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बदलते दौर की महिलाओं की जीवन शैली का सजीव चित्रण करता है “डेडलॉक”

साथ ही साथ अपनी कहानी के माध्यम से कुछ सन्देश भी अपने पाठकों को दिया है की हमें स्त्री का सम्मान करना चाहिए.

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Sanjeev Shekhar:

इस उपन्यास का शीर्षक डेडलॉक पढ़ते ही कुछ सवाल स्वाभाविक रूप से जेहन में कौंध जाते है कि गतिरोध किस अवस्था का, किसका कब और कैसे ? मन कौतुहल से भर जाता है कि किस गतिरोध की बात लेखक ने की है. यह उपन्यास विवाहोपरांत प्रेम प्रसंग पर आधारित है, जो मूलतः आज के आधुनिक समाज की महिलाओं की मनःस्तिथि विचार एवं उनकी आधुनक जीवन शैली पर केंद्रित है.

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आज की महिला बेचारगी के लिए विवश नहीं

लेखक ने इस उपन्यास की रूपरेखा सिनेमाई रखा है.  इसमें मीशा जो एक स्त्री है जिसके चरित्र द्वारा आधुनिक समाज में आज की महिलाओं  के जीवन शैली को दर्शाने का एक सार्थक प्रयास किया गया है. मीशा के माध्यम से बताया है कि आज की महिला न तो परंपरागत ख्यालों की है और न ही बेचारगी के लिए विवश है. वो अब इस बेचारगी की सामाजिक और मानसिक अवस्था से कहीं ऊपर उठ चुकी है. महिला  सशक्तिकरण के इस दौर में वह पुरूष प्रधान समाज में मात्र भोग-विलाश की वस्तु समझी जाने वाली नहीं है. वो अब अपनी इस मानसिकता को साबित कर रही है की महिलाओं का भी अपना एक व्यक्तिगत अस्तित्व है, सिर्फ वह त्याग और भोग की वास्तु नहीं है, अपितु उनको भी पुरुषो को त्यागने एवं अपनी मर्जी से भोगने का हक है.

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महिलाओं  का अपना भी एक व्यक्तिगत अस्तित्व है

आज के समाज में लिव- इन- रिलेशनशिप एवं वन- नाईट- स्टैंड जैसे स्त्री-पुरुष के बीच के संबंध इसी मानसिकता का प्रतिफल है. लेखक ने इस बात का भी संदेश दिया है कि वर्तमान में महिलाओं की इस मानसिकता का कारण उनकी बौद्धिक एवं आर्थिक सशक्तिकरण है.  साथ ही साथ यह भी बताया है की स्त्री ईश्वर की एक ऐसी रचना है जो अतिसंवेदनशील एवं प्रज्ञावान है, जिसमें प्राकृतिक रूप से निर्माण की प्रवृति अन्तर्निहित है चाहे घर हो या समाज. हम भूल चुके हैं की महिलाओं का अपना भी एक व्यक्तिगत अस्तित्व है, उनको भी सोचने एवं अपनी इच्छानुसार कुछ करने का अधिकार है.

यह उपन्यास सेक्स एवं इसकी परंपरागत मांग के प्रति समकालीन महिलाओं के दृष्टिकोण पर भी व्यापक प्रकाश डालता है, साथ ही साथ जेहन में कुछ सवाल छोड़ जाता है. जैसे पुरुष प्रधान समाज में महिला-पुरुष के बीच संबंध का स्वरुप हो या महिला समानता चाहे वह किसी भी वर्ग विशेष की हो.

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महिलाओं की पाश्चात्य जीवन शैली

यह उपन्यास महिलाओं की पाश्चात्य जीवन शैली को दर्शाता है ऐसा प्रतीत होता है. जहां महिलाएं पूर्णतः अपनी मर्जी का जीवन जीती है, चाहे उनका व्यक्तिगत जीवन हो या विवाहपूर्व या विवाहोपरांत का स्त्री पुरुष के बीच का सम्बन्ध वो कभी भी किसी भी समय व परिस्थिति पर अपना निर्णय स्वयं लेती है और अपना जीवन अपने विचारों और अपने तरीके से जीती है.  हालांकि सामाजिक संक्रमण और परसंस्कृतिग्रहण के इस दौर में ऐसी आधुनिक और व्यक्तिगत विचारधारा पर आधारित जीवन शैली को अपनाने  वाली  महिलाओं का वर्ग विकसित भारतीय समाज में देखने को मिलने लगा है. बावजूद  इसके आज भी हमारा समाज जहां एक ओर महिलाओं के प्रति अपनी रूढ़िवादिता के लिए जाना जाता है वहीं महिलाओं के सम्मान एवं स्त्री  पूजक के रूप में भी जाना जाता है.

संजीव शेखर बहरहाल लेखक ने बदलते सामाजिक दौर की महिलाओं के विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं अपनी शर्तों पर आधारित जीवन शैली का सजीव चित्रण किया है. साथ ही साथ अपनी कहानी के माध्यम से कुछ सन्देश भी अपने पाठकों को दिया है की हमें स्त्री का सम्मान करना चाहिए. हमें नहीं भूलना चाहिए की समाज में महिलाओं का भी अपना व्यक्तिगत अस्तित्व होता है, हमें उनकी विचारों, भावनाओं, अनुभूतियों एवं इच्छाओं का हर संभव आदर व सम्मान करना चाहिए. क्यूंकि स्त्री ईश्वर की एक ऐसी रचना है जो अतिसंवेदनशील, प्रज्ञावान एवं जननी है.

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