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झारखंड में 10 सालों में मनरेगा मजदूरी दर 100 रुपये तक बढ़ी, एक धेला भी नहीं बढ़ी मुआवजा राशि

RANCHI : झारखंड में 10 सालों से मनरेगा श्रमिकों की मुआवजा राशि में धेला भर की भी वृद्धि नहीं हुई है. 2011 में ग्रामीण विकास विभाग ने श्रमिकों के लिये दुर्घटना या मृत्यु की स्थिति में अनुग्रह राशि दिये जाने का आदेश जारी किया था. पहली बार यह पहल श्रमिकों के लिये शुरू हुई थी. मृत्यु की स्थिति में 75,000 औऱ अपंगता, घायल होने के केस में 37,500 का प्रावधान था. तब से अब तक इसमें एक आना भी नहीं बढ़ा है. हालांकि मजदूरी दर में 100 रुपये से भी अधिक की बढ़ोत्तरी हो चुकी है. मनरेगा श्रमिकों को फिलहाल 225 रुपये मजदूरी दर का भुगतान किया जाता है. इसी साल फरवरी-मार्च से यह पहल शुरू हुई है.

 

अनुग्रह राशि के लिये मिलेंगे 10 करोड़

 

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ग्रामीण विकास विभाग ने 15 जून को सभी जिलों के डीडीसी को मनरेगा श्रमिकों के लिये अनुग्रह राशि का भुगतान किये जाने का निर्देश जारी दिया है. वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिये इस मद में राज्य कोष से 10 करोड़ रुपये का भुगतान तय किया गया है. इसके तहत दुर्घटना में मृत्यु या विकलांगता की स्थिति में 75,000 रुपये का भुगतान संबंधित पक्ष को किया जाना है. दुर्घटना में विकलांगता की स्थिति पर 37,500 की व्यवस्था तय है.

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पर मनरेगा कार्यक्रमों को नजदीक से देखने वाले औऱ नरेगा वॉच के संयोजक जेम्स हेरेंज कहते हैं कि झारखण्ड में मनरेगा में कार्यरत मजदूरों के घायल होने या मृत्यु होने पर मुआवजा का प्रावधान 01-08-2011 से ही लागू है. कई क्लेम किये गये हैं. इसका लाभ भी कई लोगों को मिला है. सरकार नई बोतल में पुरानी शराब भरकर क्या साबित करना चाहती है. वाहवाही तो तब होती जब 10 साल पूर्व के फैसले में सम्मानजनक राशि देने की अधिसूचना जारी होती. सरकार अपनी पीठ खूद ही थपथपा रही है.

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मनरेगा कर्मियों की भी सुध ले सरकार

 

झारखण्ड राज्य मनरेगा कर्मचारी संघ के मुताबिक झारखण्ड के मनरेगा मजदूरों के लिए सरकार द्वारा घोषित मुआवजा राशि नयी बात नहीं. यह प्रावधान पूर्व में एक्ट में निर्धारित है. एक्ट का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें मनरेगा कर्मियों के लिए बीमा संबंधी कोई प्रावधान नहीं है. मनरेगा कर्मियों का केंद्र सरकार की गलत नीतियों के कारण न तो बीमा मिल पा रहा है न समान काम, समान वेतन. मनरेगा एक्ट में कई बार संसोधन किया गया परंतु कर्मचारियों के हितार्थ बीमा, वेतन सुविधा, सामाजिक सुरक्षा औऱ अन्य चेप्टर में विगत 15 वर्षों में कोई संशोधन नहीं हुआ. विगत हड़ताल में संघ ने सामाजिक सुरक्षा, बीमा, EPF औऱ वेतनमान के लिए सरकार को राजी भी किया परंतु 8 महीने से वह भी फाइलों औऱ वादों में दबा है. ग्रामीण विकास विभाग ही वादा खिलाफी कर हर हड़ताल की नींव रखता है. संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष महेश सोरेन ने सरकार से मांग करते हुए कहा कि कोरोना संकट में मृत 30 मनरेगा कर्मियों ने अपनी जान गंवायी है. इसमें 24 सामान्य कारणों से और 6 कोविड 19 के चलते दिवंगत हुए हैं. सरकार इनके आश्रितों की भी सुध ले. घोषित मुआवजे का अविलंब भुगतान करे.

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