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संदर्भ : मांडर उपचुनाव – शिल्पी की जीत से कांग्रेस का प्रेशर ग्रुप हुआ मजबूत

Shyam Kishore Choubey

Ranchi : झारखंड की राजधानी रांची से सटे मांडर विधानसभा क्षेत्र में हुए उपचुनाव में शिल्पी नेहा तिर्की की जीत कांग्रेस के प्रेशर ग्रुप को और मजबूत करेगी. जीवन के प्रायः तीस बसंत देखी चुकीं शिल्पी मार्केटिंग कम्युनिकेशन में पीजी डिप्लोमाधारी हैं. उपचुनाव में जीत से 26 जून को शिल्पी के नाम राजनीति की एक बड़ी डिग्री चस्पा हो गयी.  देश के कई हिस्सों में लोकसभा और विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों में झारखंड में यह अकेला उपचुनाव था. शिल्पी को यह सुयोग उनके विधायक पिता बंधु तिर्की को एक आर्थिक मामले में कुछ ही अरसा पहले कोर्ट द्वारा दोषी करार देते हुए दो साल की कारावास सजा दी जाने के कारण मिला. इस सजा के कारण बंधु की विधायकी स्वतः समाप्त हो गई थी. बंधु राजनीति के अलग-अलग फोल्डर-फार्मेट में मांडर विधानसभा क्षेत्र का तीन मर्तबा प्रतिनिधित्व कर चुके थे. एक बार तो वे मंत्री भी बनाये गये थे. उसी काल खंड में उनके खाते में तकरीबन छह लाख रुपये आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक मिलने के कारण यह सजा दी गई थी.

शिल्पी अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा की गंगोत्री कुजूर से 23,517 अधिक वोट पाकर  विधायक चुनी गयी. गंगोत्री 2014 में इसी मांडर क्षेत्र से भाजपा के ही टिकट पर विधायक चुनी गई थीं. 2019 के चुनाव में भाजपा ने गंगोत्री के बजाय कांग्रेस छोड़कर उसका दामन थामने वाले देव कुमार धान को मौका दिया था, लेकिन वे तीसरे स्थान पर रहे थे. धान महाशय भी पूर्व में इसी क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गये थे. उपचुनाव की नौबत आने पर भाजपा ने ‘पुराने चावल’ गंगोत्री पर दांव खेला, लेकिन वह भी सिद्ध न हो सका. धान महोदय ने निर्दलीय किस्मत आजमायी, लेकिन उनको महज 22,395 वोटों के साथ फिर वही तीसरा स्थान मिला. अब वे न तो कांग्रेस के हैं, न ही भाजपा के, भविष्य में चाहे जिसके हो जाये. कुल जमा 14 उम्मीदवारों में जोहन तिर्की सबसे कम 593 वोट पा सके. जोहन सहित दस प्रत्याशियों को नोटा को मिले 2,630 वोट जितने मत भी नसीब न हो सके.

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नेहा की जीत कैसे हुई, क्यों हुई, यह विश्लेषण अब भाजपा के लिए अधिक मुफीद होगा. चाहे तो वह लाठी पीटती रहे, सदन में उसके प्रत्याशी को बैठने का मौका तो हाथ से निकल गया. नेहा की जीत कांग्रेस के लिए निश्चय ही खुशी का मौका है लेकिन इस खुशी के साथ उसके लिए शायद सिरदर्द भी हो. झारखंड गठन के गुजरे साढ़े बाइस वर्षों में विधानसभा के चार चुनाव हो चुके हैं. पिछला 2019 का चुनाव ही वह मौका था, जब कांग्रेस 16 सीटों पर काबिज हो सकी थी. जेवीएम के टूटने से ‘घाट-घाट का पानी पी चुके’ बंधु तिर्की और प्रदीप यादव जैसे दो विधायक उसको बोनस में मिल गये थे. यह बड़ी बात नहीं थी. बड़ी बात यह थी कि उस वक्त कांग्रेस के टिकट पर चार महिला प्रत्याशी जीतकर आयी थीं. इतनी महिला विधायक झारखंड के इतिहास में किसी भी दल को कभी न मिल सकी थीं. महिला सशक्तीकरण जैसे नारे के इस दौर में नेहा की जीत के साथ कांग्रेस गर्व से कह सकती है कि 81 सदस्यीय सदन में केवल और केवल उसकी पांच महिला विधायक हैं. चार-पांच महीने पहले उत्तरप्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने महिला प्रत्याशियों को 40 फीसद टिकट दिलवाकर एक इतिहास रचना चाहा था, लेकिन वह तीर-तुक्का चला नहीं. झारखंड ने तो बिना किसी तीर-तुक्के के करीब 30 फीसद  महिला विधायक  कांग्रेस के पल्लू में बांध दिये.

