Opinion

लोहिया के विचारों को लेकर अमित शाह के दावों पर लोहियावादी ही उठा रहे सवाल  

Faisal Anurag

प्रधानमंत्री ने देश को संबोधित करते हुए एक नई स्थापना दी है कि कश्मीर में आंतकवाद का कारण आर्टिकल 370  था. आंतकवाद के कारणों में अब तक भारत पाकिसतान को बड़ा कारक मानता रहा है. प्रधानमंत्री का वक्तव्य यदि नीतिगत है तो इसकी अनेक व्याख्याएं की जायेंगी. इस स्थापना को लेकर रात से ही सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है.

उनके संबोधन में जम्मू और कश्मीर के लिए जो रोडमैप पेश किया गया है वह कश्मीरियों को कितना आकर्षित करेगा, यह आनेवाले दिनों में ही पता चलेगा. अभी कश्मीर में घर से बाहर लोगों को निकलने नहीं दिया जा रहा है. भारी संख्या में मौजूद सुरक्षा बल इसे लेकर सख्त हैं. इसलिए इस संबोधन पर घाटी की प्रतिक्रिया अभी नहीं सुनी गयी है. लेकिन देश के अनेक हिस्सों में मौजूद घाटी के लोगों ने कोई बहुत सकारात्मक उत्साह नहीं दिखाया है. वे अभी अपने परिवारजनों की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित और बेचैन हैं.

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सुयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा है कि कश्मीर का मामला द्विपक्षीय है और इसमें तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं है. उन्होंने दोनों देशों से संयम बरतने की अपील भी की है. और यह भी कहा है कि यूएन घटनाक्रम पर नजर बनाये हुए है. महासचिव ने शिमला समझौते का उल्लेख भी किया है जो द्विपक्षीय ताकतों द्वारा मामले को हल करने की बात करता है. यह समझौता भारत पाकिस्तान के 1971 की जंग के बाद इंदिरा गांधी और जुल्फिकार भुट्टो के बीच हुआ था.

पिछले दिनों अमरीका ने तीसरा पक्ष बनने की बात कही थी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसका स्वागत किया था. चीन पहले से ही इस मामले में अपनी भूमिका निभाने का संकेत देता रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति के प्रस्ताव को भारत ने नकार दिया था. बावजूद यह मामला जिस तरह इंटरनेशनल होता जा रहा है वह भारत के लिए गंभीर बात है. हालांकि 370 को हटाने के बाद भारत को इस बात का संतोष है कि अंतरराष्ट्रीय जगत की प्रतिक्रिया एक तरह से सामान्य ही रही है.

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संसद में अमित शाह ने अपने भाषण में डा. राम मनोहर लोहिया को 370 के खिलाफ बताया  था. अब डा. लोहियावादी अनेक जानकार इस तथ्य को लेकर कह रहे हैं कि अमित शाह नं यह तथ्यहीन बात कही है. डा. लोहिया की तमाम रचनाएं और भाषण 9 खंडो में संग्रहित हैं. उनकी एक महत्वपूर्णपूर्ण कृति भारत विभाजन के गुनहगार शीर्षक से है.

इसमें भारत की आंतरिक राजनीति और कश्मीर बनाने के सवाल पर कई ऐसी बातें हैं जो आज के भाजपा नेतृत्व को शायद ही रुचिकर लगेगी. भारत में हिंदू और मुसलमान एकसाथ नहीं रह सकते हैं, यह स्थापना सबसे पहले सावरकर ने दी थी. जिन्ना ने तो इसे 1932 और खास कर 1937 के विधासभा के चुनाव के बाद ही गंभीरता से लिया. और अपनी राजनीति को एक तरह से नई दिशा दी. लोहिया की यह पुस्तक उस दौर के इतिहास का बेहद अहम हिस्सा है.

बीबसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और लोहिया धारा के विचारक कुर्बान अली ने उनकी रचनाओं और भाषणों के संग्रह का हवाला दिया है. कुर्बान अली ने कहा है कि लोहिया ने कभी भी आर्टिकल 370 का विरोध नहीं किया. कम से कम उनकी पुसतकों में इसका कहीं उल्लेख नहीं है.

