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लोकसभा चुनाव : 28 साल बाद वफादारी, खुद्दारी और संस्कार की कसौटी पर सिंह मेंशन परिवार

यह देखना दिलचस्प होगा कि कोयलान्चल धनबाद संसदीय सीट पर वफादारी, खुद्दारी और संस्कार बच पाता है या समय के साथ बदल जाता है. 12 मई को धनबाद संसदीय सीट पर चुनाव होना है.

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Manoj mishra

Dhanbad :  भारतीय लोकतंत्र में वफादारी, खुद्दारी और संस्कार के मायने आजादी के समय से ही बरकरार रहे है. लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दरम्यान वफादारी, खुद्दारी और संस्कार तार तार नजर आ रहे है. धनबाद लोकसभा संसदीय क्षेत्र भी अछूता नहीं है. 28 साल बाद वफादारी, खुद्दारी और संस्कार की कसौटी पर एक बार फिर धनबाद का सबसे रसूखदार राजनीतिक घराना सिंह मेंशन परिवार कसा जायेगा.

यह देखना दिलचस्प होगा कि कोयलान्चल धनबाद संसदीय सीट पर वफादारी, खुद्दारी और संस्कार बच पाता है या समय के साथ बदल जाता है. 12 मई को धनबाद संसदीय सीट पर चुनाव होना है. इस दिन धनबाद लोकसभा के लगभग 20 लाख मतदाता अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान करेंगे. वहीं इसी दिन धनबाद में वफादारी, खुद्दारी और संस्कार की अग्निपरीक्षा होगी.

धनबाद लोकसभा सीट से सूर्यदेव सिंह के छोटे पुत्र सिद्धार्थ गौतम अपने बड़े भाई झरिया से भाजपा विधायक संजीव सिंह से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. सूर्यदेव सिंह की पत्नी पूर्व भाजपा से झरिया विधायक कुंती सिंह अपने छोटे बेटे सिद्धार्थ के साथ खड़ी है. सूर्यदेव सिंह की पुत्री किरण सिंह भी छोटे भाई के साथ खड़ी है. वहीं सूर्यदेव सिंह के बड़े बेटे झरिया विधायक संजीव सिंह भाजपा से अपने परिवार की 18 साल की दोस्ती निभा रहे हैं. संजीव की पत्नी रागिनी सिंह भाजपा प्रत्याशी पशुपतिनाथ सिंह के साथ कदमताल करते हुए समर्थकों के साथ पशुपतिनाथ के लिए चुनाव प्रचार किया है.

संजीव सिंह अपने पिता की भांति कर्तव्यनिष्ठता और वफादारी जेल में रहकर भी निभा रहे हैं. सिंह मेंशन के समर्थकों को, जनता मजदूर संघ के कार्यकर्ताओं को पशुपतिनाथ सिंह के लिए वोट करने की अपील संजीव सिंह ने की है. पशुपतिनाथ और सिंह मेंशन परिवार के बीच नजदीकी रिश्ता माना जाता है. सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह के साथ पशुपतिनाथ सिंह का देवर-भाभी और संजीव, सिद्धार्थ के साथ चचा-भतीजे का गहरा रिश्ता है.

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 बात  1991 लोकसभा चुनाव की, सूरजदेव सिंह की वफादारी की

1991 का लोकसभा चुनाव और यूपी का विधानसभा चुनाव एक साथ हो रहा था. चंद्रशेखर जी के पीएम पद से त्याग पत्र देने के बाद चुनाव हो रहा था. बलिया से चंद्रशेखर जी उम्मीदवार थे, बलिया के दुआबा विधानसभा चुनाव से भरत सिंह उनके विधान सभा के उम्मीदवार थे. उस वक्त चंद्रशेखर जी के साथी धनबाद कोयलान्चल के बेताज बादशाह कहे जाने वाले सूर्यदेव सिंह थे जो धनबाद के सर्वशक्तिमान दबंग थे, राजनैतिक गलियारे में चर्चा होती थी कि सूर्यदेव सिंह ही चंद्रशेखर की पार्टी का अधिकांश खर्च उठाते थे. सूर्यदेव सिंह जी चंद्रशेखर जी के सबसे खुद्दार और वफादार साथी थे, उनकी इसी नजदीकी की वजह से सूर्यदेव सिंह के छोटे भाई विक्रम सिंह ने दुआबा विधानसभा चुनाव से टिकट माँगा लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला, फिर जिद्दी विक्रम सिंह ने कांग्रेस से अपने लिए टिकट ले आये. सूर्यदेव सिंह खुद बलिया चुनाव के समय आ गये.

