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जूतों की तरह पार्टी बदलने के खिलाफ थे महेंद्र सिंह

16 जनवरी, शहादत दिवस पर विशेष 

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  • लाल लाल लाल लाल सलाम 

FAISAL ANURAG/ PRAVIN KUMAR

बगोदर की धरती पर उमड़नेवाले हजारों मेहनतकशों का हुजूम की जुबां पर अपने जन नेता की शहादत को याद करने का आज दिन है. गगनभेदी नारे के साथ जन नेता महेंद्र सिंह की याद में हजारों लोग बगोदर में आज के दिन हर साल में जमा होते हैं.

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मेहनतकशों और झारखंडी संस्कृति को बुलंद स्वर देने वाले महेंद्र सिंह राजनैतिक नैतिकता को स्थापित करनेवाले जन नेता थे, जिनकी पंद्रह साल पहले हत्या कर दी गयी. महेंद्र सिंह को मारी गयी गोलियां  झारखंडी अस्मिता पर प्रहार थीं. तंग-ओ-तबाह जनसमुदाय की आकांक्षाओं और उम्मीदों पर हत्यारों ने गोलियां बरसायी थी. हत्यरों और उनके संरक्षकों ने स्वतंत्रता और जुल्म के खिलाफ उठनेवाली आवाज को खत्म करने का प्रयास किया था.

महेंद्र सिंह मरने के बाद अपने जीवनकाल से भी ज्यादा प्रासंगिक हो गये हैं. हर तरह के शोषण के खिलाफ हो रहे जनांदोलन के प्रेरणा श्रोत बन गये हैं. साथ ही खेत-खलिहानों के साथ फैक्टिरियों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए उनके संदेश अब भी गूंज रहे हैं. यही कारण है कि महेंद्र सिंह आजादी के बाद के शहीदों में अग्रणी हैं. राजनीतिक मूल्यों के क्षरण के दौर में महेंद्र सिंह ने जो उम्मीदों का चिराग जलाया था वह और भी ज्यादा प्रज्चलित हो रहा है. और नई दुनिया का सपना देखनेवालों को प्रेरित कर रहा है.

महेंद्र सिंह ने झारखंड की ठोस हकीकत में मक्र्सवाद लेनिनवाद का उदाहरण प्रस्तुत किया जो एक मुकम्मल बदलाव की दिशा में वर्गीय चेतना को और ज्यादा प्रखर करता है. झारखंड की क्षेत्रीय वास्तविकताओं की  धरातल पर उन्होंने न केवल समाजी इंसाफ का इंकलाबी विचार स्पष्ट किया, बल्कि सामाजिक परिप्रेक्ष्य में वंचितों की नेतृत्वकारी भूमिका को स्थापित करने में अह्म योगदान दिया. विचारधारा के स्तर पर उन सामाजिक मान्यताओं को चुनौती दी जो अवैज्ञानिक थे और क्रांतिकारी बदलाव की पृष्ठभूमि बनाते हुए सामाजिक सुधार के आंदालनों को भी आगे बढ़ाने में भूमिका निभायी. संसदीय विधायी कार्यो में अपनी कुशलता और प्रखरता से लोगों को कायल तो किया ही, लेकिन मेहनतकश तबकों के सवालों को कभी गौण नहीं होने दिया.

महेंद्र सिंह जब बोलते थे थे न केवल एक प्रवाहमान और रचनात्मक भाषा में झारखंडी संदर्भ की नयी परिभाषा गढ़ते थे, बल्कि वैश्विक बदलावों के संदर्भ में झारखंडी चेतना और संस्कृति की नयी व्याख्या भी प्रसतुत करते थे. उन्होंने झारखंडी जनसमाज की मन की विशेषता को रेखांकित करते हुए सामाजिक संयोजन करने के नये-नये प्रयोगों के माध्यम से नयी अवधारणाओं का सृजन किया. एके राय के बाद वे वाम राजनीति के अकेले जननेता हैं, जिनका असर झारखंड में गहरायी से हुआ और देशभर में उन्हें मान्यता मिली. बिरसा मुंडा ने कहा था उलगुलान का अंत नहीं हैं. बिरसा मुंडा ने उलगुलान के जिस राजनीतिक फलसफे का सृजन किया था, महेंद्र सिंह ने 21वीं सदी में उसे  नई ऊर्जा प्रदान की. महेंद्र सिंह गहरे रूप में संताल हुल और उलगुलान से प्रभावित थे. उनके भाषणों और कविताओं में उलगुलानों की चेतना का मजबूत स्वर उभरता है. महेंद्र सिंह ने पूरे झारखंड के सांस्कृतिक आंदोलन को भी विस्तारित करने का प्रयास किया.

