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‘मीडिया के ‘जोकर’ व बीजेपी के ‘पप्पू’ का एक राजनेता के रूप में प्रकटीकरण’

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Manoj Kumar

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लोकसभा चुनाव के पूर्व जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए उनके परिणाम आ गए. तेलंगाना और मिजोरम में दोनों राष्ट्रीय पार्टियां यानी बीजेपी और कांग्रेस बुरी तरह क्रमशः टीआरएस और मिजो नेशनल फ्रन्ट से परास्त हुईं. छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस चुनाव जीती. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस दो तिहाई सीटें प्राप्त कर रमन सिंह व बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने में सफल हुए. तमाम सर्वे के उल्ट इस राज्य में बगैर सीएम का नाम घोषित किये कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली.

यहां उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस के पास कोई बड़ा चेहरा नहीं था तथा यहां अजित जोगी और मायावती का गठबंधन भी कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में लगा हुआ था. राजस्थान में सर्वे के विपरीत बीजेपी अच्छा प्रदर्शन की, लेकिन गहलोत और पायलट की जोड़ी बीजेपी पर भारी सिद्ध हुई और 199 में 99 सीटें कांग्रेस की झोली में गयीं.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस गुटबाजी खत्म कर कमलनाथ और सिंधिया के नेतृत्व में बीजेपी को पीछे छोड़ने में सफल रही. जहां राजस्थान में गहलोत-पायलट वसुंधरा पर भारी सिद्ध हुए वहीं मध्य प्रदेश में कमलनाथ-सिंधिया शिवराज पर भारी साबित हुए. दोनों राज्यों में राहुल गांधी अनुभव और युवा जोश का जो सामंजस्य बनाकर चुनाव में उतरे वह सफल रहा. यहां यह उल्लेखनीय है कि दोनों राज्यों में आज भी कांग्रेस संगठन बीजेपी से कमजोर है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पन्द्रह वर्षों से बीजेपी सत्ता में थी,अतएव स्वाभाविक है कि वहां सत्ता विरोधी लहर थी. राजस्थान में पांच साल से बीजेपी सत्ता में थी और इस राज्य में प्रत्येक पांच वर्षों पर सत्ता में अदला-बदली का इतिहास है. इस सत्ता विरोधी लहर के बावजूद मध्य प्रदेश और राजस्थान में बीजेपी संघर्ष में रही और बुरी तरह नहीं हारी तो इसका कारण कांग्रेस संगठन का कमजोर होना तथा मोदी मैजिक का पूरी तरह समाप्त ना होना है.

छत्तीसगढ़ में तुलनात्मक दृष्टि से कांग्रेस संगठन मजबूत है जिसका असर गत विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिला था कि कांग्रेस चुनाव जीतते-जीतते हार गयी थी. ध्यातव्य है कि रमन सिंह आज भी शिवराज और वसुंधरा से कम अलोकप्रिय हैं.
राहुल गांधी गुजरात चुनाव में अनुभव की कमी से मोदी से चुनाव हार गए थे, लेकिन उस चुनाव परिणाम ने राहुल का आत्मविश्वास बढ़ा दिया था. मोदी के अपराजेय होने के भ्रम को चकनाचूर कर दिया था और कर्नाटक चुनाव में राहुल ने मणिपुर तथा गोवा की गलतियों से सीख लेकर बीजेपी के नापाक मनसूबों पर पानी फेर दिया. और अभी छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान के चुनाव में राहुल मोदी को परास्त करने में सफल हुए.

यह परिणाम जहां कामयाब समीकरण और पर्सेप्सन का द्योत्तक है. वहीं मीडिया के जोकर व बीजेपी के पप्पू का एक राजनेता के रूप में ट्रांसफोर्मेशन का प्रकटीकरण है. कवि कुंवर नारायण की पंक्ति कि “हारा वही जो लड़ा नहीं” एक बार फिर प्रासंगिक हुई. राहुल हार पर हार से निराश जरूर हुए, पर लड़ना नहीं छोड़े और आज वे लड़ते-लड़ते जीतना सीख गए. डॉ. मनमोहन सिंह की हार का एक प्रमुख कारण सत्ताविरोधी लहर थी. पर उस लहर के लाभार्थी नरेंद्र मोदी को जीत का श्रेय देने वाले बौद्धिक जमात आज राहुल को श्रेय देने में हिचक रहे हैं, जो आश्चर्यजनक है.

जो लोग सन 2013 में इन्हीं तीनों राज्यों के चुनाव को सेमीफाइनल कहकर मोदी के पक्ष में माहौल बना रहे थे, आज वे लोग यह कह रहे हैं कि राज्य के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं और इसका प्रभाव लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ता है. यह सही है कि राज्य के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होते हैं पर इसका प्रभाव निश्चित लोकसभा के चुनाव पर पड़ता है. कौन इनकार कर सकता है कि कल के परिणाम से राहुल का मनोबल बढ़ा है.

राहुल की स्वीकृति बढ़ी है. कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं के आत्मविश्वास में वृद्धि हुई है. दूसरी तरफ मोदी-अमित शाह की जोड़ी को इस परिणाम ने सचेत किया है. उन्हें टीवी अखबार से बाहर जाकर गांवों की पगडंडियों का फीड बैक लेने को मजबूर होना पड़ेगा. अखबार व रिपोर्टर केवल पर्सेप्सन बनाता है न कि चुनाव जीताता है. चुनाव तो गांव के किसान, मजदूर, युवा ही जीताते हैं. यह भी याद करने की बात है कि ये तीनों राज्य आरएसएस का कार्य क्षेत्र व प्रयोगशाला रहा है तथा हिंदी प्रदेश है. गत लोकसभा चुनाव में इन्हीं तीनों राज्यों से बीजेपी को 61 सीटें मिली थी.

राजस्थान के 25 में 25, एमपी के 29 में 27 और छत्तीसगढ़ के 11 में 9 सीटें बीजेपी की झोली में गयी थी और अबकी 2019 के चुनाव में यह संभव कदापि नहीं होगा. जन धन योजना, उज्ज्वला और स्वच्छ भारत धरातल पर उतना सफल नहीं है. नोटबंदी, जीएसटी से लोग आज भी परेशान हैं. उच्चत्तम न्यायालय, सीबीआई, रिजर्व बैंक के विवाद सरकार के पर्सेप्सन को धक्का पहुंचा रहा है. हां बीजेपी के लिए संतोष की बात है कि मोदी मैजिक कमजोर जरूर हुआ है पर खत्म नहीं हुआ है.

ये लेखक के निजी विचार हैं

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