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लोकसभा चुनाव : अतिआत्मविश्वास हो सकता है कांग्रेस के लिए घातक, भितरघात से बढ़ेगी पार्टी की मुश्किलें

राज्य की 7 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस पार्टी अपने सभी उम्मीदवारों की जीत सुरक्षित मान रही है...

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Nitesh Ojha

Ranchi : राज्य की 7 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस पार्टी अपने सभी उम्मीदवारों की जीत सुरक्षित मान रही है. उम्मीदवारों के चयन में पार्टी ने एक नये फार्मूले के तहत नये चेहरों का चयन किया है. ऐसा माना जा रहा है कि कोलेबिरा उपचुनाव में इसी फार्मूले से मिली जीत और महागठबंधन के कोर वोट बैंक का पार्टी के पक्ष में आने से पार्टी उम्मीदवार जीत दर्ज कर सकते हैं. सिंहभूम से गीता कोड़ा, धनबाद से कीर्ति आाजाद, चतरा से मनोज यादव और हजारीबाग से गोपाल साहू को इसी फार्मूले के तहत टिकट दिया गया है.

अपने इस अति आत्मविश्वास की वजह से प्रदेश नेतृत्व पार्टी के उन भितरघातियों से भी सतर्क नहीं दिख रही, जो टिकट की आस में थे. लेकिन उनका टिकट काट दिया गया. राजनीतिक विश्लेषकों की माने, तो फार्मूले के तहत चुने गये चेहरे और भितरघात करने वाले की रणनीति पार्टी उम्मीदवारों की जीत के बीच एक बड़ा रोड़ा बन सकती है.

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 टिकट नहीं मिलने की वजह प्रदेश अध्यक्ष

मालूम हो कि लोकसभा चुनाव में सात सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर कई नेताओं ने टिकट की आस में कई दिनों तक दिल्ली में डेरा डाला था. इसमें केवल रांची और गोड्डा ही केवल ऐसी दो सीटें थी, जिनपर उम्मीदवार बनने के दौड़ में क्रमशः सुबोधकांत सहाय, फुरकान अंसारी एक मात्र दावेदार थे. इसमें रांची तो कांग्रेस के पालेेंेही रही, जबकि महागठबंधन के समझौते के तहत गोड़्डा सीट जेवीएम के हिस्से में आ गयी. अन्य सीटों (लोहरदगा, खूंटी, हजारीबाग, चतरा, धनबाद) में एक से अधिक उम्मीदवार टिकट की रेस में थे.

इसमें लोहरदगा से रामेश्वर उरांव और अरुण उरांव, खूंटी में प्रदीप बालमुचु, दयामनी बारला, हजारीबाग में प्रदीप प्रसाद, योगेंद्र साहू और उनके परिजन, धनबाद में ददई दुबे, राजेंद्र सिंह का नाम था. इन नाराज नेताओं में ददई दुबे, फुरकान अंसारी ने तो बाद में  टिकट नहीं मिलने की वजह प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार को ही बता दिया.

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सुखदेव पर भारी पड़ सकता है कार्यकर्ताओं की निष्ठा का डगमगाना

लोहरदगा संसदीय सीट को देखें, तो टिकट की आस में सबसे आगे पूर्व आईपीएस अधिकारी और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के चेयरमैन रहे रामेश्वर उरांव थे. लंबे समय के बाद 2004 में उन्होंने ही यहां पर पार्टी को जीत दिलायी थी. हालांकि 2009 और 2014 में बीजेपी से चुनाव हार गए थे. फिर भी अपनी जरूरतों के हिसाब से लगातार क्षेत्र में घूमते रहे. वे कांग्रेस की अध्यक्षा रह चुकी सोनिया गांधी के भी काफी करीबी माने जाते हैं.

इस सीट पर पूर्व पुलिस अधिकारी अरुण उरांव भी टिकट के आस में थे. लेकिन एन वक्त पर आलाकमान ने इन दोनों को दरकिनार कर लोहरदगा से वर्तमान विधायक सुखदेव भगत को टिकट दे दिया. इस निर्णय से दोनों के समर्थकों में मायूसी भी छा गयी है. चुनाव के दौरान इन दोनों की नाराजगी से पार्टी के भरोसेमंद कार्यकर्ता में काफी नाराजगी है. ऐसे में उनके निष्ठा का डगमगाना वर्तमान उम्मीदवार (सुखदेव भगत) पर भारी पड़ सकता है.