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बेहद मौजूं सवाल अब यह है कि झारखंड में महिलाओं के प्रति कांग्रेस का कोई कर्तव्य बनता है या नहीं? बेशक, कांग्रेस ने अपनी एक विधायक दीपिका सिंह पांडेय को नेशनल टीम में जगह दे दी है लेकिन राजनीति का असल चार्म तो ललबतिया सुख ही है. उस सुख से कांग्रेस ने झारखंड में अपनी सभी महिला विधायकों को महरूम ही रखा है. राज्य कैबिनेट में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों के लिए बर्थ सीमा 12 है, जिसमें से चार कांग्रेस के पाले में हैं. वर्तमान में झारखंड में झामुमो के नेतृत्व में यूपीए शासन है. इस कैबिनेट में एक बर्थ खाली है क्योंकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने अलावा दस मंत्रियों की ही बहाली कर रखी है. यह बारहवीं बर्थ वे कांग्रेस के हवाले करने से तो रहे, कांग्रेस क्या अपनी मौजूदा चार बर्थों (मंत्री पद) में से एक भी किसी महिला साथी को सौंपने का हौसला दिखाएगी?

कहने की बात नहीं कि लगभग ढाई साल पहले जेवीएम से दरकिनार किये जाने के बाद बंधु जब कांग्रेस के शरणागत हुए थे, तो उनको सूबाई संगठन का कार्यकारी अध्यक्ष जैसा महिमामंडित पद सौंपा गया था. वे  कांग्रेस की दहलीज पर नया-नया आये थे. बंधु हालांकि अभी भी उस पद पर बने हुए हैं, लेकिन अब उनकी बेटी राज्य के शीर्ष सदन में पहुंच गयी है. उसकी महत्वाकांक्षा का तो पता नहीं, क्योंकि वह राजनीति का ककहरा सीखने से पहले ही विधायक चुनी जाकर हेड मिस्ट्रेस बन गयी है, लेकिन ढाई साल से सदन के अंदर और बाहर कांग्रेस की आवाज बुलंद कर रहीं शेष चार महिला विधायकों की महत्वाकांक्षा दिल्ली तक जानती है. अब तो वे पांच हो गयी हैं. लोकशाही मुंड गिनकर ही चलती है. ऐसी स्थिति में उनका हक तो बनता है. कांग्रेस यहां चूकी तो 2024 में वह क्या जवाब देगी? उस समय महिला सशक्तीकरण और महिला भागीदारी की बातें कैसे कर पायेगी? यदि वह सोचती है कि जैसे अभी मांडर फतह कर लिया, वैसे ही रामगढ़ (ममता देवी), बड़कागांव (अंबा प्रसाद), झरिया (पूर्णिमा नीरज सिंह) और महगामा (दीपिका सिंह पांडेय) या ऐसा ही कोई अन्य क्षेत्र 2024 में भी उसके हवाले हो जाएगा, तो यह उसकी सोच की बलिहारी होगी. आखिर क्षेत्र के लोग भी तो चाहते हैं कि उनका एमएलए मंत्री बने, भले ही ललबतिया सुख पाते ही वह खुद को तुर्रम खां समझने लगता हो.

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