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लोकसभा चुनाव : खूंटी सीट का रोमांच

Sweta Kumari

झारखंड के खूंटी लोकसभा सीट पर चुनाव काफी रोचक हो गया है. खूंटी के बीजेपी सासंद कड़िया मुंडा की राजनीतिक और सादगी वाली विरासत आज एक बड़ी लकीर बन कर खड़ी है. क्या उस छवि और सादगी के उत्तराधिकारी बीजेपी के ही अर्जुन मुंडा बन पायेंगे.

खूंटी की राजनीति और वहां के आदिवासियों के बीच कड़िया मुंडा को लेकर जितना विश्वास और प्रेम है. उसे भी जीतना अर्जुन मुंडा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी. खूंटी के चुनाव में इस बार अर्जुन मुंडा के राजनीतिक कौशल की भी बड़ी परीक्षा है. खूंटी में कई ऐसे मुद्दे हैं, जिसका सामना उन्हें करना पड़ेगा.

खूंटी में अर्जुन मुंडा के लिए कई महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं. क्योंकि खूंटी का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समीकरण बेहद जटिल है. पिछली बार विधानसभा में चुनाव हारने के बाद इस बार चुनावी जंग में इन चुनौतियों का उन्हें सामना करना होगा.

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खूंटी वह इलाका है, जहां सीएनटी-एसपीटी एक्ट में किए गए संशोधन का आदिवासियों की ओर से पुरजोर विरोध किया गया. जिसपर कड़िया मुंडा न्यूट्रल ही रहे, लेकिन इस मुद्दे पर अर्जुन मुंडा कैसे वहां के वासियों को समझाते हैं, ये भी एक बड़ी चुनौती है.

इसके अलावा किसानों का मुद्दा भी सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द है, क्योंकि हाल के दिनों में जैसी नाराजगी किसानों की देखने को मिली है, वह भी खूंटी में वोट फैक्टर बन सकता है.

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लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा खूंटी में पत्थलगड़ी है. क्योंकि आज भी खूंटी के अलावा झारखंड के अन्य इलाकों में आदिवासी अपनी इस परंरपरा को लेकर बेहद सजग और संवेदनशील रहता है.

बीजेपी के सामने यह मुद्दा ही सबसे बड़ी चुनौती है, इसे साधने के लिए अर्जुन मुंडा किस कौशल और नीति का इस्तेमाल करते हैं यह देखना होगा ताकि आदिवासियों की नाराजगी को अपने पक्ष में कम कर सकते हैं या नहीं.

पत्थलगड़ी को लेकर राज्य सरकार के प्रति खूंटी की जनता ने अपनी नाराजगी भी दिखायी थी. पुलिस और खूंटी की जनता के बीच जो आमना-सामना हुआ, वह भी सबने देखा.

जिसका असर आज भी वहां के जनता के दिलों में है. पत्थलगड़ी आंदोलन भले ही छोटे से क्षेत्र में शुरू हुआ हो, लेकिन इसका प्रभाव पूरे खूंटी क्षेत्र में देखने को मिला.

राज्य सरकार के तमाम दावों के बावजूद खूंटी में इन दिनों नक्सल संगठनों का प्रभाव भी देखने को मिल रहा है, ऐसे में ये भी एक बड़ी चुनौती अर्जुन मुंडा के लिए होगी.

इसके अलावा मुंडाओं की भाषा और संस्कृति भी विशिष्ट है और वो इसे लेकर काफी सजग भी रहते हैं. तो ऐसे में उनके बीच कड़िया मुंडा वाली छवि बनाना अर्जुन मुंडा के लिए बड़ी चुनौती है.

 

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वैसे तो खूंटी में कई तरह के चैलेंज हैं, अर्जुन मुंडा के लिए. एक तो पहली बार खूंटी और वह भी लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. साथ ही दूसरा पत्थलगड़ी समेत कई ऐसे मुद्दे खूंटी में हावी हैं, जो अर्जुन मुंडा के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं.

वहीं बीजेपी में अंदरखाने एक लॉबी ऐसी भी हैं, जो अर्जुन मुंडा के चुनावी सेहत के लिए घातक हो सकती है. क्योंकि यदि विधानसभा के बाद के फ्लैश बैक को देखें तो सूत्रों का कहना था कि अर्जुन मुंडा के विधानसभा चुनाव हारने के पीछे पार्टी की एक लॉबी थी. क्या इस लॉबी को अर्जुन मुंडा चुनाव में साध सकेंगे?

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