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मुझे सिर्फ चंद्रशेखर जी की संसदीय सीट से मतलब है

सूरजदेव सिंह ने अपने भाईयो से कहा मुझे सिर्फ चंद्रशेखर जी की संसदीय सीट से मतलब है. मैं विधानसभा में ना तो विक्रम का और ना ही भरत का समर्थन करूँगा. अपने भाई को निर्देश दिया, अपना वोट तुम मांगो लेकिन लोकसभा में चंद्रशेखर जी के वोट से खिलवाड़ मत करना. वोटिंग के दिन सुबह ही खबर उड़ी विक्रम सिंह बूथ कब्ज़ा करते जा रहे हैं और उनके समर्थक लोकसभा में भी कांग्रेस को वोट मार रहे है, और बूथ लूटने वाला उनके ही सिनेमा हॉल का पहलवान है. खुद सूरजदेव सिंह बताये गये बूथ पर पहुंच गये, पहलवान को बुलाया. चंद्रशेखर जी को वोट क्यों नहीं पड़ रहे है? उसने बोल दिया आपकी सुने या आपके छोटे भाई की. इतना सुनते ही कार में बैठे सूरज देव सिंह अपना आपा खो बैठे और मुँह से निकला तेरी हिम्मत मेरे सामने जुबान खोलता है, और वहीं कार में लुढ़क गये. थोड़ी देर में डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. चंद्रशेखर जी और भरत सिंह दोनों चुनाव जीते. तो ये था एक खुद्दार, वफादार साथी का कर्तव्य जो अपने साथी के लिए कुर्बान हो गया और अपने प्यारे भाई का साथ नहीं दिया. इसको संस्कार भी बोलते हैं.

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आपकी सुनें या आपके छोटे भाई की

सूरजदेव सिंह माफिया कहलाते थे लेकिन धार्मिक आयोजनों में बढ़ चढ़ कर भाग लेते थे, संतो संन्यासियों के कदमो में अपना सर झुकाते थे, कभी अपनी परिवार के किसी भी समारोह में सैफई वालो की तरह किसी को नहीं नचाया. उनका पूरा परिवार उनके चरित्र के सामने नतमस्तक रहता था और उनका अनुसरण करता था. सूर्यदेव की मौत के बाद से हालत बदल गये हैं.  सूर्यदेव का कुनवा बिखर गया है. सिंह मेंशन दो फांक होकर रघुकुल और सिंह मेंशन में पहले से तब्दील था.

अब साल 2019 लोकसभा के दरम्यान सूर्यदेव सिंह के दोनो पुत्र दो राह पर हैं. वफादारी, खुद्दारी और संस्कार के मिशाल धनबाद का रसूखदार सिंह मेंशन परिवार के सामने 28 साल बाद एक बार फिर वफादारी, खुद्दारी और संस्कार की चुनौती है. समर्थक सूर्यदेव सिंह के बेटे से पूछ रहे हैं, आपकी सुने या आपके छोटे भाई की’.

सवाल यह भी उठने लगे हैं कि सूर्यदेव सिंह खुद्दार, वफादार साथी का कर्तव्य निभाते साल 1991के चुनाव में अपने साथी के लिए कुर्बान हो गये और अपने प्यारे भाई का साथ नहीं दिया, मिसाल बने. पर, किया संजीव सिंह भाजपा प्रत्याशी पशुपतिनाथ सिंह के लिए खुद्दार, वफादार साथी का कर्तव्य निभा पाएंगे?

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