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लोकसभा चुनाव : कठिन है डगर पनघट की, ज्यादा कुछ बदलने की उम्मीद नहीं

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Ravi Aditya

Ranchi : लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने ही वाला है. सभी राजनीतिक दलों के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी आ गयी है. राजनीतिक दलों के लिए यह चुनाव कठिन डगर भी है. सभी दलों में कमोबेश एक ही स्थिति बनी हुई है. कोई अंदरूनी झगड़े से परेशान है, तो कोई अपनी धार तेज करने में जुटा है. सभी दल महागठबंधन की वकालत भी कर रहे हैं, तो दबी जुबां से अकेले दम पर चुनाव लड़ने का भी दावा कर रहे हैं. पॉलिटिकल स्टंट जारी है. संगठन की मजबूती और जनाधार बढ़ाने पर सभी का फोकस भी है. जानिये दलों का हाल-

हाशिये पर जदयू का वजूद

झारखंड में जदयू का वजूद हाशिये पर है. तीर निशान वाली इस पार्टी का तीर कुंद हो गया है. संगठन कमजोर है. पार्टी के पदाधिकारी इसे पटरी पर लाने के लिए प्रयासरत हैं, पर राज्यस्तरीय चेहरा नहीं है. एनडीए का अहम पार्टनर होने के बावजूद भाजपा की हिकारत का सामना कर रहा है. नतीजतन पार्टी को बचाने की कवायद है. एकीकृत बिहार में मौजूद झारखंड क्षेत्र से दो सीटों पर जदयू का कब्जा था. समता पार्टी के रूप में छह सीटें भी थीं. बाद में समता पार्टी का जदयू में विलय हो गया.

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गुटबाजी है कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी

कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है. संगठन की यह सबसे बड़ी कमजोरी है. लंबे समय से सत्ता से दूर रहने और गुटबाजी का नतीजा है कि धरातल पर पार्टी की ठोस गतिविधियां नहीं दिख रहीं. प्रदेश अध्यक्ष तक के चयन में केंद्रीय नेतृत्व की परमिशन जरूरी है. पूर्व सांसद सुबोधकांत सहाय और प्रदेश अध्यक्ष के बीच तालमेल की कमी साफ नजर आ रही है. दोनों के गुट अलग-अलग हैं, जिसका उदाहरण समय-समय पर देखने को मिलता है.

क्या है कांग्रेस की परेशानी

सरकार में नहीं रहने के कारण कार्यकर्ता बिखर गये हैं. कई नीचे स्तर के कार्यकर्ता दूसरे दलों के लिए काम करने लगे हैं. चुनाव के समय टिकट का बंटवारा राष्ट्रीय स्तर पर होता है. जुगाड़ व्यवस्था ज्यादा है, जिसका नतीजा है कि पार्टी के पुराने लोगों का मोह भंग होता जा रहा है. पार्टी का राज्यस्तरीय आक्रामक तेवर कम दिख रहा है. बड़े कार्यक्रम का आयोजन लंबे समय तक नहीं होता है.

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झाविमो के लिए है अग्नि परीक्षा

झाविमो के लिए अग्नि परीक्षा होनेवाली है. उनके घर में जिस तरह से बातें सार्वजनिक हो रही हैं, उनके लिए परेशानी खड़ा कर सकती हैं. हाल ही में विधायक प्रकाश राम को राज्यसभा चुनाव के बाद किनारे कर दिया गया. संगठन की मुख्य ताकत बाबूलाल मरांडी संगठन को खड़ा करने में अपनी पूरी ताकत झोंक चुके हैं. आठ साल के राजनीतिक सफर में पार्टी को कई कद्दावर नेता हाथ लगे. भाजपा के डॉ दिनेश षाडंगी, झामुमो के दुलाल भुइयां, शिवलाल महतो, गौतम सागर राणा, घुरन राम, प्रकाश राम, जोबा मांझी, चंद्रनाथ भाई पटेल, अनिल मुर्मू ने झाविमो का दामन थामा. लेकिन, सभी ने किनारा कर लिया.

झामुमो को सता रही है गणित की चिंता

झामुमो के लिए स्थिति यह हो गयी है कि एकला चला, तब निशाने पर तीर नहीं लग पायेगा. इसका भान झामुमो को भी है. झामुमो के लिए संताल और कोल्हान गढ़ माना जाता है. संताल में झाविमो की उपस्थिति उसकी परेशानी बढ़ा सकती है. संताल में बाबूलाल मरांडी का भी जनाधार है. इधर, भाजपा ने भी संताल में पूरी ताकत झोंक दी है. झामुमो का अगला निशाना पलामू सीट भी हो सकती है.

झामुमो की परेशानी का कारण

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  • संताल और कोल्हान में अन्य दलों की सेंधमारी
  • हेमंत के बढ़ते कद को पचा नहीं पा रहे कद्दावर नेता
  • गठबंधन नहीं होने की स्थिति में जनाधार घटेगा

भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का विषय

लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का विषय है. इसकी तैयारी बूथ स्तर से शुरू कर दी गयी है. भाजपा में अंदरूनी कलह भी है. आनेवाले समय में टिकट को लेकर खींचतान से निपटना बड़ी चनौती होगी. हालांकि पार्टी ने कार्यकर्ताओं से कह दिया है कि वे लोकसभा की तैयारी में जुट जायें. पार्टी नेतृत्व प्रयास कर रहा है कि प्रदेश के नेता एकजुट होकर चुनाव में जायें. हालांकि, यहां की कहानी कुछ और ही है.

क्या है भाजपा की परेशानी

  • पार्टी में अंदरूनी कलह
  • सरकार से नाखुश हैं कार्यकर्ता
  • आदिवासी और गैर आदिवासी के सवाल पर पार्टी में है मतभेद

राजद का घटता जनाधार

राजद के लिए सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उसका जनाधार घट रहा है. महिला, युवा, छात्र संगठन भी कमजोर हो चला है. यह राजद के लिए परेशानी का सबब हो सकता है. पलामू, देवघर और चतरा में राजद का जनाधार तो है, लेकिन बड़े नेता का कोई कार्यक्रम नहीं हुआ है. राजद ने अब तक कोई बड़ा अभियान भी नहीं चलाया है.

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जनाधार बढ़ाने में जुटी है आजसू

आजसू जनाधार बढ़ाने में जुटी है. फिलहाल उसकी स्वाभिमान यात्रा चल रही है. पिछले चुनाव में आजसू सुप्रीमो की हार के बाद पार्टी फूंक-फूंक कर कदम रख रही है. राज्य में मिलन समारोह के जरिये कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल कराया जा रहा है.

क्या है आजसू का नकारात्मक पक्ष

  • सत्ता से चिपके रहने का आरोप
  • सरकार को समर्थन देने के एवज में सौदेबाजी
  • पूरे राज्य में अब तक आजसू की पहचान नहीं
  • आदिवासी वोट बैंक पर पकड़ है ढीली

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