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लोस चुनाव : दंभ क्लीन स्वीप का और कुंभकरण की नींद में सोयी है बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी की समिति

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Akshay Kumar Jha

Ranchi : 2014 के लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में भी भले ही बीजेपी का जादू सिर चढ़कर बोला हो, लेकिन इस बात की 2019 में कोई गांरटी नहीं है कि मोदी का जादू वैसे ही सिर चढ़कर बोले. लिहाजा बीजेपी के दिल्ली राष्ट्रीय कार्यालय से हर प्रदेश कार्यालय को एक मैसेज बार-बार दिया जा रहा है. संदेश यह है कि जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को पार्टी एक्टिव करे. फिलवक्त बीजेपी को लेकर झारखंड का जो सीन है, वह सीन बी ग्रेड का ही माना जा रहा है. झारखंड से चुने सांसद दिल्ली दरबार में इस बात की चर्चा दबी जुबान में कर चुके हैं कि कार्यकार्ताओं का मनोबल पिछली बार जैसा नहीं है. सरकार और कार्यकर्ताओं के बीच एक गैप है, जिसे पाटने की भरसक कोशिश पार्टी को करनी चाहिए, वरना नतीजा उल्टा हो सकता है. हर चुनाव से पहले पार्टी बूथ लेवल पर कार्यकर्ताओं को मजबूत करती है. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है. लेकिन, जहां तक बीजेपी की बात है, पार्टी की कार्यकारिणी समिति कुंभकरण की नींद सो रही है. उन्हें न तो फील्ड में एक्टिव देखा जा रहा है और न ही मीडिया में.

तीनों महामंत्रियों का कार्यकर्ताओं के साथ कोई कनेक्शन नहीं

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पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी के तीन महामंत्री हैं. तीनों महामंत्री को इनएक्टिव मोड में देखा जा रहा है. ये तीनों हैं- चतरा से सांसद सुनील सिंह, राजमहल से विधायक अनंत ओझा और मुख्यालय प्रभारी दीपक प्रकाश. विधायक अनंत ओझा की बात करें, तो वह अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं. लेकिन, पार्टी की तरफ से जिस तरह की जिम्मेदारी उन्हें बूथलेवल कमिटी के लिए काम करने के लिए दी गयी है, उसमें वह कहीं खरा नहीं उतर रहे हैं. चतरा से सांसद सुनील सिंह को इस बार चतरा से टिकट मिल जाये, इस बात पर ही ग्रहण लगा हुआ है. ऐसे में यह कहना कि सुनील सिंह को पार्टी की बूथ लेवल कमिटी के लिए काम करते हुए देखा जा रहा है, बेईमानी है. वहीं, मुख्यालय प्रभारी दीपक प्रकाश को रांची प्रदेश कार्यालय में कुछ आयोजनों में भले ही देखा जाये, लेकिन पार्टी के विश्वस्त सूत्रों की मानें तो खानापूर्ति होने के सिवाय कुछ भी नहीं हो रहा है.

कहां हैं प्रदेश कार्यकारिणी के प्रदेश मंत्री और सदस्य?

प्रदेश कार्यालय के सेकेंड लेवल अधिकारियों की बात की जाये, तो वह प्रदेश मंत्री ही होते हैं. प्रदेश मंत्री के चार चेहरे बीजेपी की तरफ से दिखाये गये हैं, लेकिन सच में ये चेहरे सिर्फ दिखाने के लिए ही हैं. सुबोध सिंह गुड्डू, भुवनेश्नर साहू, नूतन तिवारी और हटिया विधायक नवीन जायसवाल. इन चारों में अगर कोई पास मार्क्स लाने भर काम कर रहा है, तो उसमें सुबोध सिंह गुड्डू का नाम आ सकता है. इनके अलावा मूल्यांकन किया जाये, तो भुवनेश्वर साहू और नूतन तिवारी के काम के मामले में जमानत जब्त होने की नौबत है. जेवीएम से बीजेपी में कूदकर आये हटिया विधायक नवीन जायसवाल को पार्टी ने एक बड़ी जिम्मेदारी दी. लेकिन, उस जिम्मेदारी पर विधायक जी कतई खरे नहीं उतर रहे हैं. प्रदेश स्तर के बूथ लेवल पर जिस गंभीरता से काम करना चाहिए, वह नहीं हो रहा है. वहीं, प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्यों की बात की जाये, तो कृपा शंकर सिंह और पुनीता राय ऐसे नाम हैं, जो गहरी नींद में हैं. न ही इन्हें कहीं देखा जा रहा है और न ही बीजेपी की रणनीति के तहत ये लोग सक्रिय हैं. इनकी सक्रियता पर यूं ही सवाल नहीं उठ रहे हैं, बल्कि पार्टी लेवल के वैसे लोग, जिन्हें सच में पार्टी की जीत की चिंता है, वे इनकी निष्क्रियता को लेकर सवाल खड़े रहे हैं.

कोई प्रेशर ही नहीं है

झारखंड की सबसे बड़ी पार्टी, जो फिलवक्त सत्ता का सुख भोग रही है, उसके बारे में यही कहा जा रहा है कि पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी के आला अधिकारियों पर कोई प्रेशर ही नहीं है. काफी ही बारिकी से किये गये एक रिसर्च में इस बात का खुलासा होता है कि पार्टी पर जीवन न्योछावर करनेवाले कार्यकर्ताओं को पार्टी ने हाशिये पर भेजने का काम किया और पार्टी को सिर्फ आर्थिक रूप से मदद करनेवालों को सिर पर बैठाया, उन्हें पद दिया. उनका पार्टी में मान-सम्मान काफी ज्यादा है. ऐसे में कैसे ऊपरी लेवल पर पार्टी प्रेशर जेनरेट कर सकती है. वहीं, जिन कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के लिए अपना सबकुछ न्योछावर कर दिया, उनकी पार्टी में फिलहाल कोई पूछ ही नहीं है. ऐसे में वे चाहकर भी कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं, सिवाय दबी जुबान में अपनी बात रखने की.

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