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जो साहब रख रहे सब पर नजर, उन पर हर वक्त है अपने हमसफर की नजर

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Akshay Kumar Jha

Ranchi: कहते हैं कि हर मर्द की तरक्की के पीछे एक महिला का हाथ होता है. आज तक कई मामले भी देखने मिले जो इस कहावत को साबित करते हैं. एक और ताजा मामला सामने आया है. लेकिन फर्क बस इतना है कि कामयाबी मिलने के बाद इन साहब को महिला मिली. मतलब पहले साहब बने बाद में शादी हुई. अब कामयाबी को कायम रखने के लिए हर वक्त साहब अपनी पत्नी को अपने साथ रखते हैं. जाहिर सी बात है, हर वक्त साथ रहने से एक-दूसरे का ख्याल रखने में दोनों को काफी आसानी होती है. साहब को कब और क्या चाहिए इसके लिए मैडम को जरा भी चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ती है. क्योंकि हर वक्त साथ जो रहती हैं. दरअसल साहब के कंधों पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है. बोझ इतना मानो पूरे सूबे में हो रही गतिविधि पर इन्हें नजर रखनी हो. इस प्रेशर में अब अगर हमसफर का साथ हर पल मिले तो भला हर्ज किसी को क्यों हो.

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भाभी के सामने डांट पड़े किसे अच्छा लगता है

कहानी के मुताबिक साहब एक बड़े अधिकारी हैं. उनके नीचे काफी अधिकारी और कर्मी भी हैं. अब सभी जूनियर अधिकारी हर वक्त अपना बेस्ट परफॉर्मेंस तो दे नहीं सकते. चुनाव का समय है, गलती हो ही जाती है. बोझ के तले दबे और 24 घंटे किसी की नजरों के सामने रहने के बाद थोड़ी झल्लाहट होनी लाजिमी है. ऐसे में अब बेचारे जूनियर अधिकारियों की क्या गलती है. उनकी भाभी के सामने फजीहत हो, ये तो जायज नहीं. लेकिन इस पहलू पर दूसरा नजरिया भी है. हो सकता है कि भाभी की वजह से जूनियरों को डांट कम पड़ती हो. ऐसे में अपने-अपने तरीके का फायदा और नुकसान दोनों है. नुकसान वाले फायदे की बात सोच कर विरोध नहीं करते और फायदे वाले भला क्यों शिकायत करें.

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हिम्मत की देनी होगी दाद

कइयों से इस मामले बात की. सच मानिए सभी ने कहा कि “भई… हमसे तो न हो पाएगा.” एक तो काम का प्रेशर और उसपर से मैडम का हर वक्त साथ होना सोच कर डर लग जाता है. लेकिन इन साहब की इस मामले में दाद देनी चाहिए. कहने वालों में कुछ ने तो यह भी कहा कि दो दिन लगातार छुट्टी हो और घर पर रहना पड़ जाए. इतने में मन भरा-भरा सा लगता है. लगता है कि कब ऑफिस खुले और कब मैडम की रडार से दूर हो जाऊं. लेकिन इन्हें देख कर भाई मिसाल-मिसाल सा लगता है. घर में भी मैडम, ऑफिस में भी मैडम, आते-जाते मैडम, उठते-बैठते मैडम. ऐसा लगता है जैसे जिंदगी ही मैडममय हो गयी हो. एक चश्मदीद ने कहा कि हो सकता है कि नजरों के सामने रखने से काम करने के लिए प्रेरणा मिलती हो. काम करते-करते अपने कोड वर्ड में बतिया भी लेते हैं. लाख समझने की कोशिश की लेकिन मजाल है कि पल्ले पड़े.

खबर लिखते और इस मामले पर जानकारी इकट्ठा करते वक्त इस बात से सोच कर कई बार घबराहट होने लगती थी कि आखिर साहब क्या खाकर इतनी हिम्मत का काम करते हैं. लेकिन सवाल है कि खाने की मेन्यू तो हर बार मैडम ही तय करती हैं.

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