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गठबंधन राजनीति और सत्‍ता पक्ष के तर्क

महागठबंधन को लेकर बीजेपी में बढ़ी बेचैनी

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Faisal Anurag

विपक्षी दलों के एकसाथ आने से भारतीय जनता पार्टी की बेचैनी साफ नजर आने लगी है. प्रधानमंत्री ने इसका मजाक उड़ाया है और इस एकजुटता का कारण मोदी से नफरत बताया है जबकि गडकरी कह रहे है कि भाजपा के डर के कारण ऐसा हो रहा है. सवाल उठता है कि क्‍या भारत में गठबंधन राजनीति का कारण सिर्फ इतना ही है या इसके ठोस सामाजिक, राजनीतिक संदर्भ भी हैं. देखा जाए तो 2014 का चुनाव भी दो गठबंधनों के बीच ही लड़ा गया.

एक तरफ एनडीए थी और वह यूपीए को सत्‍ता से मुक्‍त करने में सफल रही; इसके तीन अहम कारण थे जिसमें एक व्‍यापक राजनीतिक गठबंधन था जिसने मतदाताओं को भरोसा कि वह यूपीए का विकल्‍प है. इसके साथ ही एनडीए ने देशभर में  सामाजिक तोकतों का भी बड़ा गठबंधन बनाया और उनकी सत्‍ताकांक्षा को परवान चढ़ाया.

इसकी मुख्‍य बात यह थी कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्‍व में सामाजिक सत्‍ता के विभिन्‍न घटक एकसाथ आए और उन्‍होंने व्‍यापक गोलबंदी से अपनी ताकत का प्रदर्शन किया. यूपीए की विफलता प्रशानिक स्‍तर की गड़बड़ियों के अलावे इस सामाजिक ताकतों को अपने से विलग कर देना भी था.

भारत में 1967 के बाद से ही लगातार किसी न किसी रूप में गठबंधन राजनीति परवान चढ़ती रही है. इस राजनीति ने ना केवल विपरीत विचारों को एकमंच पर लाने में कामयाबी हासिल की है बल्कि उसने सामाजिक समीकरणों को भी अपने पक्ष में किया है. 9 राज्‍यों में कांग्रेस को सत्‍ता से जब 67 में बेदखल होना पड़ा था तब यही सामाजिक और राजनीतिक हालातों की एकता ने कारगर भूमिका का निर्वाह किया था.

विपक्षी दलों के ग्रैंड एलांयस

1971 में विपक्षी दलों के ग्रैंड एलांयस को अब भी याद किया जाता था. हालांकि वह कांग्रेस को सत्‍ता से बेदखल करने में कारगर नहीं रहा और बुरी तरह उसे हार का सामना करना पड़ा था. लेकिन 1977 में इसी एलांयस ने श्रीमती गांधी को सत्‍ता से बेदखल किया था. हालांकि उसका मुख्‍य कारण अपातकाल की ज्‍यादतियां थी.

लेकिन वोट प्रतिशत बताते हैं कि  विपक्ष ने एकजुट होकर  मुकाबला नहीं किया होता तो कांग्रेस नहीं हारी होती. सबक यह है कि जब सत्‍ता किसी व्यक्ति के आसपास केंद्रित हो जाती है तो उसे हराने के लिए जरूरी है कि चुनावों में विघटित होते वोट को एकजुट किया जाए और उसे केंद्रीत सत्‍ता के खिलाफ एक किया जाए.

1989 भी इसी बात का गवाह है जिसमें कांग्रेस के खिलाफ दक्षिण वाम और सेंटर ने एकजुट मुकाबला किया था. भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में मामूली बहुमत जरूर हासिल की लेकिन उसमें एनडीए के अन्‍य सहयोगी दलों की भूमिका थी. बिहार, यूपी और महाराष्‍ट्र जहां भी उसे भारी सफलता मिली और जिसने सत्‍ता तक उसे पहुंचाया, वो सामाजिक, राजनीतिक गठबंधन के कारण ही संभव हुआ.

भारतीय जनता और सामाजिक ताकतों का समीकरण

इस तथ्‍य को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि भारतीय जनता पार्टी ने सामाजिक ताकतों का समीकरण अपने पक्ष में करने की रणनीति में व्‍यापक हिंदुत्‍व का सहारा लिया है और वह आज भी उसकी बड़ी ताकत है. बावजूद इसके उसके पास 30 से 35 प्रतिशत ही वोट देश में है.