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फुरकान जानते हैं कि केवल वही एक अल्पसंख्यक नेता नहीं हैंं

पिछले तीन माह से गोड्डा सीट की स्थिति काफी दिलचस्प देखी गयी है. इस सीट के जेवीएम के पाले में जाने से टिकट की आस लगाये पूर्व सांसद फुरकान अंसारी और उनके बेटे एवं वर्तमान विधायक इरफान अंसारी ने तो अल्पसंख्यकों के बहाने डॉ अजय कुमार पर जेवीएम के प्रति सॉफ्ट रवैया रखने का आरोप लगा दिया.

इनके  द्वारा आग उगलते के बाद महागठबंधन के नेताओं ने साझा तौर पर कहा कि 2020 के राज्य सभा चुनाव में सभी दल मिलकर एक अल्पसंख्यक को  उच्च सदन भेजेंगे. फुरकान अंसारी जानते है कि महागठबंधन में केवल वहीं एक अल्पसंख्यक नेता नहीं है. ऐसे में जेवीएम उम्मीदवार प्रदीप यादव को लेकर दोनो का समर्थन कम ही दिखता है.

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गोपाल साहू पर भारी पड़ रहा वैश्य समाज का विरोध

हजारीबाग सीट पर टिकट की रेस में पूर्व मंत्री योगेंद्र साव, उनकी बेटी अंबा प्रसाद और एक अन्य नेता प्रदीप प्रसाद भी थे. लेकिन इनके जगह गोपाल साहू को टिकट दे दिया गया. इन तीनों की नाराजगी उम्मीदवार के लिए परेशानी बन सकती है. ऐसी चर्चा है कि टिकट मिलने के बाद गोपाल साहू के जनसम्पर्क अभियान में वैश्य समाज का विरोध इन्हीं के नाराजगी का एक हिस्सा है. वैश्य समाज यहां के एक मजबूत वोटर है. ऐसे में इस समाज का लगातार विरोध उम्मीदवार पर भारी पड़ सकता है.

प्रदीप बालमुचु भी थे रेस में, कोलेबिरा जीत में थी बड़ी भूमिका

खूंटी में टिकट के रेस में सबसे आगे प्रदीप बालमुचु को माना गया था. हालांकि वे ‘हो’ जनजाति से संबंधित है, जिनका खूंटी में कोई विशेष जनाधार नहीं है. लेकिन इंटक नेता होने के साथ उनका मिशनरी वोट बैंक पर जबरदस्त पकड़ है. खूंटी में ईसाई मिशनरियों को एक बड़ा वोटर माना जाता है. कहा तो यह भी जाता है कि कोलेबिरा उपचुनाव के जीत में मिशनरी वोट बैंक को अपने पाले में करने में उनकी रणनीति काम आयी थी. ऐसे में खूंटी और उनके मित्र मंडली में शामिल कांग्रेस के दिग्गजों (ददई दुबे) को टिकट नहीं मिलना कई कांग्रेसी नेताओं को नागवार गुजरा है.

नाराज ददई दुबे को मनाने का नहीं दिखा विकल्प

माना जाता है कि धनबाद सीट पर कीर्ति आजाद को उम्मीदवार बनाने के बाद सबसे तगड़ा झटका वरिष्ठ कांग्रेसी नेता चंद्रशेखर दुबे को लगा है. पूर्व मंत्री चंद्रशेखर (ददई)दुबे धनबाद से कांग्रेस के प्रबल दावेदार थे. उनके नाराजगी को देख ददई समर्थकों ने कीर्ति आजाद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था. हालांकि चंद्रशेखर दुबे इसे अपने विरोधियों की करतूत बता कर पल्ला झाड़ने की कोशिश भी कर चुके है. लेकिन यह भी तय है कि कीर्ति आजाद को उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने उनकी नाराजगी को खत्म करने का कोई विकल्प नहीं निकाला है.

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