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कश्मीर के मुद्दे पर लगातार उनका यही स्टैंड रहा है कि “कश्मीर के मुद्दे पर लगातार उनका यही स्टैंड रहा है कि कश्मीर के लोगों की रज़ामंदी के ख़िलाफ़ कोई भी काम नहीं होना चाहिए. उनको पाकिस्तान में रहना है या फिर हिंदुस्तान में ये उनका फ़ैसला होना चाहिए.”

‘लोहिया के विचार’ में राम मनोहर लोहिया ख़ुद लिखते हैं “मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा. उनका कहना था कि हिंदुस्तान पाकिस्तान का महासंघ बनना चाहिए, जिसमें कश्मीर चाहे किसी के साथ हो या फिर अलग इकाई बने, लेकिन महासंघ में आये.”

‘शेर-ए-कश्मीर’ कहे जाने जाने वाले शेख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह ने ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की स्थापना की थी, जिसे बाद में जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस का नाम दिया गया. उन्होंने भारत की आज़ादी के बाद कश्मीर के पाकिस्तान में चले जाने का विरोध किया था. साल 1948 में वो जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बने. क़ानूनी रूप से भारत के साथ कश्मीर की स्थिति क्या होगी, इस पर नेहरू के साथ उनकी लंबी चर्चा चली. इसी के बाद अनुच्छेद 370 अस्तित्व में आया.

क़ुर्बान अली बताते हैं कि “लोहिया ने बहुत सफ़ाई के साथ शेख़ अब्दुल्लाह का समर्थन किया है.”

वो कहते हैं, “उनका संबंध लगातार शेख़ अब्दुल्लाह से बना रहा. लोहिया की मौत पर शेख़ अब्दुल्लाह उन्हें श्रद्धांजलि देने आये थे. उस वक़्त उन्होंने कहा था कि लोहिया अकेला ऐसा आदमी था जो कश्मीरियों का दर्द समझता था.”

उन्होंने संसद में भी इसका विरोध किया. 17 सितंबर 1963 को उन्होंने विदेश नीति पर बोलते हुए कश्मीर का ज़िक्र किया था.

क़ुर्बान अली बताते हैं कि “जब नेहरू सरकार ने 1953 में शेख़ अब्दुल्लाह सरकार को बर्ख़ास्त किया तो लोहिया ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. और जब शेख़ अब्दुल्लाह जम्मू की जेल में थे तो उन्होंने अपने दो सांसदों कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया और राम सेवक यादव को उनसे मिलने भेजा. उन्होंने उन्हें एक ख़त दिया था.”

“इस ख़त को बाद में अर्जुन सिंह भदौरिया ने बाद में अपनी आत्मकथा में प्रकाशित किया था. इस ख़त में लिखा था ‘शेख़ साहब हम आपके साथ हैं. हम चाहते हैं कि आप पूरे देश का नेतृत्व करें.”

‘लोहिया के विचार’ में वो ख़ुद लिखते हैं “कश्मीर का सवाल अलग से हल करने की बात चलती है मैं कुछ भी लेने-देने को तैयार नहीं हूं. मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ (भारत पाकिस्तान के महासंघ) के हल नहीं करूंगा. मैं साफ़ कहना चाहता हूं कि अगर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो चाहे कश्मीर हिंदुस्तान में रहे, चाहे पाकिस्तान के साथ रहे. चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बन कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान महासंघ में आये. पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर एक ही ख़ानदान के अंदर बने रहें.”

इस बारे में और रोशनी डालते हुए क़ुर्बान अली कहते हैं, वो बंटवारे के पक्ष में नहीं थे.

वो बताते हैं, “लोहिया ने कहा है कि ये जो बंटवारा हुआ वो अप्राकृतिक था और कभी न कभी वो वक़्त आयेगा जब भारत और पाकिस्तान मिलेंगे क्योंकि दोनों का एक ही इतिहास, भूगोल और संस्कृति है.”

लोहिया का मानना था कि जब तक ये दोनों देश न मिल सकें तब तक इसका एक महासंघ बनना चाहिए.

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