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लोकसभा चुनावः झारखंड में मची लूट और संसाधनों को छीन लेनेवाली नीतियों को लेकर राजनीतिक दलों को समझना होगा झारखंड का मर्म

राष्ट्रीय पार्टियों में आलाकमान का निर्णय है हावी, झारखंडी अवधारणाओं और मूल्यों के हिसाब से संचालित होती नहीं दिख रही राजनीति

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Faisal Anurag/Pravin Kumar

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एक हो गीत में कुहासे से घिरे आदिवासी समुदाय को बाहर निकालने के लिए जनसंघर्ष की अपील की गयी है और सिंगबोंगा से यह प्रार्थना कि नैतिकता, ईमानदारी के साथ अनीति के खिलाफ लड़ने की वह ताकत दे. दरअसल सदियों से आदिवासी अपनी अस्मिता और जनसंप्रभुता के लिए समझौताविहीन संघर्ष कर रहे हैं. फिर भी वे पुआसी यानी उन कोहरों से घिरते रहे हैं जिनके कारण चारों ओर अंधेरा छा जाता है और उनके संसाधन धूल की तरह उड़ जाते हैं. आजादी के बाद तो आदिवासी समाज का संकट और गहरा गया है. झारखंड के निर्माण से उम्मीद बंधी थी कि आदिवासियों का स्वशासन बहाल होगा तथा उनकी प्राकृतिक सहचर्यमूलक जीवन शैली विकासमान होगी. लेकिन झारखंड में मची लूट ओर संसाधनों को छीन लेनेवाली नीतियों ने उन्हें यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि बारबार ऐसा क्यों होता है कि मंजिल सामने दिखती है और जब वे वहां पहुंचने की कामना करते हैं तो एक ऐसे चौराहे पर नजर आते हैं, जहां से उन्हें अपनी ही जिन्दगी बंधनों से भरी नजर आती है. झारखंड का अर्थ केवल भूभाग भर तो नहीं है. लोकसभा चुनाव झारखंड के जनमानस के समक्ष एक मौका है लेकिन जिस तरह राष्ट्रीय पार्टियां झारखंड को लेकर राजनीति कर रही हैं, उससे झारखंड के लोगों का भला नहीं होनेवाला है. ऐसे में झारखंड नव विकल्प के बारे में झारखंड को सोचना जरूरी होगा.

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संताल हूल के बाद आदिवासियों ने क्रांति की विफलता को ले कर आत्ममंथन किया. सफाहोड़ के नाम से जाने जाने वाली इस प्रवृति ने देखा कि पराजय के कारण समाज की कुरीतियों में भी हैं और इन कुरीतियों को खत्म करने की जरूरत है. यह दीगर बात है कि बाद में सफाहोड़ आंदोलन बाद में बाह्य सांस्कृतिक विषमता और अंधविश्वास का शिकार हो गया, लेकिन प्रारंभ में उसने संस्कृतियों अंतरावलंबन के बीच आदिवासी संस्कृति की खासियतों की हिफाजत के लिए विचार किया और समाज को उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित किया. इसी तरह बिरसा उलगुलान के बाद भी भरमी मुंडा और उनके साथियों ने विचार किया कि किन स्थितियों में उलगुलान का मकसद पूरा नहीं हुआ ओर समाज में कौन से कारक प्रभावी हो गए जिसका असर बिरसा मुंडा और उनके साथियों की गिरफ्तारी का वाहक बना. जो समाज इस तरह के विचार मंथन की प्रक्रिया से गुजरता है, वह अपना नया रास्ता बना ही लेता है. और यही कारण है कि झारखंड में आगे चल कर नेतृत्व ने भले ही गलतियां की हैं, लेकिन जनगण के स्तर पर झारखंडी अवधारणा जीवंत है और वह अपनी सामुदायिकता और सामूहिक संपत्ति की चेतना को बचाए हुए है. यही नहीं उसने उस अर्थतंत्र की प्रवृतियों को भी नष्ट नहीं होने दिया है जिसमें लालच के लिए जगह नहीं है और सहिया जैसी विरासत भी जीवित है, जो झारखंड की पहचान और स्वशासन की हिमायत करता है.

