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जीवन वेद : नैतिकता सामंजस्यपूर्ण जीवन बिताने का प्रयत्न

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श्री श्री आनंदमूर्ति जी

नैतिकता साधना की आधार भूमि है. पर यह याद रखना चाहिए कि नैतिकता साधक का चरम लक्ष्य नहीं है और Moralist (नीतिवादी) होना दूसरों के लिए भले ही चरम आदर्श हो पर साधक के लिए जीवन में कोई महत्वपूर्ण अवस्था नहीं है. साधना के प्रारंभ में ही मानसिक सामंजस्य की आवश्यकता होती है. इसी मानसिक सामंजस्य का नाम नैतिकता या Morality है.

बहुत बार लोग कहते हैं, मैं धर्म- कर्म कुछ नहीं समझता, सत्य के पथ पर रहूंगा, किसी का नुकसान नही करूंगा, झूठ नही बोलूंगा — बस इतना ही यथेष्ट है और इससे अधिक कुछ करने की या सीखने की आवश्यकता नहीं है. नैतिकता सामंजस्यपूर्ण जीवन बिताने का प्रयत्न है. इसे स्थिर शक्ति कहने की अपेक्षा गतिशील शक्ति कहना कहीं ठीक होगा, क्योंकि इसमें प्रतिक्षण अपने अंदर के विरोधी भावों के विरुद्ध लड़कर बाहरी साम्य ठीक रखना पड़ता है.

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यह अंदर और बाहर की साम्यवस्था नहीं है. बाहर के प्रलोभन में पड़कर यदि भीतरी असाम्य खूब बढ़ जाय और इस कारण मानसिक विकृति उग्र भाव से दिख पड़े, तो लड़ने की भीतरी शक्ति भी हार जा सकती है और फलस्वरूप बाहरी साम्य या दिखावटी नैतिकता किसी भी क्षण टूट
जा सकती है. इसलिए नीतिवाद कोई लक्ष्य तो नहीं है, कोई स्थिर शक्ति भी नहीं. नीतिवादी कि नीति तो किसी भी क्षण नष्ट हो जा सकती है. जो नीतिवादी दो रुपये का घूस का लोभ रोक सका है, वह दो लाख रुपये घूस का भी लोभ रोक सकेगा यह बात बात दृढ़तापूर्वक नहीं कही जा सकती. इतना होने पर भी मनुष्य के जीवन में नीतिवाद एकदम मूल्यहीन नहीं है. नीतिवाद अच्छे नागरिक का लक्षण है और साधना –
मार्ग की तो यहां से यात्रा प्रारंभ होती है.

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