JharkhandRanchi

#Lockdown में 37 हजार स्ट्रीट वेंडरों के सामने गहराया रोजगार का सवाल, केंद्र ने राज्य सरकार से मांगी राय 

विज्ञापन

Ranchi : असुविधा और अभावों के बीच असुरक्षित भविष्य की दुनिया में जीने वाले राज्य के 37 हजार स्ट्रीट वेंडरों के सामने कोरोना काल ने मुसीबतें खड़ी कर दी हैं. रोजी रोजगार के अवसर सीमित होने के कारण और बढ़ते लॉकडाउन से उनके लिए लगातार चिंता के सवाल बढ़ रहे हैं.

राज्य के स्ट्रीट वेंडरों में से 75 फीसदी से अधिक के पास राशन कार्ड तक की सुविधा नहीं है. ऐसे में कई वेंडरों के सामने अब भुखमरी के सवाल खड़े होने लगे हैं. इधर केंद्र सरकार ने झारखंड सरकार से स्ट्रीट वेंडरों को मदद किये जाने के मसले पर उपयोगी सुझाव की मांग की है.

इसे भी पढ़ेंः नोएडा के एक प्राइवेट अस्पताल के खिलाफ लापरवाही से मौत का मामला दर्ज, जांच के लिए बनी उच्च स्तरीय कमिटी

रांची में हैं 5901 स्ट्रीट वेंडर्स

एनयूएलएम (राष्ट्रीय शहरी गरीबी उन्मूलन मिशन) के अनुसार झारखंड में 2019 में किये गए एक सर्वे के अनुसार राज्य में 37,129 स्ट्रीट वेंडर्स हैं. राज्य के 44 नगर निकायों में हुए सर्वे के मुताबिक सबसे अधिक वेंडर्स रांची में (5901) हैं. इसके बाद जमशेदपुर में 4391 और धनबाद में 3978 वेंडर्स हैं. हालांकि सर्वे का पूरा काम अभी नहीं किया जा सका है.

लॉकडाउन के बाद इस पर काम बढ़ेगा. झारखंड शिक्षित बेरोजगार फुटपाथ दुकानदार संघ के अध्यक्ष कौशल किशोर के अनुसार 2010 में हुए एक सर्वे के अनुसार सभी जिलों में कुल मिलकर 4 लाख 22 हजार से अधिक स्ट्रीट वेंडर्स की पहचान की गयी थी. वर्तमान में रांची में 5000 से अधिक वेंडर्स की पहचान औपचारिक रूप से (सर्वे में) की जा चुकी है. यह आंकड़ा केवल रांची में ही 30,000 तक का है.

इसे भी पढ़ेंः #Dhullu तेरे कारण : रघुवर राज में बाघमारा में बढ़ी विधायक ढुल्लू महतो की मनमानी, एफआइआर करने से भी परहेज करती रही पुलिस

केंद्र ने वेंडरों को 50 हजार तक की मदद पर मांगी है राय

केंद्र सरकार ने कुछ दिनों पहले एनयूएलएम, झारखंड से स्ट्रीट वेंडरों की बेहतरी के लिए राय मांगी है. केंद्र ने निबंधित वेंडरों को 3 साल तक 50 हजार रुपये का लोन दिए जाने के संबंध में विस्तृत सुझाव मांगे हैं. जिनके नाम सर्वे में छुट गए हैं, उनके नाम भी वेंडर्स लिस्ट में जोड़ने के संबंध में कहा है.

ऐसे कई फेरी वाले हैं जो गांवों से शहरों में आकर फेरी का काम करके वापस चले जाते हैं. उनके कल्याण के लिए किस तरह से पहल हो सकती है, इस बारे में भी विचार देने को कहा है.

टाउन वेंडिंग समिति की बैठक नहीं होने से नुकसान

कौशल किशोर के मुताबिक रांची नगर निगम की ओर से टाउन वेंडिंग समिति बनायी जा चुकी है. पर लॉकडाउन में स्ट्रीट वेंडरों के सामने बढ़ती मुसीबतों के बावजूद इसकी बैठक नगर निगम द्वारा नहीं बुलायी गयी है. ऐसे में वेंडरों के हितों के लिए कोई पहल निगम और नगर विकास विभाग के स्तर से नहीं हो रही. रोजी रोटी का रास्ता ठप होने से उनके सामने मुसीबतें आने लगी हैं. 75 फीसदी ऐसे हैं जिनके पास राशन कार्ड तक नहीं है.

चूंकि  ज्यादातर फेरी वालों का अपना कोई ठिकाना रहता नहीं. इससे कार्ड बनवाना चुनौती भरा होता है. तंगहाली की ओर बढ़ रहे फेरी वालों को संघ के द्वारा 5-5 किलो चावल, दाल, नमक वगैरह मुहैया कराने की पहल जारी है. कई जगहों पर एनजीओ से भी सहयोग लिया जा रहा.

क्या है स्ट्रीट वेंडर्स की भूमिका 

किसी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, स्थानीय बाजार या सड़क किनारे खड़े होकर या फेरी लगाकर दिन-प्रतिदिन के कार्यों में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं को बेचकर आजीविका चलाने वाले को पथ विक्रेता (स्ट्रीट वेंडर्स) कहा जाता है. ये वेंडर्स स्वरोजगार के माध्यम से न केवल अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं बल्कि उपभोक्ताओं को सस्ती दर पर उनकी सहूलियत वाली जगह पर सामान उपलब्ध कराकर देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक देश में करीब 15 करोड़ लोग ऐसे हैं जो सीधे या परोक्ष रूप से स्ट्रीट वेंडिंग के कार्य से जुड़े हुए हैं. इतना होने के बावजूद भी रेहड़ी पटरी व्यवसायी और फेरीवाले समाज में हमेशा से हाशिये पर रहे हैं. आजीविका कमाने और दूसरों के लिए रोजगार पैदा करने वाले ये छोटे दुकानदार और फेरीवाले तमाम सरकारी कल्याणकारी सुविधाओं जैसे सरकारी ऋण, सुरक्षा बीमा योजनाओं आदि से भी वंचित रह जाते हैं.

इसे भी पढ़ेंः प्रधानमंत्री वित्तीय संकट को लेकर राज्यों को मदद देने के लिए वचनबद्ध नहीं हैं : नारायण सामी

advt
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: