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  लोढ़ा समिति बनाम बीसीसीआई का मीडिया खेल कहीं से न्याय संगत नहीं

जब कोई भी मामला न्यायालय में विचाराधीन होता है तो अमूमन उसमें शामिल पक्ष मीडिया से बात करने में असहज महसूस करता हैं कि मामला Subjudice है, इसमें टिप्पणी करना न्यायोचित नहीं होगा?

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Sunil Singh

जब कोई भी मामला न्यायालय में विचाराधीन होता है तो अमूमन उसमें शामिल पक्ष मीडिया से बात करने में असहज महसूस करता हैं कि मामला Subjudice है, इसमें टिप्पणी करना न्यायोचित नहीं होगा? मीडिया में भी इन दिनों टीआरपी और सर्कुलेशन की प्रतिस्पर्धा व्याप्त है. देश के अंदर क्रिकेट सबसे ज्यादा पॉपुलर खेल है. ज्यादातर मीडिया के मित्र इस खेल के दीवाने हैं, जो वरिष्ठ पत्रकार रजत शर्मा के दिल्ली जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बनने से प्रमाणित होता है. यह भी कटु सत़्य है कि सभी राज्य संघों में खिलाड़ियों से अधिक गैर खिलाड़ियों की रुचि इस खेल और संघ से हासिल SMG यानी Status,Money, Glamour की ओर इशारा करती है. आजकल जिस प्रकार बीसीसीआई बनाम  लोढ़ा समिति की सिफारिश के अनुपालन का मामला मीडिया के माध्यम से खेला जा रहा है, वह कहीं से न्याय संगत नहीं है.

18 जुलाई 2016 को  सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने जो आदेश पारित किया उसके अनुपालन के दो वर्ष पूरे हो गये हैं. यानी दूसरी वर्षगांठ है, लेकिन अभी भी मुद्दा लटका हुआ है. प्रशासकीय समिति और प्रभारी ऑफिस बेयरर बीसीसीआई दोनों माननीय न्यायालय के आदेश से पद पर विराजमान हैं. ये दोनों अपनी जिम्मेवारी से विमुख होकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर अन्य दूसरे काम कर रहे हैं. जिन बिन्दुओं पर इनको आपत्ति है, वो समयानुसार अलग तरीके से पेश की जाती रही है. इन्हीं बिन्दुओं पर गौर से नजर डालने पर इनके नूरा कुश्ती को दर्शाता है.

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-70 वर्ष से अधिक उम्र वाले पदाधिकारी को लोढ़ा समिति की सिफारिश में अयोग्य ठहराया गया है. Review/Curative Petition खारिज होने के बाद भी बहुत सारे पदाधिकारी बीसीसीआई की बैठक में शामिल किये गये हैं. उम्र के मुद्दे को लेकर शुरूआती दौर में बीसीसीआई की ओर से जोरदार विरोध हुआ था. हर मीटिंग में चर्चा हुई.  अन्तत: एन श्रीनिवासन, निरंजन शाह, शरद पवार को पद छोड़ना पड़ा. अभी प्रशासकीय समिति के अध्यक्ष श्री बिनोद राय मई 2018 में जैसे ही 70 वर्ष से अधिक उम्र के हुए बीसीसीआई की ओर से जोरदार विरोध शुरू हुआ कि उन्हें पद छोड़ देना चाहिए.  उसके बाद 3 वर्ष के बीसीसीआई में कार्यकाल पूरा हो जाने पर अपने 7th- 8th स्टेटस रिपोर्ट में  प्रशासकीय समिति ने प्रभारी ऑफिस बेयरर को पद से हटाने का मुद्दा  न्यायालय में रखा. सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में  लोढ़ा समिति की सिफारिश के अनुपालन हेतू  छह महीने का समय ही निर्धारित किया गया था, तब इतना वक्त क्यों लग रहा है?

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-दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा एक राज्य एक वोट का है. न्यायालय के आदेश के अनुसार सभी बीसीसीआई की क्रिकेट खेलने वाली इकाई को रखा गया है, खेलने से वंचित नहीं किया गया है.  लेकिन जिन राज्यों के अन्दर एक से अधिक संघ हैं, उन्हे रोटेशन पॉलिसी के तहत एक समय एक ही वोट देने का अधिकार है. जब बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ, उत्तराखंड पूर्वांचल राज्यों की मान्यता के सवाल पर बीसीसीआई में मामला उठाया जा रहा था, तब इन्ही राज्य संघों के पदाधिकारी के द्वारा यह दलील दी जाती रही है कि एक राज्य के अन्दर अनेक क्रिकेट संघ और देश के अन्दर तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला बिहार राज्य और अन्य संघों के साथ दोयम दर्जे की राजनीति हो रही है.

