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कर्ज में डूबे किसान को पहले नक्सलियों ने दी धमकी अब महाजन डाल रहे हैं दबाव, न्याय की गुहार

Anupriya

Palamu :  एक भारतीय किसान कितनी मेहनत व मुश्किलों और उम्मीदों के साथ खेत में फसल बोता है, इससे शायद सभी परिचित होंगे. किसान अपनी फसल का एक बच्चे की तरह पालन-पोषण करता है. उसे बड़ा करता है. तब जाकर अन्न के दर्शन हो पाते हैं. और किसान की उसे बेच कर अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा कर पाता है.

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लेकिन किसी कारण जब ये फसल बर्बाद हो जाती तो, उसकी सारी उम्मीदों और सपनों पर पानी फिर जाता है. और कई बार ऐसी खबर आती है कि किसान इस नुकसान को बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर ली. महाराष्ट्र के विदर्भ और देश के अन्य राज्यों से भी ऐसी खबरे आती रहती हैं.

कुछ इसी तरह का एक मामला पलामू जिले के एक किसान के समक्ष पेश आया है. जिनकी फसल बर्बाद बर्बाद हो गयी है और वे अब जीवन-मरण के दोराहे पर खड़े हैं.

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ये किसान हैं पलामू जिले के नौडीहा प्रखंड अंतर्गत ललगड़ा पंचायत निवासी महेंद्र सिंह. महेंद्र सिंह एक गरीब आदिवासी किसान हैं, जिन्हें कई वर्षो पहले सरकार द्वारा कुछ भूखंड आवंटित की गयी थी. जिस पर वो खेती कर रहे थे. इसी के साथ गांव के कुछ लोगों ने भी उनको बंटाई की शर्त पर अपने खेत दिये थे.

लेकिन इन खेतों पर की अधिकांश फसल को हर साल मवेशी चर जाते हैं. खेतों के गांव से दूर होने के कारण वे अपनी फसलों की पूरी तरह से हिफाजत कर पाने में अक्षम हैं. जिससे उनको भारी नुकसान हुआ है.

महेंद्र सिंह की मानें तो 2008 से 2014 तक उन्हें करीब चौदह लाख रुपए का नुकसान हो चुका है. उन्होंने मवेशी मालिको से मिन्नत समाजत की कि उनकी फसलों को मवेशी से बचाया जाये. लेकिन गांव वालों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा.

अपनी शिकायत लेकर वे पुलिस के पास भी पहुंचे. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. यहां तक कि मुकदमा भी दर्ज कराया गया. लेकिन उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला.

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हार कर महेंद्र सिंह ने इस संबंध में तत्कालीन मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, आदिवासी कल्याण आयुक्त को पत्र लिखकर मामले से अवगत कराया. कार्यवाही करते हुए मुख्य सचिव ने जिला कल्याण विभाग व कल्याण विभाग ने अनुमंडल पदाधिकारी से जवाब मांगा.

प्रावधान के अनुसार मुआवजे की प्रक्रिया चल ही रही थी कि नक्सलियों ने उनके घर पर नोटिस भेज दिया कि मुकदमा वापस लिया जाये. नहीं लिया तो जान से मार दिया जाएगा. साथ ही घर भी लूट लिया जायेगा. इस खौफ से महेंद्र सिंह पीछे हट गए. लेकिन खेती के लिए जिन महाजनों से महेंद्र सिंह ने कर्जा लिया था वह उन पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं.

अब जब राज्य में नई सरकार बने एक साल हो गये हैं, तो भी वे दर-दर की भटक रहे है. एक तरफ नक्सलियों की धमकी और दूसरी तरफ महाजनों के दबाव से उनका जीना दुभर हो चुका है. उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से न्याय की गुहार लगायी है.

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