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मिशन 2024 को लेकर क्षेत्रीय दलों को साधने में जुटीं ममता बनर्जी

बड़ा सवाल: क्या क्षेत्रीय दलों के नेता ममता को बनायेंगे अपना सिरमौर

Gyan Ranjan

Ranchi: देश में पांच राज्यों में आसन्न विधानसभा चुनावों को लेकर गहमागहमी है. खासकर उत्तरप्रदेश पर सभी राजनीतिक दलों की निगाहें टिकी हुई हैं. भाजपा, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आप, बसपा इस जुगत में लग गयी हैं कि कैसे यूपी फतह की जाये. इसको लेकर समाजवादी पार्टी ने जहां कई राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने का निर्णय ले लिया है, भाजपा ने अपने सभी केंद्रीय नेताओं को यूपी के मैदान में उतार दिया है, कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को आगे कर यूपी फतह का रास्ता तैयार कर रही है;

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वहीं बंगाल की मुख्यमंत्री क्षेत्रीय दलों के सहारे मिशन 2024 की तैयारी में जुट गयी हैं. ममता कांग्रेस को माइनस कर क्षेत्रीय दलों के सहारे तीसरे मोर्चे की कवायद में जुट गयी हैं.

बीते सप्ताह नई दिल्ली में अपने भतीजे और सांसद अभिषेक बनर्जी के सरकारी आवास पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक ही सांस में दो बातें कही थीं. पहली, उन्होंने अपने इस दौरे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया था.

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दूसरी, वह 30 नवंबर को मुंबई जा रही हैं, जहां वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री व शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से मुलाकात करेंगी. इसके बाद साफ हो गया कि कांग्रेस को अलग रखकर ममता केवल क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करना चाहती हैं.

यही वजह है कि वह कांग्रेस की शक्ति और प्रभाव को खत्म कर खुद को उसके विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश में हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की. यह तीसरी जीत उनके लिए बेहद खास है. बंगाल में बीजेपी को करारी मात देने के बाद उनके हौसले और बुलंद कर दिए हैं.

ममता बनर्जी की पार्टी ने दिल्ली चलो का नारा दिया है और टीएमसी पूरे देश में पार्टी का विस्तार करने में जुट गई है. त्रिपुरा और गोवा के साथ ममता बनर्जी ने उत्तर प्रदेश पर फोकस करना शुरू कर दिया है.

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हालांकि यहां पर उनकी रणनीति गोवा और त्रिपुरा से अलग है. उन्होंने यहां अखिलेश यादव को मोरल सपॉर्ट के साथ अपनी पैठ बनानी शुरू की है.

गोवा और त्रिपुरा जैसे छोटे राज्यों में टीएमसी के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं. उत्तर प्रदेश में टीएमसी विधानसभा चुनाव में एंट्री लेने जा रही है.

पार्टी ने कांग्रेस के पूर्वांचल में बड़ा ब्राह्मण चेहरा ललितेशपति त्रिपाठी को पार्टी जॉइन कराया है. 100 साल से गांधी परिवार की करीबी ललितेश के टीएमसी में जाने से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है.

उत्तर प्रदेश में ममता बनर्जी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने की संभावना है. यूपी में उनका जनाधार नहीं है. वह जानती हैं कि अगर वह किसी प्रत्याशी को टिकट देती हैं तो उसका जीतना फिलहाल नामुमकिन है. इसलिए वह अखिलेश यादव को मोरल सपॉर्ट कर रही हैं.

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प्रशांत किशोर की रणनीति पर कदम बढ़ा रही हैं ममता बनर्जी

तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी अपने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की रणनीति पर कदम बढ़ा रही हैं. इसी के तहत एक तरफ जहां कांग्रेस में सेंधमारी तो दूसरी ओर कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों से लेकर सुब्रमण्यम स्वामी जैसे भाजपा नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिशें हो रही हैं. असम, त्रिपुरा, मेघालय, गोवा, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों के कांग्रेसी नेताओं को तृणमूल में शामिल कराया जा रहा है.

पिछले सप्ताह ही दिल्ली में ममता ने कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद, हरियाणा के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर, जनता दल (यूनाइटेड) के पूर्व महासचिव पवन वर्मा को तृणमूल का झंडा थमाया है.

साथ में गीतकार व पटकथा लेखक जावेद अख्तर और लेखक व स्तंभकार सुधींद्र कुलकर्णी से भी मुलाकात की. यह राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे बुद्धिजीवियों को अपने पाले में लाने की उनकी कोशिश है, जिन्हें नरेन्द्र मोदी विरोधी माना जाता है.

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क्या कांग्रेस को छोड़कर भाजपा विरोधी गठबंधन संभव है?

