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मेनहर्ट घोटाला 12: IG एमवी राव ने 5 बार मांगी थी FIR की अनुमति, निगरानी आयुक्त राजबाला ने नहीं दी इजाजत, देती तो रघुवर हो जाते गिरफ्तार

Saryu Roy

निगरानी ब्यूरो की जांच में अड़ंगा- विधानसभा की कार्यान्वयन समिति का प्रतिवेदन 7 जनवरी 2007 को सौंप दिया गया था. इसके आधार पर गठित पांच अभियंता प्रमुखों का जांच प्रतिवेदन 2 अप्रैल 2008 को सरकार के पास आया. इसके बाद भी सरकार ने इनकी अनुशंसाओं और मंतव्यों के आधार पर दोषी व्यक्तियों को चिन्हित कर कार्रवाई नहीं की. पांच अभियंताओं की जांच समिति गठित होने के पहले ही सरकार ने मैनहर्ट को कार्य आदेश दे दिया था. इस पर कतिपय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जांच समिति के प्रतिवेदनों की प्रतियां प्राप्त की.

मैनहर्ट की नियुक्ति में हुए भ्रष्टाचार एवं अनियमितताओं की निगरानी जांच कराने के लिये एक परिवाद पत्र सरकार और निगरानी ब्यूरो के समक्ष दाखिल किया गया. इस बीच राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. कारण कि मुख्यमंत्री श्री शिबू सोरेन तमाड़ विधानसभा उपचुनाव हार गये थे. कांग्रेस समर्थित उनकी सरकार गिर गयी थी. इस कारण झारखंड में राष्ट्रपति शासन लग गया था.

माननीय राज्यपाल के सलाहकार श्री जी कृष्णन ने परिवाद पत्र को कारवाई के लिए निगरानी विभाग में भेज दिया. उन्होंने 23 सितंबर 2009 को मैनहर्ट की नियुक्ति में अनियमितता की जांच करने का आदेश निगरानी आयुक्त को दे दिया. इसके साथ ही परिवाद पत्र की एक प्रति अलग से निगरानी ब्यूरो को भी प्राप्त हुई थी. निगरानी ब्यूरो ने इसके आधार पर परिवाद संख्या 593/09 दायर कर लिया. परिवाद पत्र 60 पृष्ठों का था, जिसमें मैनहर्ट की नियुक्ति में हुई तमाम अनियमितताओं का विस्तार से जिक्र था.

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इस आधार पर निगरानी ब्यूरो ने परिवाद पत्र के आपराधिक पहलुओं की जांच स्वतः आरम्भ कर दिया. तब श्री एमवी राव (वर्तमान आरक्षी महानिदेशक) निगरानी ब्यूरो के आरक्षी उपमहानिरीक्षक थे. इस परिवाद पत्र में पूर्व नगर विकास मंत्री और विधायक श्री रघुवर दास को मुख्य अभियुक्त बनाया गया था. इसके अतिर्नित मैनहर्ट की बहाली संबंधी निविदा का मूल्यांकन करने वाली तकनीकी उपसमिति एवं उच्चस्तरीय तकनीकी समिति के सदस्य अभियंतागण एवं मुख्य समिति के सदस्य वरीय अधिकारीगण भी इसमें अभियुक्त बनाये गये थे.

इसलिए श्री राव ने जांच की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए 16 अक्टूबर 2009 को 60 पृष्ठों का मूल परिवाद पत्र संलग्न करते हुये निगरानी आयुक्त को पत्र लिखकर उनसे इस संदर्भ में मार्गदर्शन देने का अनुरोध किया. यह पत्र निम्नवत है –

झारखण्ड सरकार

निगरानी ब्यूरो, रांची.

प्रेशक,

पुलिस उप-महानिरीक्षक,

निगरानी ब्यूरो, रांची.

सेवा में,

निगरानी आयुक्त,

मंत्रिमंडल (निगरानी) विभाग,

झारखण्ड, रांची.

रांची, दिनांक 16.10.2009

प्रसंग: परिवाद सं.-593/09 विरूद्ध तत्कालीन नगर विकास मंत्री एवं वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भाजपा, श्री रघुवर दास, रांची क्षेत्रीय विकास प्राधिकार के तत्कालीन मुख्य अभियंता, उनके सहयोगी तथा निविदा की तकनीकी मूल्यांकन उप समिति के सदस्य.