महेद्र सिंह भोषणों में राजनीतिक शब्दावलियों का इस्तेमाल नहीं करते थे. वे आमजीवन से प्रतीक उठा कर अपनी बात जिस सहज अंदाज में दृढता से कहते थे, लोग उसे सहजता से समझ लेते थे. उनकी यह विशेषता उन्हें अपने समकालीनों में विशिष्ट बनाती है. महेंद्र सिंह ने आंदोलनों की लहर बोकारों और बगोदर से शुरू की   और फिर झारखंड के अन्य आंदोलनों में शामिल हो कर उसे नया आयाम देने का प्रयास किया. महेंद्र सिंह उन नेताओं में थे जो नेतृत्व लडनेवालों के बीच से उभरे इस विचार को गहराई से मानते थे और इस पर अमल भी करते थे. महेंद्र सिंह ने बगोदर में एक ओर जहां संसदीय लड़ाइय़ों को नयी जमीन दी, वहीं उन्होने सामाजिक और आर्थिक सवालों से गांवो को एकाकार करने में अपने विचारों को नयी ऊर्जा दी. झारखंड राज्य के निर्माण के पहले की वो लडाइयां, जिसने महेंद्र सिंह को नयी पहचान दी, अक्सर चर्चा में नहीं रही हैं. महेंद्र सिंह ने दलितो, आदिवासियों, पिछडो और अल्पसंख्यकों के सवालों को व्यापक आंदोलनों का हिस्सा बनाने में भूमिका का निर्वाह किया. साथ ही उन्होंने मार्क्सवादी आंदोलनों को भी उन विशेषताओं से नयी समझ और रणनीति बनाने का आधार प्रदान किया. महेंद्र सिंह ने वर्ग चेतना को झारखंडी विशेषताओं के संदर्भ में जुंबिश से भर दिया.

शिबू सारेने ने टुंडी के आंदोलन में जिन सवालों को उठाया था और बाद में धनकटनी के माध्यम से जिस विचार चेतना को स्वर दिया था, महेंद्र सिंह ने उस कड़ी को अपनी विशोषताओं के साथ विस्तार दिया. यही कारण है कि महेंद्र सिंह जिन आंदोलनों के हिस्सेदार रहे, उनमें झारखंडी इतिहासबोध की दस्तक महसूस होती है. झारखंड के लागों में उसे व्यापक स्वीकृति मिली. महेंद्र सिंह ने जिन सवालों को भी उठाया, उसे अंत तक पहुंचाया और उसे विचारधारात्मक संघर्ष का भी हिस्सा बना दिया. झारखंड राज्य बनने के बाद महेंद्र सिंह ने न केवल आर्थिक नीतियों के खिलाफ स्वर बुलंद किया, बल्कि राज्य द्वारा किये गये उत्पीड़न के खिलाफ पुरजोर संघर्ष किया. मानवाधिकार के सवाल पर उनकी मुखरता किसी भी नेता की तुलना में उन्हें धारदार बनाती है. महेंद्र सिंह ने झारखंड विधानसभा के अंदर और बाहर के संघर्षो का समन्वय प्रस्तुत किया. अपनी पार्टी के इकलौते विधायक होने के बावजूद वास्तविक विपक्ष की तरह सरजोम की तरह तन कर खडे रहे. विनाशकारी विकास के खिलाफ व्यपाक जनमोरचा बनाने की उनकी पहल के कारण झारखंड में अनेक जनसमूह एक मंच पर आये. विकास की पूरी अवधारणा को चुनौती पेश करते हुए झारखंडी विकास की देशज वैज्ञानिक अवधारणा के विमर्श को प्राधिकार देने में महती भूमिका निभायी. महेंद्र सिंह मानते थे कि बदलाव की लडाइयों बिना आमजन के विभिनन तबकों के व्यापक गठबंधन के संभव नहीं है. संसदीय राजनीति में भी वे विभिन्न जनसमूहों के व्यापक गठबंधन को ही तरजीह देते थे. महेंद्र सिंह इसलिए कहा करते थे  कि वे जूतों की तरह पार्टी और विचार बदलने के खिलाफ हैं. मृत्यु के पहले बगोदर में एक जनसभा में उन्होने कहा था- संभव है कि वे जनता के सभी सवालों को हल नहीं कर सकें. लेकिन वे इस बात की गारंटी देते हैं कि वे जनता की लडाइयों के हिस्सेदार अंतिम क्षण तक रहेंगे. और किसी भी सूरत में विचार और पार्टी जूतो की तरह नहीं बदलेंगे. उसी भाषण में महेंद्र सिंह ने कहा था कि वे और उनकी पार्टी का संबंध आमजन से केवल वोट लेने देने का नहीं हैं, बल्कि सुख-दुख का है और इसे कोई भी खत्म नहीं कर सकता.

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