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‘म’ से ‘मालिक’! क्यों नहीं पाकुड़ नाम के पहले अक्षर ‘प’ को हटा कर ‘म’ रख देते

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Pakur : कितना अजीब लगेगा न! लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि ऐसा संभव है. हाल के दिनों में ही पाकुड़ डेटलाइन से एक अखबार में एक लेख छपा था. उसमें ‘म’ से किसी ‘मैडम माया’ का जिक्र था. पाकुड़ जिले में ‘म’ से खनन ‘माफियागिरी’ की भी खबरें गाहे-बहागे अखबारों में छप रही हैं. एक पार्टी ने अपने पोस्टर में ‘म’ से ‘मालिश’ का जिक्र किया है. इसी ‘म’ से ‘मुखिया’ का भी जिक्र पोस्टरों में हुआ है. हाल में ही उभरी एक भारी-भरकम शख्सियत का नाम भी ‘म’ से ही बताया जाता है. कहा जा रहा है कि ‘म’ से ‘माल’ (पैसे) का खेल जिले में खूब हो रहा है. ‘म’ से मनरेगा की बात हो या ‘म’ से माफियागिरी की. ‘म’ से मालिक के जो तेवर हैं, वो जिले में चर्चा का विषय है. गौर करनेवाली बात है कि ये सारे शब्द ‘म’ अक्षर से ही शुरू हो रहे हैं. ऐसे में आशंका जतायी जा रही है कि कहीं कोई पार्टी इस बार होनेवाली पोस्टरबाजी में पाकुड़ का नाम ‘म’ से माकुड़ करने की मांग न कर बैठे.

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कप्तान परेशान जवाब में, चहेते विभाग ‘मौज’ में

अंदरखाने की खबर है कि वरीयता में जिले के दूसरे नंबर के अधिकारी निहायत ही परेशान हैं. उनके करीबियों का कहना है कि वह अपना काम करने की खूब कोशिश करते हैं, लेकिन उन्हें फुर्सत ही नहीं है. आजकल वह ड्यूटी से ज्यादा ड्यूटी में किये गये अपने कामों के सवाल का जवाब तैयार करने में व्यस्त रहते हैं. काबिल अफसर होने के बावजूद अपनी काबलियत दिखाने का उन्हें मौका नहीं मिल रहा. जिले में तीसरे नंबर के एक अधिकारी, जिनका अब वहां से तबादला हो चुका है, वह अपनी आपबीती बताते-बताते काफी भावुक हो जाते हैं. कहते हैं- कसम से जान छूटी. पूरे जिले के अफसरों को रात में एफआईआर और आरोप पत्र (प्रपत्र क) गठन होने के भयावह सपने आते हैं. दहशत ऐसी कि मानो पाकुड़ से तबादला कश्मीर भी हो जाये, तो मना नहीं करेंगे. ऐसा नहीं है कि सभी के साथ ऐसा हो रहा है. कुछ चहेते भी हैं, जो ‘मौज’ में हैं. लाख फजीहत होने के बावजूद मालिक का दामन किसी भी हाल में छोड़ना नहीं चाहते.

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भविष्य में क्या रखा है, यहां भूतकाल पर फोकस रहना है

ऐसा नहीं है कि सिर्फ यहां मौजूद अफसरों की ही नींद हराम है. पाकुड़ की तपिश से राजधानी रांची के भी अफसर गर्म हैं. कइयों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. क्या छोटे और क्या बड़े, जिन्होंने दो महीने भी पाकुड़ में काम किया है, सबके जेहन में पाकुड़ का डर समाया हुआ है. वजह यह कि पाकुड़ में पिछले कामों की समीक्षा काफी जोर-शोर से हो रही है. तालाब 2005 का हो या 2003 का, सबकी गहराई मापी जा रही है. कुछ बहुत बड़े अफसरों ने तो डांट भी लगायी है. फिर भी कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है. खोजी अभियान जारी है.

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