विषय: प्राप्त परिवाद पत्र में अग्रेतर कार्रवाई हेतु मार्गदर्शन के संबंध में.

महाशय,

निदेशानुसार प्रसंगाधीन परिवाद संख्या- 593/09 मूल रूप में उपलब्ध कराते हुए अनुरोध है कि इस पर अग्रेतर कार्रवाई करने हेतु मार्गदर्शन देने की कृपा की जाय.

अनु.-मूल परिवाद पत्र कुल 60 पृष्ठों में.

विश्वासभाजन

(हस्ताक्षर अस्पष्ट)

पुलिस उप महानिरीक्षक,

निगरानी ब्यूरो, रांची .

परंतु उन्हें मार्गदर्शन नहीं मिला. निगरानी आयुक्त ने निगरानी ब्यूरो द्वारा जांच करने की अनुमति लेने हेतु ब्यूरो के इस पत्र से संबंधित संचिका राज्यपाल के सलाहकार के पास नहीं भेजा. इसकी जगह निगरानी आयुक्त ने निगरानी तकनीकी परीक्षण कोषांग से जांच कराने की संचिका राज्यपाल के सलाहकार को भेज दिया, जिसपर राज्यपाल के सलाहकार ने जांच करने हेतु आदेश कर दिया. निगरानी आयुक्त ने संचिका निगरानी तकनीकी परीक्षण कोषांग के कार्यपालक अभियंता और अधीक्षण अभियंता को जांच के बारे में मंतव्य देने हेतु भेज दिया. 18 दिसंबर 2009 को निगरानी तकनीकी परीक्षण कोषांग के कार्यपालक अभियंता एवं अधीक्षण अभियंता ने आदेश की संचिका मुख्य अभियंता के पास भेज दिया. मुख्य अभियंता ने उसी दिन आरंभिक जांच का आदेश दे दिया.

आरंभिक जांच के फलाफल का विस्तृत विवरण इस पुस्तक के अगले खंड-10 में अंकित है. निगरानी आयुक्त द्वारा निगरानी ब्यूरो को जांच करने की अनुमति नहीं देने के पीछे का मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि निगरानी ब्यूरो जांच आरम्भ करने के पहले प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करता है, अनुसंधान के क्रम पुख्ता साक्ष्य मिलने पर गिरफ्तारी कर पूछताछ करता है और सबूत जुटाने के लिए अभियुक्तों के ठिकानों पर छापामारी भी करता है. अनुसंधान पूरा हो जाने पर चार्जशीट (आरोप पत्र) अदालत में दायर करने के समय भी गिरफ्तारी हो सकती है.

मैनहर्ट के अवैध बहाली मामले में सबूत इतने पुख्ता थे कि इसमें निगरानी ब्यूरो की जांच होने पर यह सब होना ही होना था. इसलिये निगरानी आयुक्त के यहां से पुलिस उप महानिरीक्षक श्री एमवी राव को जांच करने की अनुमति नहीं मिली. एक अपराध पर पर्दा डालने और मैनहर्ट प्रकरण की निगरानी ब्यूरो द्वारा जांच कराने की राह में अड़ंगा डालने का यह कुत्सित प्रयास था. इस बीच ताहिर हुसैन नामक एक सामाजिक कार्यकर्ता ने मैनहर्ट की नियुक्ति में अनियमितता और भ्रष्टाचार संबंधी तमाम जानकारियां सूचना अधिकार अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत इकट्ठा किया और इस आधार पर इसकी जांच कराने की प्रार्थना के साथ झारखंड उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका संख्या 735/2010 दायर कर दिया. तत्कालीन माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री भगवती प्रसाद और माननीय न्यायाधीश श्री नरेंद्र नाथ तिवारी की खंडपीठ ने याचिका के सुनवाई के उपरांत 13 सितम्बर 2010 को फैसला दिया, जो निम्नवत है :-