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आज आदिवासी समाज को हूलगुलान के नायकों की फिर जरूरत है, ताकि वह झारखंड के सम्मान और विरासत को आधार बना कर तकनीक संचालित दुनिया में अपनी समानतामूलक संस्कृति और अर्थसत्ता को विकसित कर सके. पूरे भारत में झारखंड की एक खास बात यहां के आदिवासी समाज की जीवंतता है जो लगातार सांस्कृतिक रूप से विलयीकृत किये जानेवाले दिकू प्रक्रियाओं से जूझ रही है. झारखंड के आदिवासियों ने अपनी चेतना के साथ समझौता नहीं किया है और न ही झारखंड को आंतरिक उपनिवेश बना लेनेवाली राजनीति को स्वीकार किया है. झारखंडी संघर्षों को इसी रोशनी में देखने की जरूरत है. झारखंडी जनगण ने अपने को प्रकृति के संरक्षक के रूप में न केवल बचा कर रखा है, बल्कि महाविनाशकारी विकास की नीतियों को ग्लोबल फलक पर चुनौती दी है. साथ ही झारखंडी आदिवासियों ने सारी दुनिया के आदिवासी आंदोलन को भी दिशा दी है कि राजनीति समाज के उस संरचना का हिस्सा है, जो जनगण को संप्रभु मानता है तथा कोई भी विधान इसी को ध्यान में रख कर निर्मित होना चाहिए. झारखंड के जनगण ने यह भी रास्ता दिखाया है कि प्रगति या विकास से उसका अर्थ केवल आधुनिकता के मानकों पर खरा उतरना भर नहीं है, बल्कि संसाधनों पर जनहक और सांस्कृतिक रूप से दक्षता और समानता को हासिल करना भी है. दुनिया के दक्षिण के कई देशों में आदिवासी नेतृत्व इन्हीं मानको पर अपनी समुन्नति का अर्थसंरचना विकसित कर रहा है या इसके लिए जनसंघर्षों को परवान चढ़ा रहा है. आमतौर पर आज की राजनीति के सभी प्रमुख घटक आदिवासी समाज को पिछड़ी हुई सामाजिक अवस्था मान कर उसे मुख्यधारा में लाने के लिए सांस्कृतिक तौर पर हमला करते हैं. आदिवासी भाषा और चेतना को खत्म करने की दिशा में कदम उठाते हैं और विकास के नाम पर विस्थापन का आतंक पैदा कर आदिवासी जेनोसाइड के लिए माहौल बनाते हैं. लेकिन आदिवासी जनगण मानता है कि सदियों से उसने ऐसे सांस्कृतिक हमलों का मुकाबला किया है और अपने समाज की चेतना और इतिहासबोध को बचा कर रखा है और इसी आधार पर वह आधुनिक चुनौतियों से जूझने का माद्दा रखता है. आदिवासी जनगण सांस्कृतिक तौर पर अपनी अस्मिता के लिए सजग ही नहीं हैं, बल्कि अपने अभियानों में उसने यह चुनौती भी खड़ी की है कि समाज संरचना के आदिवासी कारकों को नकारने का परिणाम घातक होगा.

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उलगुलान के दौरान बिरसा मुंडा ने कहा था कि जब तक संसाधनों पर हक की जंग जारी रहेगी, वे किसी न किसी रूप में उसमें शामिल रहेंगे. इसलिए आदिवासी मानते हैं कि झारखंड का भविष्य इस तथ्य पर निर्भर करता है कि झारखंडी राजनीति किसी न किसी समय एक नए बिरसा मुंडा और उनके साथियों के नेतृत्व को जन्म देगी तथा जनतंत्र का नया व्याकरण रचेगी. झारखंड में जारी जमीनी संघर्षों तथा जनगण की आकांक्षाओं के बीच विकसित हो रही जन राजनीति से यह अवधारणा विकसित हो रही है कि झारखंड को सांस्कृतिक रूप से नयी और जुझारू पहल की जरूरत है. ऐसी राजनीति की जो इतिहास चेतना के साथ विकसित हो तथा झारखंड में जारी तमाम तरह के भेदभाव के खिलाफ खड़ा हो. झारखंड में आदिवासी सांस्कृतिक नेतृत्व की महत्ता इसी में है. इस कोशिश को परास्त करने की जरूरत है, जो आदिवासी राजनीति की नकारातमक समझ को प्रचारित कर दिकू नेतृत्व को स्थापित करता है तथा आदिवासियों के बीच से उभरे नेतृत्व को भी इसी में समाहित कर लेता है. पिछले कुछ दशकों की इस पीड़ा को यदि नजरअंदाज किया गया तो झारखंड में एक असमान्य माहौल उभरने का खतरा है. झारखंड राज्य बनना काफी नहीं है, बल्कि उसे झारखंडी अवधारणाओं और मूल्यों के हिसाब से संचालित करना भी जरूरी है और इसमें आदिवासी संस्कृति की केंद्रीय भूमिका को महत्व देना भी. आदिवासी समाज की बेचैनी को ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक नहीं देख पाते हैं ओर झारखंड और आदिवासी नेतृत्व को विफल साबित करने की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं. इसके खतरनाक परिणामों के प्रति संजीदा होने की जरूरत है.

