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लोकसभा चुनाव  : यूपी में मुसलिम बहुल सीटों पर मचेगी रार, आसान नहीं है सपा-बसपा के बीच सीटों का बंटवारा    

2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व मोदी सरकार को पटखनी देने के लिए यूपी में दो बड़े विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में गठबंधन की बात हो रही है.

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Lucknow :  2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व मोदी सरकार को पटखनी देने के लिए यूपी में दो बड़े विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में गठबंधन की बात हो रही है. यूपी में पिछले दिनों हुए लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव में सपा-बसपा गठबंधन को मिली अप्रत्याशित सफलता को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि दोनों दल आम चुनाव साथ लड़ेंगे. लेकिन बता दें कि बसपा आमतौर पर उपचुनाव नहीं लड़ती. इसलिए उपचुनाव में बसपा के लिए गठबंधन बड़ी बात नहीं थी. आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सबकी निगाहें यूपी पर टिकी हैं. दिलचस्प बात है कि एक- दूसरे के धुर विरोधी सपा और बसपा के एक साथ चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. जानकारों के अनुसार यह इतना आसान नहीं है.  बता दें कि बसपा सुप्रीमो मायावती को मोलभाव के मामले में बहुत तेज माना जाता है. हालांकि वर्तमान में बसपा का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं हैं. उधर गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव को मिलाकर सपा के सात सांसद हैं.

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गठबंधन का फॉर्मूला है कि  जिस सीट पर जिसका कब्जा होता है वो तो उसी को मिलती है. फिर देखा जाता है कि पिछले चुनाव में किस सीट पर उस राजनीतिक दल का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर था. इस लिहाज से यदि 2014 के आम चुनावों को आधार पर बनाया जाये तो बसपा 34 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी और समाजवादी पार्टी 31 सीटों पर दूसरे स्थान पर थी.  लेकिन सपा-बसपा गठबंधन में असल पेच मुस्लिम बहुल सीटों पर फंस सकता है.

 समाजवादी पार्टी अपना अल्पसंख्यक आधार खोना नहीं चाहेगी

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अधीर रंजन चौधरी के साथ-साथ केरल के नेता के सुरेश, पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी और तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर इस पद के लिए दौड़ में शामिल थे.

राजनीति के जानकार मानते हैं कि यादव-मुस्लिम समीकरण को अपना आधार मानने वाली समाजवादी पार्टी अपना अल्पसंख्यक आधार खोना नहीं चाहेगी. वहीं, बसपा भी लगातार अल्पसंख्यकों को अपने खेमे में लाने का प्रयास करती रही है. इसी कारण  2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा  ने 100 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. सपा कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी. ऐसे में सप और बसपा के उम्मीदवारों में वोटों का बिखराव हो गया जिसका फायदा भाजपा को हुआ. बता दें कि मुस्लिम आबादी के लिहाज से रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, बिजनौर और अमरोहा ऐसी लोकसभा सीटें हैं जहां मुस्लिम आबादी 35 से 50 फीसदी के बीच है. वहीं मेरठ, कैराना, बरेली, मुजफ्फरनगर, संभल, डुमरियागंज, बहराइच, कैसरगंज, लखनऊ, शाहजहांपुर और बाराबंकी में मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा और 35 फीसदी से कम है. हाल के दिनों में बसपा ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपना अल्पसंख्यक आधार बढ़ाया है. लिहाजा, यही वो सीटें हैं जिन्हें लेकर पेच फंस सकता है.

इसके बाद बात उन सीटों की आयेगी, जहां सपा और बसपा दोनों ही दूसरे स्थान पर नहीं रहीं. ऐसी स्थिति में जातीय समीकरण मायने रखेंगे और जातियों को लेकर जिन सीटों पर जिनका पलड़ा भारी रहेगा उन्हें वे सीटे मिलेंगी. लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छ्त्तीसगढ़ के विधानसभा पर बात की जाये,तो महज कुछ सीटों पर पेंच को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस को झटका दिया था.

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