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लॉकडाउन फेल, इससे जानें बचीं नहीं बल्कि इसके कारण मरने वालों की संख्या बढ़ गयी : नोबेल विजेता वैज्ञानिक

London :  भारत समेत दुनिया के कई देशों में लागू लॉकडाउन को अब चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है. दुनिया भर की सरकारों ने लॉकडाउन को कोरोना से मुक्ति का सबसे अचूक हथियार बताया था. पर, अब कोरोना खत्म होने से पहले ही इसे हटाया जाने लगा है. हालांकि ऐसा नहीं है कि जिन देशों में लॉकडाउन खत्म किया जा रहा है, वहां कोरोना से मुक्ति पा ली गयी है. या लॉकडाउन की वजह से उनको मुक्ति मिली. बल्कि उल्टा ही हुआ. लॉकडाउन करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई. करोड़ों की संख्या में लोग बेरोजगार हुए. कोरोना के अलावा दूसरे बीमारियों से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ी.

अब इस बात का आकलन किया जा रहा है कि लॉकडाउन से कुछ फायदा हुआ या नहीं. क्योंकि भारत जैसे देश में लॉकडाउन के बावजूद मरीजों की संख्या लगातार बढ़ी है. सिलसिला अभी तक जारी है. दुनिया के कई देशों में भी कोरोना के मामले बढ़ने की रफ्तार पहले से तेज हुई. तब लॉकडाउन को हटाया जाने लगा है. इससे यह भी साफ होता जा रहा है कि दुनिया भर की सरकारें अपनी विफलता को छिपाने के लिये लॉकडाउन घोषित किया. और अब हाथ खड़े कर रहें हैं.

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लॉकडाउन की वजह से जिंदगी बची नहीं बल्कि लोगों की मौतें हुईं. ये कहना है कि नोबेल पुरष्कार विजेता वैज्ञानिक माइकल लेविट का. यूके के टेलीग्राफ अखबार की एक रपट की मुताबिक स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लेविट ने माना है कि लोगों को घर में बंद रखने का फैसला, पैनिक की वजह से लिया गया. इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था. गौर करने वाली बात यह है कु भारत समेत अधिकांश देशों की सरकार पर यह आरोप लग रहे हैं कि गलत तरीके से लॉकडाउन को लागू किया गया. जिस कारण लोगों, खास कर मजदूरों को अमानवीय परिस्थितियों से गुजरना पड़ा.

गौरतलब है कि माइकल लेविट कोरोना महामारी फैलने को लेकर आरंभिक अनुमान लगाने में सही साबित हुए थे. उन्होंने शुरूआत में ही बताया था कि लॉकडाउन इसका इलाज नहीं है. इसका कोई फायदा नहीं होने वाला. उन्होंने यह भी बताया था कि कोरोना संक्रमण रोकने के लिये ज्यादा ये ज्यादा जांच ही किसी भी देश को सफल बनायेगा.


‪‬ बहरहाल इस राय के आने के बाद, दुनियाभर में लॉकडाउन लागू करने या न करने को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है.  सराकारों को कटघरे में खड़ा किया जाने लगा है.

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बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी लॉकडाउन का विरोध करते रहे हैं. स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने भी लॉकडाउन के खिलाफ बोला था. उन्होंने इसे तार्किक नहीं बताया था.

वहीं अब अमेरिका के संक्रामक रोग विशेषज्ञ एंथनी फौसी ने भी कह दिया है कि लंबे समय तक लॉकडाउन रखने से ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई करना फिर मुश्किल हो जायेगा. भविष्य में इससे औऱ बड़े सकंट खड़े होंगे. लोगों, खास कर गरीब और मीडिल क्लास के लोगों के सामने जीवन यापन की समस्या पैदा हो जायेगी. आर्थिक हालात खराब होने पर दुनिया के कई देशों के शासक निरंकुश बन सकते हैं.

ब्रिटेन में किए गए लॉकडाउन को लेकर लेविट ने कहा कि इंपेरियल कॉलेज के एक प्रोफेसर की मॉडलिंग के आधार पर सरकार ने कथित हर्ड इम्यूनिटी पॉलिसी को रद्द कर दिया.

अफरातफरी फैलने के डर से लॉकडाउन का फैसला लिया. उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर दुनियाभर के नेताओं के बीच ‘पैनिक वायरस’ फैल गया था. इसे समझने में भूल हुई. देखा जाये तो वैज्ञानिकों की बात पिरथम दृष्टया सही लग रहा है.

एक और सवाल यह उठ रहा है कोरोना से पहले दुनिया के कई देशों की आर्थिक स्थिति खराब थी. ऐसा सरकारों की गलत नीतियों के कारण हुआ. ऐसे हालात वाले देशों के शासक ने अपनी आर्थिक विफलता को छिपाने के लिये कोरोना को सीढ़ी बनाया. गैरनियोजित तरीके से लॉकडाउन लागू किया. लोगों को जागरूक करने से ज्यादा डराया. और अपने देश की आर्थिक हालात को खराब कर लिया. आने वाले दिनों में ऐसी सरकारें आर्थिक नाकामयाबी का दोष कोरोना को देंगे.

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