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माननीय झारखण्ड उच्च न्यायालय की खंडपीठ के इस निर्णय के अनुरूप याचिकाकर्ता ने उनके पास उपलब्ध अनियमितता के प्रमाणों के साथ निगरानी आयुक्त के समक्ष एक परिवाद पत्र 21.9.2010 को दाखिल किया. निगरानी ब्यूरो ने इस परिवाद पत्र को भी परिवाद संख्या-593/09 के साथ नत्थी कर दिया. निगरानी ब्यूरो ने इस परिवाद पर जांच की कार्रवाई आरम्भ की. चूंकि पूर्व मंत्री और विधायक श्री रघुवर दास इस परिवाद पत्र में मुख्य अभियुक्त थे, इसलिए निगरानी ब्यूरो ने निगरानी आयुक्त से नियमानुसार कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए अनुमति देने की मांग की. निगरानी ब्यूरो के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक श्री एमवी राव ने 22 सितंबर 2010 को इस परिवाद पत्र को संलग्न करते हुये मार्गदर्शन देने का अनुरोध निगरानी आयुक्त से किया. यह पत्र निम्नवत है –

पत्रांक- 5614

झारखण्ड सरकार

निगरानी ब्यूरो, रांची.

प्रेषक,

एमवी राव, भापुसे.,

पुलिस महानिरीक्षक

निगरानी ब्यूरो, रांची.

सेवामें,

निगरानी आयुक्त,

झारखण्ड, रांची.

रांची, दिनांक 22.09.2010

विषय : डब्लूपी (पीआईएल) सं.- 735/2010 मो. ताहिर बनाम झारखण्ड राज्य एवं अन्य, निहित स्वार्थवश जानबूझ कर रांची के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण हेतु अयोग्य होने के बावजूद मैनहर्ट को परामर्शी नियुक्त करने इत्यादि के संबंध में.

महोदया,

उपर्युक्त विषय से संबंधित मोहम्मद ताहिर नामक व्यक्ति का परिवाद पत्र अनुलग्नक सहित प्राप्त हुआ है, जिसे संलग्न कर भेजा जा रहा है. यह परिवाद पत्र तत्कालीन मंत्री श्री रघुवर दास एवं अन्य पर आरोप से संबंधित है, जिसमें राज्य सरकार का मार्गदर्शन प्राप्त करना आवश्यक प्रतीत होता है. निदेशानुसार अनुरोध है कि इस संबंध में उचित मार्गदर्शन देने की कृपा प्रदान की जाय.

विश्वासभाजन

(एम. वी. राव)

पुलिस महानिरीक्षक,

निगरानी ब्यूरो, रांची.

इसके बाद श्री राव ने 4-12-2010 और 20-01-2011 को इस बारे में निगरानी आयुक्त को पत्र भेजा . परंतु निगरानी ब्यूरो को परिवाद की जांच करने की अनुमति निगरानी आयुक्त से नहीं मिली . ये दोनों पत्र निम्नवत हैं –

पत्रांक- 7390

झारखण्ड सरकार

निगरानी ब्यूरो, रांची.

प्रेषक,

एमवी राव, भापुसे,

पुलिस महानिरीक्षक

निगरानी ब्युरो, रांची .

सेवामें,

निगरानी आयुक्त,

झारखण्ड, रांची.

रांची, दिनांक 04.12.2010

प्रसंग: इस कार्यालय का पत्रांक 5614 दिनांक 22.09.2010

विषय: डब्लूपी (पीआईएल.) सं.- 735/2010 मो. ताहिर बनाम झारखण्ड राज्य एवं अन्य, निहित स्वार्थवश जानबूझ कर रांची के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण हेतु अयोग्य होने के बावजूद मैनहर्ट को परामर्शी नियुक्त करने इत्यादि के संबंध में.

महोदया,

उपर्युक्त प्रसंग एवं विषय का कृपया स्ङ्करण किया जाये, जिसमें राज्य सरकार का मार्गदर्शन प्राप्त करना आवश्यक बताया गया. वांछित मार्गदर्शन अब तक अप्राप्त है. निर्देशानुसार अनुरोध है कि इस संबंध में उचित मार्गदर्शन देने की कृपा प्रदान की जाय.

विश्वासभाजन

(एमवी राव)

पुलिस महानिरीक्षक,

निगरानी ब्यूरो, रांची .

पत्रांक- 401

झारखण्ड सरकार

निगरानी ब्यूरो, रांची.

प्रेषक,

एमवी राव, भापुसे,

पुलिस महानिरीक्षक

निगरानी ब्यूरो, रांची.

सेवामें,

निगरानी आयुक्त,

झारखण्ड, रांची.

