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मांडू : राजेंद्र बिरहोर को नहीं मिल रहा था सरकारी राशन, पोषण की कमी और बीमारी से हुई मौत!

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Ranchi : 24 जुलाई 2018 को रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड स्थित चैनपुर गांव निवासी 39 वर्षीय राजेंद्र बिरहोर की पोषण की कमी और बीमारी के कारण मृत्यु हो गयी. जन संगठनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM), भोजन का अधिकार अभियान और ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क (HRLN) के सदस्यों के तथ्यान्वेषण दल ने पाया कि राजेंद्र बिरहोर के परिवार को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत राशन कार्ड नहीं मिला था. मांडू के प्रखंड विकास पदाधिकारी के अनुसार आधार के अभाव में परिवार का राशन कार्ड नहीं बना था.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश की हुई अनदेखी

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि आदिम जनजाति समुदाय, जिसका बिरहोर समुदाय हिस्सा है, को अंत्योदय अन्न योजना अंतर्गत प्रति माह 35 किलो राशन का हक है. साथ ही, झारखंड के आदिम जनजाति समुदाय के परिवारों को उनके घर पर निःशुल्क राशन मिलना है. फिर भी राजेंद्र बिरहोर के मामले में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की अनदेखी की गयी.

न राशन, न काम, न पेंशन

एक वर्ष पहले कमजोरी के कारण राजेंद्र बिरहोर ने काम करना छोड़ दिया था. उनकी पत्नी को सप्ताह में 2-3 दिनों का ही काम मिल पाता था. पिछले एक साल में परिवार की आमदनी में गिरावट के कारण राजेंद्र बिरहोर, उनकी पत्नी और छह बच्चे पर्याप्त पोषण से वंचित थे. परिवार को मनरेगा में आखिरी बार 2010-11 में काम मिला था. उन्हें आदिम जनजातियों को मिलनेवाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन की 600 रुपये प्रति माह की राशि भी नहीं मिलती है. प्रखंड विकास पदाधिकारी इस योजना के विषय में अवगत भी नहीं थे.

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सामुदायिक केंद्र के डॉक्टर ने सहिया को ठहरा दिया दोषी

राजेंद्र बिरहोर लगभग डेढ़ महीने पहले गंभीर रूप से बीमार हो गये थे. उनके परिवार के सदस्य उन्हें मांडू के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गये, क्योंकि स्थनीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं रहते हैं. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर ने उन्हें रिम्स, रांची रेफर कर दिया. स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी तथ्यान्वेषण दल को यह नहीं बता पाये कि क्यों मांडू स्वास्थ्य केंद्र या रामगढ़ के सदर अस्पताल में राजेंद्र बिरहोर की खून और पेशाब की जांच नहीं हो सकती थी. राजेंद्र बिरहोर को स्वास्थ्य केंद्र से कोई दवा भी नहीं दी गयी. रांची आकर रहने-खाने की व्यवस्था की अनिश्चितता के कारण परिवार राजेंद्र बिरहोर को गांव वापस ले गये. गांव में उनकी चिकत्सा के लिए एक स्थनीय झोलाछाप डॉक्टर को 3000 रुपये दिये गये, जिसके लिए परिवार को घर में पाले सूअर को बेचना पड़ा. राजेंद्र बिरहोर के स्वास्थ्य की स्थिति पर निगरानी नहीं रखने के लिए सामुदायिक केंद्र के डॉक्टर ने गांव की सहिया को ही दोषी ठहराया है.

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मृतक चितामन मल्हार की बस्ती में किसी के भी पास नहीं है राशन कार्ड

14 जून 2018 को मांडू प्रखंड के ही चितामन मल्हार की कथित रूप से भुखमरी से मृत्यु हो गयी थी. चितामन मल्हार की मृत्यु के मामले की जांच में यह बात भी सामने आयी थी कि उनके टोले कुंदरिया बस्ती का मल्हार टोला के किसी भी परिवार के पास राशन कार्ड नहीं था. जब यह दल 26 जून को उस टोले में गया, तो पता चला कि अब तक भी किसी परिवार को राशन कार्ड नहीं दिया गया है. झारखंड में पिछले नौ महीनों में कथित रूप से भुखमरी से कम से कम 13 व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है. इनमें से कम से कम सात व्यक्तियों की भुखमरी के लिए आधार संबंधित समस्याएं जिम्मेदार थीं. झारखंड सरकार ने अभी तक अभियान की इन मुद्दों से संबंधित मांगों- जैसे जन वितरण प्रणाली का सार्वभौमिककरण औऱ इसमें दाल व खाद्य तेल शामिल करने, सभी सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का आधार से जुडाव समाप्त करने आदि पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की है.

‘राइट टू फूड झारखंड’ नाम के यूट्यूब चैनल पर मौजूद इन वीडियो पर क्लिक कर सुन सकते हैं मांडू बीडीओ और ग्रामीणों का बयान

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