Opinion

आधा माघे, कम्बल कांधे

Baijnath Mishra

गुरुवार, 11 फरवरी को माघी अमावस्या है. यानी आधा माघ खत्म. पुरानी कहावत है, माघ का जाड़ा बाघ. इस बाघ की आधी ताकत खत्म हो चुकी है. मौसम वैज्ञानिक बता रहे हैं कि दो-चार दिन में ठंड से राहत मिलने लगेगी. इन वैज्ञानिकों के पास तरह-तरह के यंत्र हैं, उपकरण हैं.

इनके माध्यम से ये मौसम का हाल बताते हैं. लेकिन हमारे ग्रामीण भारत में ‘आधा माघे, कम्बल कांधे’ की कहावत प्रचलित है. यानी आधा माघ बीतते ही कम्बल कंधे पर आ जाता है. अर्थात ठंड कम होने लगती है.

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साधनविहीन लोग ठंड के जाने की उम्मीद तो एक दिन माघ बीतते ही बांध लेते हैं. वे कहने लगते हैं- ‘गइल माघ दिन उनतीस बाकी.’ माघ चला गया, अब केवल उनतीस दिन ही शेष हैं. कुछ लोग चाहें तो इस बात पर ‘दिल बहलाने के लिए गालिब ये खयाल अच्छा है’ से भी तंज कस सकते हैं.

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लेकिन शिशिर ऋतु की ठंड कितनी मारक, पीड़ादायी होती है, इसे जयशंकर प्रसाद ने भी देखा, समझा था. तभी तो उन्होंने लिखा, ‘शिशिर कणों से लदी हुई कमली के भीगे हैं सब तार, चलता है पश्चिम का मारुत लेकर शीतलता का भार.’ यह शिशिर पौष मास में भी लगी रहती है. तभी तो मुंशी प्रेमचंद को ‘पूस की एक रात’ जैसी कहानी लिखने के लिए उत्प्रेरित करती है.

मैथिली शरण गुप्त के साकेत की उर्मिला तो आह्वान करते हुए कहती है- शिशिर न फिर गिरि वन में, जितना मांगो पतझड़ दूंगी मैं अपने इस निज नंदन में, बीर जमा दे नयननीर, यदि तू मानस भाजन में.’ यानी शिशिर में पानी जमा देने वाली ठंड पड़ती है. माघ की पूर्णिमा को नदियों के किनारे आस्था का जनसैलाब उमड़ता है और नदियों में डुबकी लगा कर ठंड की विदाई का आह्वान किया जाता है.

और इस साल तो कुंभ भी है. इसलिए माघ शुरू होते ही यह आस बलवती हो जाती है कि अब चाहे ठंड जितनी पड़े, उसके जाने का समय आ गया है, क्योंकि माघ अपने साथ वसंत लेकर आता है. इससे मानव जीवन और समस्त प्रकृति में नई ऊर्जा, स्फूर्ति का संचार होता है. माघ शुक्ल पंचमी से वसंत शुरू हो रहा है. उस दिन फरवरी की सोलह तारीख है.

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उसी दिन ‘वीणा वादिनि वर दे’ की आराधना होगी तो यह बताया भी जायेगा कि सखि, वसंत आया ! वसंत सभी ऋतुओं से अधिक समय तक रहता है. कृष्ण स्वयं कहते हैं कि ‘ऋतुणां वसंतः अहम्.’ मैं ऋतुओं में वसंत हूं. लीलाधारी कृष्ण अपनी ऋतु में सतायेंगे नहीं, गुदगुदायेंगे, हलरायेंगे, दुलरायेंगे और किंचित बौरायेंगे भी. तभी तो पद्माकर बनन में बागन में बगरयो बसंत है का गान करते हैं.

इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ठंड एकबारगी, अचानक चली जायेगी. लेकिन जायेगी, धीरे-धीरे जायेगी. इस वसंत ऋतु में भोलेनाथ की मैरेज एनिवरसरी होती है. बाराती सजते-धजते हैं. भोलेनाथ को नहाना-धोना पड़ता है. इसलिए शिवरात्रि के आसपास बारिश होती है.

इसे ‘शिव नहवावहनि’ कहते हैं. यानी जाती हुई ठंड ठिठक जाती है. अचानक गर्मी पड़ने लगे तो शिव के विवाह का उल्लास कम पड़ जायेगा. ऐसा माना जाता है कि विवाहोपरांत शिव ने अपने गणों की मुराद पूरी करने के लिए पारितोषिक वर्षा का बारह दिनों का मुहूर्त तय कर दिया था. यानी होली से पूर्व भी वर्षा हो सकती है, ताकि उमंग की खुमारी उतरे नहीं, बनी रहे.

इसी के बाद होली आती है और होली की बहारें देखनी हों तो नजीर बनारसी से पूछिए! वह कहते हैं- ‘सीने से रंग ढरकते हों तो देख बहारें होली की.’ इसके बाद वासंतिक नवरात्र और रामनवमी. ब्रहम और शक्ति की पूजा आराधना के बाद ही वसंत जाता है.

इसके बाद ठंड के पूरी तरह जाने के बाद ही वसंत जाता है. उसके बाद ठंड के पूरी तरह जाने की देसी भविष्यवाणी की जाती है. लेकिन इतना तय है कि ठंड अब ज्यादा नहीं सतायेगी. सतायेगी क्या, मजा देगी. प्रकृति खिल जायेगी, खुल जायेगी, मनोरम बन जायेगी.

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