जिसमें पिछले चार सालों में सरकार की विभिन्‍न विफलताओं के कारण गिरावट ही आयी है. 2019 में भाजपा की सबसे बडी चुनौती यही है कि उसने 2014 में जिस सामाजिक समीकरण को हिंदुत्‍व के आसपास गोलबंद किया था क्‍या उसे वह बचाए रख सकती है.

विश्‍लेषक मानते हैं कि इसमें दरार साफ दिख रही है और गुजरात, मध्‍य प्रदेश तथा राजस्‍थान में भी उसकी ताकत घटी है. इस स्थिति में भाजपा अपने गठबंधन को बनाए रखने का हर प्रयास कर रही है लेकिन नायडू ने जिस तरह उसे झटका दिया है, उसका असर अन्‍य छोटे दलों की भाषा में दिख रहा है.

साथ ही सत्‍ता के केंद्रित होने और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के कारण विपक्ष को एकसाथ आने का आधार मजबूत होता जा रहा है. भाजपा  का तर्क है कि विपक्ष के पास मोदी विरोध के अलावे कोई एजेंडा नहीं है. लेकिन यही भाजपा की उस कमजोरी का इजहार भी है जो चार साल के विकास के संदर्भ में अपने ही वोट आधार को एकसाथ रख पाने के लिए एड़ी चोटी एक कर रही है.

यानी युवाओं और किसानों की नारजगी के कारण भाजपा की बेचैनी साफ दिखने लगी है और विपक्ष राजनीतिक कारणों के साथ आर्थिक विफलताओं को अपनी एकजुटता का आधार बनाने में लगा है.

ठोस आधार के बाद भी विपक्ष की एकजुटता का सवाल उतना आसान नहीं है इसके कई सामाजिक और राजनीतिक कारण है. नेतृत्‍व का कारण तो इसमें प्रमुख नहीं है लेकिन छोटे दलों के अस्तित्‍व का सवाल जिस तरह एनडीए के अंदर है ठीक उसी तरह विपक्ष के साथ भी है.

भारत में गठबंधन राजनीति के लिए किसी ठोस वैचारिक आधार की जरूरत आज तक प्रमुखता से नहीं देखी गयी है. यही कारण है कि गठबंधनों को बड़े दलों ने अपने हिसाब से संचालित किया है और संघीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की अस्मिता के सवालों को नजरअंदाज किया है.

बावजूद इसके भारत गठबंधन राजनीतिक दौर से बाहर झांकने की कोशिश भी नहीं कर रहा है. गठबंधन राजनीति में किसी एक दल के मजबूत होने से केंद्रीकरण की प्रक्रिया भी बढ़ती है. यह 2014 के बाद से लगातार प्रमाणित होता आया है और उससे एक तानाशाही जो की परोक्ष ही रहती है, उभरती है.

अंबेडकर ने कहा था कि जब तक भारतीय समाज में समानता और इंसाफ मजबूत नहीं होगा भारतीय लोकतंत्र की सफलता पर संदेह बना ही रहेगा. अंबेडकर के इस कथन में सच्‍चाई है और इसे ज्‍यादा देरतक नजरअंदाज करना लोकतंत्र के लिए घातक ही साबित होगा. हो यह रहा है कि समाजी तौर पर समानता जिस गति से आनी चाहिए नहीं आ रही है.

देखा जा रहा है कि समाजों के भीतर पुरातन धारणाएं बढ़ रहीं हैं और वे सामाजिक न्‍याय की बुनियाद को ही कमजोर कर रही हैं. इस हालात में सत्‍ता विरोधी व्‍यापक गठबंधन का बनना ना तो किसी व्‍यक्ति के नफरत के कारण ही संभव है. यह गठबंधन यदि उभरता है तो इसके ठोस सामाजिक-राजनीतिक कारक ही हैं.

इस तथ्‍य को भी देखने की जरूरत है कि क्‍या भारत की राजनीति वर्तमान गतिरोध को तोड़कर एक व्‍यापक विकल्‍प की ओर जाएगी अथवा नहीं.

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