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आदिवासी जनगण ने यदि अपने सामाजिक और सांस्कृतिक अस्तित्व को बचा कर रखा है तो इसके राजनीतिक निहितार्थों से भी परिचित होने की जरूरत है. आदिवासी जनगण को तोहमतों के सहारे हीनभावना में डालने की प्रवृत्तियों को जड़ से खत्म करने की अनिवार्यता है. आदिवासी समाज का आंतरिक जनतांत्रिक बोध तथा इतिहास साक्षी है कि जब कभी उसे पराजित करने का प्रयास हुआ है हूलगुलानों के तूफान उठ खड़े हुए हैं और झारखंड के ग्रामांचलों में स्वशासन तथा जनसंप्रभुता के संघर्ष बताते हैं कि ऐसी राजनीति जो झारखंडी चेतना के निषेध पर खड़ी है, क्षणिक सफलता तो पा लेगी लेकिन वह सामाजिक तौर पर दीर्घकालिक अशांति को जन्म देगी. इसलिए आदिवासी समाज के विकास के बारे में बात करते हुए उन मानकों को नहीं नकारना चाहिए जो समानता के मूल्य पर आधारित हैं तथा जो विकासमान परिघटना का संवाहक भी है. इसका साफ मतलब यह है कि आदिवासी जनगण कोई ठहरा हुआ समुदाय नहीं है बल्कि एक गतिशील चेतना है. आदिवासी नृत्यों व गीतों में अभिव्यक्त इस गतिविज्ञान की समझ के बिना झारखंड के नवनिर्माण का कोई भी कदम घातक ही होगा.

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राजनीतिक तौर पर इस तथ्य को भी समझने की जरूरत है कि झारखंडी भूभाग पर पहला हक यहां के मूलवासियों का है इसलिए उसके इस्तेमाल की कोई भी नीति मूलवासियों के साथ सहमति के आधार पर ही संभव है. यदि संसाधनों के लूट और दोहन की प्रक्रिया को लंबे समय तक जारी रखनेवाली नीतियों को खत्म नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब कोई सिदो कानू या बिरसा उठ खड़ा होगा ओर कहेगा हूलगुलान का अंत नहीं है. झारखंड के विस्थापन विरोधी तथा स्वशासन के पक्षधर आंदोलनों का सबक यह है कि झारखंड की राजनीति को सेकुलरबोध के साथ ही संसाधनों पर जनहक की प्रक्रिया के सहारे संचालित किया जाए. सत्ता केवल दिखावे के लिए आदिवासियों के हाथों में न हो बलिक जनतंत्र का तर्क यह है कि वास्तव में निर्णय करने और उसे जमीन पर उतारने का पूरा हक आदिवासी जनगण को मिले और झारखंड में आदिवासी संस्कृमिक मूल्य, विचार और अवधारणा को मानक बनाया जाए.

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झारखंड को बहुत बार खरीदा और बेचा गया. भ्रष्टाचार का अंतहीन सिलसिला जारी है. लेकिन जनगण ने हमेशा इसे खारिज किया है और शासक समूहों को बताया है कि झारखंड के मूलवासियों के राजनीतिक और आर्थिक संसाधनों व हकों को छीनने के प्रयास से उन्हें बचना चाहिए. झारखंड सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर इस तर्क के साथ संजीदा संघर्षपथ बना है और इसी डगर पर भविष्य के लिए नई राजनीति और समुन्नति के तकनीक को हासिल करने का झारखंडी प्रयास जारी है. राजनीतिक तौर पर झारखंड के जनगण को विभाजित करने के लिए धर्म तथा दूसरे सामाजिक तत्वों का इस्तेमाल अब पुरानी बात हो रही है. झारखंडी जनगण का सेकुलर विवेक उन खतरों को जान-समझ चुका है, इसलिए उसका रास्ता केवल संघर्ष से ही नवझारखंड निर्माण का है. इस इबारत को नजरअंदाज करना खरनाक होगा, इसलिए झारखंड के मूलवासियों की जनतांत्रिक सत्ता की स्थापना का अपराजेय संघर्ष को सम्मान देने तथा उसे अमल में लाने की जरूरत है.

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