रांची, दिनांक 20.01.2011

प्रसंग : इस कार्यालय का पत्रांक 5614 दिनांक 22.09.2010 एवं पत्र सं.-

7390, दिनांक 04.12.2010

विषय: डब्लूपी (पीआईएल.) सं.-735/2010 मो. ताहिर बनाम झारखण्ड राज्य एवं अन्य, निहित स्वार्थवश जानबूझ कर रांची के सिवरेज-ड्रेनेज निर्माण हेतु अयोग्य होने के बावजूद मैनहर्ट को परामर्शी नियुक्त करने इत्यादि के संबंध में.

महोदया,

उपर्युक्त विषय से संबंधित मोहम्मद ताहिर नामक व्यक्ति का परिवाद पत्र अनुलग्नक सहित प्राप्त हुआ है, जिसे संलग्न कर भेजा जा रहा है. इस परिवाद पत्र में तत्कालीन मंत्री श्री रघुवर दास एवं अन्य पर आरोप से संबंधित है, जिसमें राज्य सरकार का मार्ग दर्शन प्राप्त करना आवश्यक प्रतीत होता है. निर्देशानुसार अनुरोध है कि इस संबंध में उचित मार्ग दर्शन देने की कृपा प्रदान की जाय.

अनु.- यथोपरि विश्वासभाजन

(एमवी राव)

पुलिस महानिरीक्षक,

निगरानी ब्यूरो, रांची .

उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व अक्टूबर 2009 से झारखंड विधान सभा के आम चुनाव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी थी. नवम्बर-दिसंबर 2009 में झारखण्ड विधानसभा के चुनाव हुए. चुनाव के बाद दिसंबर 2009 के अन्त में झारखण्ड में भारतीय जनता पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा की मिलीजुली सरकार गठित हो गयी, जिसमें श्री शिबू सोरेन मुख्यमंत्री और श्री रघुवर दास उपमुख्यमंत्री बन गये थे. यह सरकार अल्प अवधि के लिए राष्ट्रपति शासन रहने के बाद प्रखंड में भाजपा-झामुमो-आजसू गठबंधन की सरकार बन गयी और श्री रघुवर दास सत्ताधारी दल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बन गये. इसलिए 2009 में और इसके बाद निगरानी ब्यूरो को परिवाद पर कार्रवाई करने, यानी मुकदमा दर्ज कर अनुसंधान करने, की अनुमति नहीं मिली तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है. इस बीच इस मामले में माननीय झारखंड उच्च न्यायालय में दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई के संदर्भ में महाधिवक्ता कार्यालय से श्री एमएस अख्तर स्टैंडिंग काउंसिल का एक पत्र (पत्रांक-2681, दिनांक 24-03-2011) निगरानी जांच में हुई कार्रवाई की प्रगति जानने के लिये निगरानी ब्यूरो कार्यालय में आया. इस आलोक में श्री एमवी राव, पुलिस महानिरीक्षक, निगरानी ब्यूरो ने निगरानी आयुक्त को पुन: एक पत्र 28-3-2011 को लिखा और पूर्व के अपने पत्रों का संदर्भ देते हुये कहा कि शिकायत की जांच करने के लिए अबतक कोई मार्गदर्शन नहीं प्राप्त हुआ है, शीघ्र मार्गदर्शन दिया जाय ताकि माननीय न्यायालय को इससे अवगत कराया जा सके. श्री एमवी राव के इस पत्र को नीचे दिया जा रहा है.

एमवी राव का प्रासंगिक पत्र :-

प्रेषक, पत्रांक- 2198

एमवी राव, भापुसे, झारखण्ड सरकार

पुलिस महानिरीक्षक निगरानी ब्यूरो, रांची.

निगरानी ब्यूरो, रांची.

सेवा में,

निगरानी आयुक्त,

मंत्रिमण्डल (निगरानी) विभाग,

झारखण्ड, रांची.

रांची, दिनांक 28.03.2011

प्रसंग: श्री एमएस अख्तर, स्टैंडिंग कौंसिल (माईन्स) महाधिवक्ता का कार्यालय, झारखण्ड, रांची का पत्रांक 2681 दिनांक 24.03.2011 विषय: मेसर्स मैनहर्ट सिंगापुर प्राईवेट लि. बनाम झारखण्ड राज्य एवं अन्य के संबंध में.

