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होम्योपैथी के युगपुरुष थे महर्षि परेशनाथ, लोगों का मुफ्त इलाज करते थे : गाज़ी रहमतुल्लाह रहमत

महर्षि डॉ परेश नाथ बंदोपाध्याय की जयंती पर विशेष

Anwar Hussain

Jamtara : मिहिजाम होमियोपैथी व लेक्सिन नामक दवा की पहचान दिलानेवाले महान पुरुष महर्षि डॉ परेश नाथ बंद्योपाध्याय की 11 जनवरी को पुण्य तिथि है. महर्षि डॉ परेश नाथ बंदोपाध्याय ने जामताड़ा जिले के मिहिजाम शहर की पहचान सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी दिलायी है. ये बातें ‘द सोसाइटी ऑफ़ होम्योपैथ्स’ के कन्वेनर गाज़ी रहमतुल्लाह रहमत ने कही. उन्होंने कहा कि नई चिकित्सकीय प्रणाली को एक अलग पहचान देने वाले महर्षि परेश नाथ बनर्जी मिहिजाम क्षेत्र में निःशुल्क सेवा प्रदान किया करते थे.

उनका जन्म सन् 1889 में हुआ था. मात्र 29 वर्ष की उम्र में उन्होंने जामताड़ा जिला के मिहिजाम शहर में एक चैरिटेबल डिस्पेंसरी की स्थापना 1918 ईस्वी में की और जीवन पर्यंत लोगों को निःशुल्क सेवा प्रदान करते रहे. परेश नाथ बनर्जी अपने चाचा ईश्वर चंद्र विद्यासागर जी से प्रेरणा पाकर होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति को आगे बढ़ाने में दिलो जान से लग गए.

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घटना कुछ इस तरह है कि भारतीय होम्योपैथी के जनक श्री राजेंद्र लाल दत्ता जी ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर का इलाज सन 1863 ईस्वी में होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति से किया था. जिससे उनकी किसी खास बीमारी का उपचार सहज ढंग से हो गया था. ईश्वर चंद्र विद्यासागर को कष्ट से मुक्ति मिल गई थी. तब से उन्होंने यह ठान लिया था कि होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति को जन-जन तक पहुंचाना है. इसी क्रम में उन्होंने श्री परेश नाथ बनर्जी को प्रोत्साहित किया व खुद भी ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने करमाटांड़ स्थित अपने आश्रम में एक लाइब्रेरी और एक चिकित्सालय की स्थापना की.

सन 1920 ईस्वी में मिहिजाम इंस्टीट्यूट ऑफ़ होम्योपैथी की स्थापना की गई. जिसमें वैज्ञानिक ढंग से होम्योपैथी की शिक्षा दी जाने लगी.
गाजी रहमत ने कहा कि सन 1920 से 1930 के बीच 700 से लेकर 1000 तक प्रतिदिन मरीजों के देखे जाने का रिकॉर्ड सामने आया है.
श्री परेश नाथ बनर्जी से इलाज कराने के लिए दूर-दराज से लोग आया करते थे. हमारे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, सर जगदीश चंद्र बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, देशबंधु चितरंजन दास, शहीद जतिंद्रनाथ

मुखर्जी, सर आशुतोष मुखर्जी, नेपाल के महाराजा एवं अन्य प्रसिद्ध हस्तियों ने महर्षि परेश नाथ बनर्जी से अपना इलाज कराया था. देश के कोने-कोने तक होम्योपैथिक पहचान दिलाने वाले लेक्सिन दवाई के जन्मदाता महर्षि परेश नाथ बनर्जी निःस्वार्थ भाव से चिकित्सा किया करते थे. इन्होंने एशिया एवं यूरोप के कई मरीजों को दवाइयां दी थी.

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गाजी रहमत ने कहा कि आधुनिक युग में लोग इस तरह अंग्रेजी दवाइयों के पीछे दीवाना हो बैठे हैं कि होम्योपैथी के युगपुरुष महर्षि परेश नाथ बनर्जी तक को भुला बैठे हैं. 11 जनवरी 1971 ईस्वी को महर्षि परेश नाथ बनर्जी का निधन हुआ. पहले उनकी जन्मतिथि एवं पुण्यतिथि पर चिकित्सकीय शिविर लगा करता था जिसमें गरीब, निर्धन, असहाय एवम अन्य लोगों के लिए निःशुल्क चिकित्सा व्यवस्था हुआ करती थी.

लेकिन अब चिकित्सकीय शिविर लगाना तो दूर उनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि तक लोगों को मालूम नहीं.
उन्होंने कहा कि इस इलाके में जब किसी को सांप काटता था तो लोग दौड़कर मिहिजाम पहुंचते थे और श्री परेश नाथ बनर्जी से लेक्सीन दवा मरीज को दिला कर ठीक करवा कर आते थे. यह परंपरा अनवरत चलती रही लेकिन आज उसी लेक्सीन दवा के जन्मदाता को लोग भूलते जा रहे हैं.

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