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लोकसभा चुनाव झारखंड : राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र में जन मुद्दों को कितना मिला स्थान,  एक आकलन

Pravin kumar/ chhaya

Ranchi : पिछले पांच सालों में झारखंड के सामाजिक आर्थिक पटल पर जिन सवालों ने हलचल पैदा की है उन पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में क्या कहा है यह जानना बेहद दिलचस्प है. झारखंड के पिछले पांच साल न केवल जनांदोलनों और प्रतिरोधों का गवाह रहा है बल्कि उनकी धमक राजनीतिक गलियारे में भी महसूस की जाती रही है. पांचवी अनुसूची, सीएनटी -एसपीटी ,ग्रामसभाओं की भूमिका  सहित प्राकृतिक संसाधानों पर हक के आदोलनों को सत्ता और विपक्ष दोनो की बहस को प्रभावित किया है.

विकास नीतियों के अंतरविरोध का सवाल हो या फिर जमीन पर झारखंडी हक का या स्थानीय नीति का सवाल को लेकर झारखंड में अनेक आंदोलन हुए . भूख से हुई 19 लोगों की मौत और मॉबलिचिंग में हुई नृशंस- हत्याओं  का भी राज्य में बड़ा सवाल रहा. पत्थलगड़ी और पांचवी अनुसूचि लागू करने के सवाल पर भी राजनीतिक दल मौन रहे.राज्य में यह उम्मीद की जा रही है कि राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्रों में इनका उल्लेख होगा. लगभग सभी प्रमुख दलों के चुनाव धोषणापत्र जारी हो चुके हैं. इनका तुलनात्मक अध्ययन कईर दिलचस्प पहलुओं को सामने लाता है.

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ग्रामसभा और प्राकृतिक संसाधनों पर किस पार्टी ने क्या कहा

ग्राम सभा के अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम सभा का पूर्ण एकाधिकार पर लगातार आंदोलन होते रहे. कई जन संगठनों ने इस चुनाव में इन मुद्दों को शामिल करने की मांग भी की गयी. इन मांगों में भूमि अधिग्रहण संशोधन, लैंड बैंक नीति को रद्द करना, गोड्डा अडाणी प्रोजेक्ट,पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून नियमावली और वनाधिकार कानून को लागू करने की मांग शामिल है. इन विषयों पर भाजपा के घोषणा पत्र में कुछ नहीं गया गया है. वहीं कांग्रेस ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 की विकृतियों को दूर करने की बात की है. लेकिन विस्थापन वाली परियोजनाओं जैसे अडाणी प्रोजेक्ट,मांडल डैम,इंचा खरकाई,हाथी कारीडोर पर पार्टी ने कुछ नहीं कहा.जबकि  पेसा कानून, ग्राम सभा की भूमिक बढ़ाने की बात की गयी.

जेएमएम ने लैंड बैंक और भूमि अधिग्रहण दोनों कानून को रद्द करने और पुनर्वासन आयोग गठन करने की बात की. साथ ही अडाणी परियोजनाओं की समीक्षा की बात की है. वामदलों ने भूमि अधिग्रहण रद्द करने का बायदा किया है. समता जजमेंट, पांचवीं अनुसूची और पेसा को लागू करने और पेसा नियामवली बनाने की बात की है.

नागरिक अधिकार  के मामले में खूंटी में पत्थलगड़ी और इलाके में हुए दमन 15000 हजार लोगो पर मुकदमा पीड़ितो को मुआवजा एवं दमन के दोषी अधिकारी पर कार्रवाई को लेकर किसी भी राजनीतिक दल ने अपने घोषना पत्र में कुछ नहीं कहा. सभी दल मामले से बचते नजर आये.  राजद्रोह, मानहानि निवारण अधिनियम और राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम को निरस्त करने, राष्ट्रविरोधी के दर्ज सभी मामलों को वापस लेने, 3000 से भी अधिक आदिवासी जिन्हे माओवादी के फर्जी मुकदम्मे में कारावास हुआ है, उन्हें रिहा करने, जैसे ज्वालत सवालों  को भाजपा ने अपने मांग पत्र में शामिल नहीं किया है.

वहीं कांग्रेस ने राजद्रोह हटाने, मानहानि को दिवानी अपराध बनाने की बात की है. वहीं तीन साल या कम की सजा और तीन माह से अधिक जेल में रहने वाले कैदियों को रिहा करने की बात की. जेएमएम ने सिर्फ छोटे छोटे मामलों में पुलिस से गिरफ्तार किये  जाने की शक्ति समाप्त करने की बात की. जबकि वामपंथियों ने राजद्रोह, मानहानि जैसे कानूनों को निरस्त करने और इन कानूनों के तहत गिरफ्तार लेागों को रिहा करने की बात की.

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 स्थानीयता और आरक्षण

स्थानीयता नीति रद्द करने, निजी और सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों की भागीदारी तय करने, सभी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण समेत अन्य मांग जनसंगठनों ने उठायी है. इसमें भाजपा ने मात्र विधानसभा और संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की बात की है.  कांंग्रेस ने एससी एसटी और ओबीसी को पदोन्नति में आरक्षण, 12 माह में रिक्त पदों को भरने की बात की है. जेएमएम ने स्थानीय लोगों को निजी क्षेत्रों में आरक्षण दिलाने और सभी प्रकार की नौकरियों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की बात की. वहीं वामपंथियों ने निजी क्षेत्रों में दलितों और आदिवासियों, दलित, ईसाई और मुसलमानों को आरक्षण देने की बात की.

