला नामक त्यौहार मनाया जाता है. इसके ठीक दूसरे दिन सुबह से जोरशोर से काली मारबत का जुलुस निकाला जाता है. आसपास के जाने कितने गांवों और शहरों से इसे देखने के लिए लोग आते हैं.  जवाहर पुतला इतवारी से प्रारंभ होकर यह जुलुस दिन भर शहर के विभिन्न हिस्सों से होते हुए अंत में शाम को एक मैदान में पहुंचता है जहां इन बुराइयों का पुतला जला दिया जाता है.

मज़ेदार बात यह कि अब इन पुतलों में बड़गा के रूप में ग़लत कमीशन खोरों,  दलालों,  भ्रष्टाचारियों, बेईमानों,  चोरों और गुंडों के बड़गा यानि पुतले बनाये जाने लगे हैं. लोग इस बात के लिए स्वतंत्र हैं कि वे किसी भी बुराई का प्रतीकात्मक पुतला बनायें.

मारबत और बड़गा के यह पुतले बांस लकड़ी, अखबार के कागज़, गोंद आदि की सहायता से बनाये जाते हैं. ताकि यह वज़न में हलके रहें फिर इन्हें खूब सजाया जाता है. नकली कपड़े पहनाये जाते हैं. इन पर इन पुतलों के नाम भी लिखे जाते हैं. और मजेदार बात यह है कि जलाने के पहले लकड़ियों से या झाड़ियों से या पलाश की टहनियों से इनकी पिटायी की जाती है.

कालांतर में इस काली मारबत में एक पीली मारबत भी जुड़ गयी. इसमें एक पीली देवी का एक सुन्दर सा पुतला बनाया जाता है. जहां कुरूप काली मारबत बुराई की प्रतीक है. वहीँ सुन्दर पीली मारबत अच्छाई की प्रतीक. दोनों मारबत का जुलुस साथ साथ निकाला जाता है. अच्छाई के पुतले के आगे हर बुराई के पुतले को झुकाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि पीली मारबत यानी सुख समृद्धि, सम्पन्नता, शांति और सुखमय जीवन सबको मिले.

इसे धार्मिक रूप देने के लिए बाद में इसमें पूतना की कहानी भी जोड़ दी गयी. जिसका संहार कृष्ण ने किया था. यद्यपि यहां उसे पूतना राक्षसी नहीं बल्कि ‘पूतना मावशी’ यानी पूतना मौसी कहा गया. जो इस बात का प्रतीक है कि यहां राक्षस, नाग, असुर आदि जाति होती थी.

इस मौके पर गाया जाने वाला गीत

इस मारबत का जुलुस पूरे गाजे बाजे के साथ निकाला जाता है.  इसमें अनेक करतब किये जाते हैं. शहर में मेला जैसा लग जाता है और मारबत को विदा करते हुए मराठी में नारे भी लगाये जाते हैं. “रोग राई कचरा काड़ी घेऊन जा गे मारबत” यानी हे मारबत तू अपने साथ सारी बीमारियां, गन्दगी, कचरा आदि, लेकर चली जा.   मारबत, तू अपने साथ अन्याय, दमन, शोषण, अत्याचार लेकर चली जा.

हे मारबत, तू अपने साथ झूठ, धोखाधड़ी, बेईमानी, बुराई की भावना लेकर चली जा. हमारे सारे दुःख, पीड़ा, कष्ट, बेबसी, आंसू, और जीने की बदतर स्थितियाँ लेकर चली जा.

और ये यह बात कोई कैसे भूल सकता है कि प्रतिरोध का यह पर्व जिस नागपुर में मनाया जाता है वह नागपुर महाराष्ट्र के उसी विदर्भ क्षेत्र में आता है जहां के किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की है.

SP Deoghar

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like