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पेयजल और स्वच्छता विभाग में अभियंता प्रमुख पद को लेकर तिकड़म शुरू

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  • गलत तरीके से मुख्य अभियंता बने श्वेताभ कुमार दौड़ में सबसे आगे
  • विभाग का तर्क प्रमोशन में आरोप लगने की बातों को नहीं किया जाता शामिल, दोष सिद्ध होने पर होती है कार्रवाई

Deepak

Ranchi: पेयजल और स्वच्छता विभाग में अभियंता प्रमुख के पद को लेकर तिकड़मबाजी शुरू हो गयी है. गलत तरीके से मुख्य अभियंता में प्रोन्नत हुए श्वेताभ कुमार अभियंता प्रमुख के पद की दौड़ में सबसे आगे चल रहे हैं. फिलहाल तनवीर अख्तर अभियंता प्रमुख हैं, और 31 जनवरी को सेवानिवृत हो रहे हैं. इन दोनों को नवंबर माह में मुख्य अभियंता पद पर प्रोन्नति दी गयी थी.

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कार्रवाई संबंधी विभागीय मंत्री द्वारा जारी पत्र की प्रति

रुक्का डैम की बाउंड्री गिरने का मामला लंबित

यहां यह बताते चलें कि निगरानी में श्वेताभ कुमार के खिलाफ अक्षय लाल प्रसाद द्वारा की गयी शिकायत को लेकर मामला लंबित है. मामला धनबाद शहरी जलापूर्ति से जुड़ा हुआ है. वहीं रांची के सवर्णरेखा शीर्ष कार्य प्रमंडल से संबंधित रुक्का डैम में 14 करोड़ की लागत से बने बाउंड्री वाल के ढहने के मामले में भी श्वेताभ कुमार दोषी हैं. इनके खिलाफ विभागीय मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी ने विशेष जांच दल गठित कर कार्रवाई करने की अनुशंसा की थी. अभियंता प्रमुख की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने जांच भी की है. लेकिन इस रिपोर्ट को दबा दिया गया है.

विभाग में श्वेताभ कुमार के अलावा नियमित मुख्य अभियंता के रूप में हीरा लाल प्रसाद, सृष्टिधर मोदी भी हैं. हीरा लाल प्रसाद और श्वेताभ कुमार 1987 बैच के अधिकारी हैं, जबकि सृष्टिधर मोदी 1989 बैच के हैं.

चूंकि अभियंता प्रमुख का पद एकल पद है, इसलिए यहां पर आरक्षण रोस्टर मान्य नहीं होता है. इसका लाभ ही श्वेताभ कुमार को दिलाने की कोशिश की जा रही है.

प्रमोशन में तीन बातों का रखा जाता है ख्याल- विभाग

विभाग के संयुक्त सचिव अभय नंदन अंबष्ट का कहना है कि प्रोन्नति में तीन बातों का ख्याल रखा जाता है. इसमें यह देखा जाता है कि क्या किसी अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही तो नहीं चल रही है. किसी मामले में प्रोन्नति पानेवाले अधिकारी के खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज तो नहीं है या अभियोजन चलाने की स्वीकृति तो नहीं दी गयी है. इसके अलावा निगरानी विभाग से स्वच्छता प्रमाण पत्र मिला है अथवा नहीं. श्वेताभ कुमार के मामले में निगरानी में मामला विचाराधीन है. पर दोष साबित नहीं हुआ है.

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