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सामाजिक सुरक्षा

पीडीएस के तहत अनाज की गुणवत्ता में सुधार, गर्भवती और धात्री महिलाओं को 6000 मातृत्व लाभ, मि‍ड डे मील में पोषण युक्त भोजन और नरेगा का विस्तार शहरी क्षेत्र के साथ न्यूनतम मजदूरी दर तय करने समेत अन्य मांग है. इन सभी मांगों पर भाजपा शून्य रही. वहीं कांग्रेस ने पीडीएस के तहत लाभुकों की समीक्षा कर किसी को वंचित न करने की बात की है.

अन्य मांगों को शामिल न करते हुए नरेगा में 150 दिन काम देने की बात की है. जबकि मनरेगा मजदूरी बढ़ने के सवाल पर कुछ भी नही कहा .जेएमएम ने बायोमैट्रिक सिस्टम समाप्त करने और 150 दिन नरेगा काम देने की बात की. वामपंथियों ने पीडीएस के तहत खाद्यान्न और तेल देने की बात की. गर्भवती महिलाओं को 6000 लाभ देने, मीड डे मील बजट बढ़ाने की बात की.

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 शिक्षा और स्वास्थ्य

12 वीं तक की शिक्षा निशुल्क और समान शिक्षा, विद्यालय विलय के दौरान बंद विद्यालयों को शुरू करने, गुणवत्तापूर्ण और निशुल्क स्वास्थ्य सेवाएं देने और सर्वाजनिक स्वास्थ्य सेवाएं देने की मांग की गयी. भाजपा ने शिक्षा और स्वास्थ्य से संबधित इन मुद्दों को यहां भी शामिल नहीं किया.

कांग्रेस ने 12 वीं तक निशुल्क शिक्षा करने, स्वास्थ्य सुविधाओं पर कुल सरकारी खर्च को दोगुणी करने की बात की. वहीं जेएमएम इन मुद्दों पर शून्य है. वामपंथियों ने शिक्षा पर जीडीपी का छह से दस प्रतिशत तक खर्च करे और स्वास्थ्य पर जीडीपी का 3.5 प्रतिशत करने की बात की.

कृषि

स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को पूर्ण रूप से लागू करने, किसानों के कर्ज माफ करने, वन उपज पर नियंत्रण ग्राम सभा को दिये जोन समेत अन्य मांग की गयी है. जिसमें भाजपा ने सिंचाई व्यवस्था पर प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के विस्तार की बात की. वहीं कांग्रेस ने कर्ज माफ करने, कृषि विकास  के लिए कृषि विकास और योजना आयोग बनाने की बात की.

जेएमएम ने इन मुद्दों पर कोई एजेंडा तय नहीं किया है. वहीं वामपंथियों ने स्वामीनाथन समिति की रिर्पोट को लागू करने, किसानों के कर्ज माफ करने, सिंचाई संसाधनों में निवेश बढ़ाने की बात की है.

धर्म, संस्कृति और भाषा

धर्म स्वतंत्रता कानून रद्द करने, आदिवासी धर्म को मान्यता देने, सच्चर कमेटी की रिर्पोट के आधार पर अल्पसंख्यकों के विकास के लिए नीति बनाई जाये और इसे कानून का रूप दिया जाएये. भाजपा और जेएमएम ने इन मुद्दों को शामिल नहीं किया है. वहीं कांग्रेस ने धर्म स्वतंत्रता कानून पर कोई वायदा नहीं किया.

अनुसूचित और घुमंतू जनजातियों की भाषा को कामकाज में प्रोत्साहित करने की बात की है. वहीं वामपंथियों ने भी धर्मातरण कानून को रद्द करने और आदिवासी धर्म को मान्यता देने की बात की है.

पारदर्शिता

राजनीतिक दलों के चंदों को पारदर्शी करने, सूचना अधिकार कानून से छेड़ छाड़ न करने और इसकी ऑनलाइन सुविधा देने के साथ राज्य में सक्रिय विकेंद्रीकृत शिकायत निवारण प्रणाली बनाने की मांग की गयी है. जिसमें भाजपा और जेएमएम ने अपने घोषणा पत्र में शामिल नहीं किया. वहीं कांग्रेस ने चुनावी बांड योजना को समाप्त करने, चंदे के लिए राष्ट्रीय चुनाव कोष स्थापित करने की बात की.

सूचना अधिकार अधिनियम के 14 सालों के अनुभव का मूल्याकंन करने की बात की गयी है और शिकायत निवारण विधेयक 2011 को पारित करने की बात की. वामपंथियों ने भी चुनावी बांडी योजना को समाप्त करने की बात की साथ ही सूचना अधिकार अधिनियम को मजबूत करने की बात की.

लोकसभा चुनाव झारखंड : राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्र में जन मुद्दों केा कितना मिला स्थान,  एक आकलन
सामाजिक कार्यकर्ता सिराज

चुनाव घोषणापत्र का अध्ययन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सिराज कहते है  जितने राजनीतिक दलों ने मेनिफेस्टो जारी किया है उसमें भाजपा ने जनसरोकर के विषयों पर कुछ नहीं कहा है. वही झारखंड के ज्वालत विषयों को लेकर विपक्षी दलों ने भी कोई खास घोषणा नही की है.  मनरेगा मजदूरी बढ़ने के सवाल को लेकर कांग्रेस ने जहां कुछ नहीं कहा वही झारखंड मुक्ति मोर्चा ने मनरेगा मजदूरी वृद्धि की बात कही.

राशन और पेंशन के सवाल को राजनीतिक दलों में थोड़ा तवज्जो दिया है .विपक्षी दलो ने जो  सामाजिक मुद्दे को अपने घोषणापत्र में शामिल किया है उस विषय को उनके कैडर जनमानस तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं. वहीं खूंटी में पत्थलगड़ी के सवाल और पुलिसिया दमन पर किसी भी राजनीतिक दल ने कुछ नही कहा. 

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