महाशय,

उपर्युक्त प्रसंगाधीन विषय के संबंध में सादर सूचित करना है कि महाधिवक्ता कार्यालय से फैक्स द्वारा भेजे गये पत्र की प्रतिलिपि साथ संलग्न किया जाता है. इस पत्र में मेसर्स मैनहर्ट सिंगापुर प्रा. लि. बनाम राज्य सरकार एवं अन्य से संबंधित संदर्भ में निगरानी ब्यूरो में चल रहे जांच का जिक्र किया गया है. उल्लेखनीय है कि मो. ताहिर बनाम झारखण्ड राज्य एवं अन्य में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 13.09.2010 को पारित आदेश की छायाप्रति मो. ताहिर द्वारा निगरानी ब्यूरो में अपने आवेदन के साथ दिनांक 21.09.2010 को समर्पित किया गया है. इस आवेदन एवं उसके अनुलग्नक की प्रति इस कार्यालय के पत्रांक 5614 दिनांक 22.09.2010 (छायाप्रति संलग्न) द्वारा उचित मार्गदर्शन हेतु मंत्रिमण्डल (निगरानी) विभाग में भेजा गया.

अब तक कोई मार्गदर्शन प्राप्त नहीं हुआ है. यह पत्र मूलत: प्रधान सचिव, गृह विभाग एवं प्रधान सचिव, शहरी विकास विभाग को संबोधित है. प्रसंगाधीन वाद दिनांक 18.04.2011 को माननीय उच्च न्यायालय में Listed है. अनुरोध है कि इस संबंध में उचित कार्रवाई करना चाहेंगे.

अनु.- यथोपरि. विश्वासभाजन

(एमवी राव)

पुलिस महानिरीक्षक,

निगरानी ब्यूरो, झारखण्ड, रांची.

परंतु पहले की ही तरह निगरानी ब्यूरो को इस बार भी मामले की जांच करने की अनुमति नहीं मिली. भ्रष्टाचार उन्मूलन के उद्देश्य से बनाई गई प्रमुख संस्था निगरानी ब्यूरो को नख-दंत विहीन बना दिया गया. इसके पैसे में निगरानी आयुक्त के मार्गदर्शन/अनुमति की बेड़िया डाल दी गई. विदित हो कि पूरी अवधि में श्रीमती राजबाला वर्मा निगरानी आयुक्त थीं.

सार संक्षेप :

  1. निगरानी ब्यूरो के आईजी श्री एमवी राव ने कुल पांच पत्र निगरानी आयुक्त को लिखा, परंतु निगरानी ब्यूरो को जांच की अनुमति नहीं मिली.
  2. निगरानी ब्यूरो के समक्ष एक परिवाद पत्र माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार आया था. निर्णय था कि याचिकाकर्त्ता निगरानी आयुक्त के पास जाये. यदि उनकी शिकायत तथ्यपूर्ण होगी तो निगरानी आयुक्त विधि सम्मत कार्रवाई करेंगे. परन्तु निगरानी आयुक्त ने परिवाद पत्र में दर्ज शिकायतों का संज्ञान लेना तो दूर इसकी जांच करने के लिए लिखे गये निगरानी ब्यूरो के पत्रों का भी संज्ञान नहीं लिया. जांच को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी.
  3. जांच की अनुमति नहीं देने के पीछे भी ठोस कारण था. निगरानी ब्यूरो जब जांच आरंभ करता है तो वह भारतीय दण्ड संहिता के और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विहित प्रावधानों के तहत मुकदमा दर्ज करता है. प्रारंभिक जांच में प्रमाण मिलते हैं तो विधिवत जांच आरंभ करता है. संबंधित लोगों से सघन पूछ-ताछ करता है. जांच में आरोप सिद्ध होने के बाद चार्जशीट दाखिल करता है और अभियुक्तों की गिरफ्तारी करता है.
  4. स्वाभाविक रूप से इस जांच में आय से अधिक संपति की जांच भी जुड़ जाती है. अब तक की विभिन्न जांचों में जो प्रमाण आये थे, उनके आधार पर यह भ्रष्टाचार का ठोस मामला बनता था.
  5. निगरानी ब्यूरो को जांच आगे बढ़ाने की अनुमति मिली होती तो दोषी व्यक्ति अब तक सलाखों के पीछे होते

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डिस्क्लेमर- (लेखक झारखंड के पूर्व मंत्री रह चुके हैं. यहां प्रकाशित विचार उनके निजी हैं. इसका न्यूज विंग से कोई संबंध नहीं है.)

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