-अभी क्रिकेट नहीं खेलने वाली बीसीसीआई की मान्यता प्राप्त इकाई की दलील देकर  लोढ़ा समिति की सिफारिश को अवरूद्ध रखा गया है. क्रिकेट नहीं खेलने वाले मान्यता प्राप्त संघ  को वोट के अधिकार से वंचित करने की बात कहां से गलत है ? जब मामला स्पष्ट होने लगा तो बिहार के निबंधन के मामले को लेकर फिर आरोप- प्रत्यारोप शुरू हो गये पदाधिकारी थाली की बैंगन की तरह इधर से उधर लुढ़क रहे हैं. जिन पूर्व पदाधिकारियों को सर्वोच्च न्यायालय ने दायर याचिका की सुनवाई के दौरान अयोग्य करार कर दिया, वे अब फिर से विश्व के सर्वश्रेष्ठ प्रशासक हो गये. जिस बिहार राज्य क्रिकेट संघ से खेलकर कई खिलाड़ियों ने राज्य का प्रतिनिधित्व किया और नौकरी पायी, उसकी मान्यता पर प्रश्न किये जाने लगे ? यदि संघ गलत है तो उसके द्वारा निर्गत सर्टिफिकेट भी गलत होगा ?

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– खिलाड़ियों की अनुबन्ध राशि को बढ़ाने या महिला क्रिकेट का मामला हो, न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिये हैं. खिलाड़ियों की हित को आगे रखकर संघ संचालित हो. अभी दोनों  पक्ष इस मामले को लेकर उलझे रहे और अनुपालन का मुद्दा गौण हो गया. चयन समिति में 3 की जगह 5 चयनकर्ता की नियुक्ति का है यह एक टेक्निकल बात है. सर्वोच्च न्यायालय ने क्षेत्रीयवाद को रोकने और एकरूपता लाने के प्रयास से जोनल रोटेशन पालिसी को समाप्त किया है. सारे राज्य संघों में चुनाव प्रणाली में भी एकरूपता लाने की जरूरत है. सिर्फ खेलने वाले सदस्य संघ को वोट का अधिकार देकर प्रॉक्सी वोट को भी रोकने की जरूरत है.

– कूलिंग ऑफ पीरियड के विरोध के पीछे का जो मुख्य उद्देश्य था कि वर्तमान पदाधिकारी कैसे पद पर लम्बे समय तक कार्यरत रह सके और बीसीसीआई के संसाधनों का उपयोग कर सके. अब कूलिंग ऑफ पीरियड तीन साल के बाद पद छोड़ने का मामला जब सामने आया तो पदाधिकारियों को सांप सूंघ गया. बीसीसीआई का कार्यकाल 3 वर्ष का है, लेकिन उससे मान्यता प्राप्त करने वाले अधिकांश राज्य संघ ने अपना कार्यकाल 4 वर्षों का कर लिया है. अब इस बात पर बहस हो रही है की कूलिंग ऑफ पीरियड खत्म हो और विराजमान पदाधिकारी जिस पद पर हैं, उससे अलग दूसरे पद पर चुनाव लड़ सकते हैं.

-यह मंशा साफ दर्शा रही है की हम ही लोग दोबारा पद हासिल कर सके. यह नहीं भूलना चाहिए कि ये वही पदाधिकारी हैं जो अपने गृह राज्य संघ में मनमर्जी से नियम संशोधित कर संघ पर कब्जा करने में सफल हो पाये हैं. बीसीसीआई की हर बैठक में राज्य संघ के निर्वाचित पदाधिकारी को बैठने का नियम है. लेकिन मनोनीत लोग बैठकर निर्णय लेते रहे? क्या इनके द्वारा मनोनीत पदाधिकारी इन लोगों के विरोध में जायेंगे?

– चयन समिति में 3 की जगह 5 सदस्यों का मामला टेक्निकल मामला है. इस पर विचार होना चाहिए.  लेकिन अन्य मामले इन सबों पर भारी रहते हैं. नौकरी करने वाले पदाधिकारी अपने राज्य सरकार के आदेश से खेल संघो में शामिल होते हैं. जहां 65 वर्ष रिटायर्ड होने का उम्र है. वहां आपत्ति दर्ज नही करते हैं. बीसीसीआई में 70 वर्ष है, तो भी आपत्तिजनक है. कई लोग तो सरकारी सेवा से voluntary retirement के बाद बीसीसीआई के पदाधिकारी बने हुए हैं. इस तरह यह मामला सोसाईटी/कंपनी एक्ट से अलग हटकर संघ में अपना आधिपत्य स्थापित करने का है.

-देश की करोड़ों खेल प्रेमी जनता सभी पहलुओं पर नजर रख रही है. हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में जाने जाते हैं. जहां क्रिकेट को धर्म के रूप में पूजा जाता है. हमारे खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो उसका श्रेय पदाधिकारी लेने में तत्पर दिखते हैं. लेकिन अपने को खुद एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थापित करने में अक्षम साबित होते हैं. धनी खेल संघ के खेल के उपयोग की बड़ी राशि न्यायालयों में पानी की तरह  खर्च की जा रही है और मीडिया/प्रेस कॉन्फ्रेंस  के माध्यम से सच्चाई से विमुख आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला रहा है. यह नहीं भूलना चाहिए कि सिफारिश का आदेश मैच फिक्सिंग के केस से छनकर आया है. सभी पहलुओं को माननीय ऩ्यायालय ने समय देकर सुना है. पूर्व क्रिकेटर, कप्तान, खेल प्रशासक, खेल पत्रकार, न्यायविद, बीसीसीआई के पदाधिकारियों से विचार-विमर्श कर लंबे समय के बाद यह मसौदा तैयार किया गया है.

 लेखक लंबे समय तक झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन में पदाधिकारी रहे हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं. 

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