तीसरे मोर्चे की पटकथा वैसे तो पहले से लिखी जा रही थी लेकिन संसद के शीतकालीन सत्र के शुरू होने से पहले कांग्रेस की ओर से बुलाई गई विरोधी दलों की बैठक में भी तृणमूल के नहीं शामिल होने से इस बात को और हवा मिल रही है. उक्त बैठक से इतर ममता ने पार्टी सांसदों व नेताओं के साथ अपनी अलग रणनीति बनाई. सवाल यह उठता है कि क्या कांग्रेस को छोड़कर भाजपा विरोधी गठबंधन संभव है?

वजह, देश में लोकसभा की 120 से अधिक सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई है. ऐसा नहीं है कि ममता इस सच्चाई से अनजान हैं. यही वजह है कि कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि उनकी पार्टी को कमजोर कर दरअसल तृणमूल भाजपा के हाथ मजबूत कर रही हैं. दूसरी ओर तृणमूल नेताओं का तर्क कुछ और है.

उनका कहना है कि ममता अलग-अलग राज्यों में पार्टी के संगठन का विस्तार कर राष्ट्रीय राजनीति में खुद को भाजपा विरोधी चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती हैं.

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बंगाल में भाजपा को हराकर उन्होंने यह साबित किया है. इसीलिए एक तरफ विभिन्न राज्यों में कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को तोड़ा जा रहा है तो दूसरी ओर गैर-कांग्रेसी क्षेत्रीय दलों से ममता की बातचीत चल रही है. शरद पवार और उद्धव ठाकरे के साथ होने वाली बैठक उसी का हिस्सा है. इसके बाद ममता यूपी भी जाएंगी.

तृणमूल के अनुसार यदि ममता क्षेत्रीय दलों के बीच अपना नेतृत्व स्थापित कर विभिन्न राज्यों में भाजपा विरोधी मजबूत गठबंधन स्थापित कर लेती हैं तो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विरोधी गठबंधन का नेतृत्व करने का दावा खत्म हो जाएगा.

अगर स्थिति उपयुक्त रही तो कांग्रेस को बाहर से ममता के नेतृत्व वाले क्षेत्रीय गठबंधन का समर्थन करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. ममता कहती रही हैं कि उनकी पार्टी सभी राज्यों में चुनाव नहीं लड़ेगी

जहां जो क्षेत्रीय दल मजबूत होंगे, वहां उनका समर्थन किया जाएगा. यूपी में तृणमूल की इकाई खुल रही है. समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव अगर मदद चाहेंगे तो उनका समर्थन किया जाएगा.

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ममता 2012 से ही इसकी कोशिश कर रही हैं. जब प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस ने राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया था तो तृणमूल प्रमुख ने मुलायम सिंह यादव के साथ मिलकर अलग मोर्चा बनाकर अपना उम्मीदवार उतारने की कोशिश की थी, लेकिन ऐन वक्त पर मुलायम ने पलटी मार दी थी.

इसके बाद 2019 में भी 25 दलों के साथ कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में रैली कर मोदी विरोधियों को एकजुट करने की उन्होंने कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली.

अब एक बार फिर वह सक्रिय हैं और तीसरा मोर्चा बनाना चाहती हैं, लेकिन क्षेत्रीय क्षत्रपों में अधिकांश की पीएम बनने की चाहत है. ऐसे में ममता कितना सफल होंगी, यह वक्त बताएगा.

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समर्थन देकर मांगेंगी सपॉर्ट

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यूपी विधानसभा चुनाव 2022 तो सिर्फ बहाना है. ममता बनर्जी विधानसभा चुनाव के बहाने अपने लोकसभा चुनाव 2024 की पिच तैयार कर रही हैं. विधानसभा चुनाव में वह क्षेत्रीय दलों को समर्थन करेंगी और लोकसभा चुनाव में वह इन दलों से समर्थन मांगेंगी.

टीएमसी सूत्रों के अनुसार ममता बनर्जी की राष्ट्रीय राजनीति में आने की यह हसरत अचानक नहीं उमड़ी है. 2017 से ही इसका बैकग्राउंड बन रहा है. 2016 में 8 नवंबर को जब पीएम मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की, तो ठीक एक घंटे बाद सबसे पहले करारे विरोध के साथ पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी मैदान में उतर आई.

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नोटबंदी की घोषणा के 48 घंटे के बाद भी कांग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दल राजनीतिक नफा नुकसान के आकलन में जुटे थे, लेकिन ममता ने सारी हिचक छोड़कर इस घोषणा को नरेंद्र मोदी पर हमला करने का सबसे बड़ा हथियार बना लिया.

तभी से वह केंद्र सरकार की सबसे प्रखर आलोचकों में रहीं. लेकिन बाद में जब बीजेपी ने उनको उनके ही राज्य में घेरने का प्लान बनाया, तो ममता पहले अपने दुर्ग को बचाने में लग गईं.

लोकसभा में बीजेपी ममता का किला ढहाने में बहुत हद तक सफल भी रही, लेकिन विधानसभा चुनाव में टीएमसी फिर मजबूत होकर उभरी. इसके बाद ममता ने अपने सुस्त पड़े मिशन को असरदार ढंग से आगे बढ़ाया.

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Nayika

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