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LIC-IDBI सौदा : यही हाल रहा तो आप और हम जैसे लोग सालों से की जा रही अपनी बचत से हाथ धो बैठेंगे

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Girish Malviya 

Bangalore: एलआईसी यानी भारतीय जीवन बीमा निगम भारत में इंश्योरेंस सेक्टर का पर्याय रहा है. बीमा क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खोले जाने के बाद भी एलआईसी का जीवन बीमा क्षेत्र में आज भी 76.99 प्रतिशत हिस्सा है.

1956 में स्थापित एलआईसी आज भी भारत की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी ही नहीं है, अपितु यह देश की सबसे बड़ी निवेशक कंपनी भी है. जिसका अधिपत्य भारत सरकार के पास है. इसके लगभग 2048 ऑफिस भारत में हैं और इसके एजेंटों की संख्या 10 लाख बताई जाती है. यदि आज एलआईसी शेयर बाजारों में सूचीबद्ध होती है, तो बाजार पूंजीकरण के लिहाज से यह देश की सबसे बड़ी मूल्यवान कंपनी होगी.  एलआईसी की संपत्ति  देश की जीडीपी का 15 प्रतिशत से अधिक है. सरकार के लिए रिजर्व बैंक के बाद एलआईसी सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली सरकारी कंपनी है. निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज भी मुनाफा कमाने के हिसाब में एलआईसी से पीछे ही है.

मोदी सरकार ने भारी घाटे और खराब कर्ज के बोझ तले दबे सरकारी बैंकों में सुधार की प्रक्रिया के तहत सबसे पहले आईडीबीआई बैंक में 86 फीसदी हिस्सेदारी को एलआईसी को बेचने का मन बना लिया है. लेकिन एलआईसी अकेले आईडीबीआई के शेयर नहीं खरीद सकती. उस पर किसी एक कंपनी में अधिकतम 15 फीसदी शेयर खरीदने की शर्त लागू है और एलआईसी के पास आईडीबीआई के 10.82 प्रतिशत हिस्सेदारी पहले से ही है.

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आईडीबीआई बैंक पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक रहा है. जिसका घाटा बढ़कर 5,663 करोड़ रुपए हो गया और एनपीए बढ़कर 55,588.26 करोड़ रुपए हो गया है. इस बैंक के खराब कर्ज का अनुपात करीब 28 फीसदी है, जो सर्वाधिक है.अब आप बताइए कि इस डूबते हुए बैंक को एलआईसी क्यों उबारे ? जब आईडीबीआई में  एलआईसी की बड़ी हिस्सेदारी खरीदने पर सेबी के पूर्व चेयरमैन एम दामोदरन से पूछा गया  तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि इससे ना तो एलआईसी को फायदा होगा ना ही आईडीबीआई बैंक को.

उन्होंने आगे कहा कि एलआईसी, आईडीबीआई बैंक के बजाय कॉरपोरेशन बैंक में हिस्सा क्यों नहीं बढ़ाती ? कॉरपोरेशन बैंक में एलआईसी सरकार के बाद सबसे बड़ी निवेशक है और कॉरपोरेशन बैंक काफी समय से खराब प्रदर्शन कर रहा है. यदि मदद की बात है तो कारपोरेशन बैंक में क्या बुराई है ?

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मोदी सरकार ने एलआईसी पर पहली बार ही दबाव बनाया हो. इससे पहले 2016 में एलआईसी के चेयरमैन एस के राय ने पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से करीब दो साल पहले ही अपना इस्तीफा मोदी सरकार को दे दिया था. एलआईसी के इतिहास में इससे पहले किसी चेयरमैन ने अपना समय पूरा होने से पहले इस्तीफा नहीं दिया था.  स्पष्ट बात थी कि एलआईसी पर इसी तरह के घाटे वाले सौदे करने पर दबाव बनाया जा रहा था और यह दबाव राय साहब झेल नहीं पाए.

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जब भी मोदी सरकार अपने आपको वित्तीय संकट में घिरा हुआ पाती है, तो उसे एलआईसी की याद आती है. आपको याद होगा कि वित्तमंत्री जेटली ने सरकारी बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपए की पूंजी डालने की योजना बनाई थी. बांड बेचकर पैसा जुटाने की योजना में भी एलआईसी को शामिल किया गया था.

उससे पहले यह भी खबर आयी थी कि मोदी सरकार एयर इंडिया में केंद्र सरकार के शेष शेयर को एलआईसी तथा अन्य सरकारी बीमा कंपनियों को बेचने की योजना बना रही है.

दरअसल, सच्चाई यह है कि एलआईसी की माली हालत जितनी मजबूत दिखती है, उतनी है नहीं.  एलआईसी ने ऐसी कई कंपनियों में निवेश किया है जो दिवालिया होने की कगार पर खड़ी है या जिन पर दिवालिया कानून के तहत मुकदमा चल रहा है.  इस सूची में आलोक इंडस्ट्रीज, एबीजी शिपयार्ड, अम्टेक ऑटो, मंधाना इंडस्ट्रीज, जेपी इंफ्राटेक, ज्योति स्ट्रक्चर्स, रेनबो पेपर्स और ऑर्किड फार्मा जैसे नाम शामिल हैं. गीतांजलि जेम्स और वीडियोकॉन में भी एलआईसी ने निवेश किया हुआ है.

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बताया जाता है कि इनमें से ज्यादातर कंपनियों की वैल्यू अपने सर्वोच्च स्तर से 95 फीसदी से अधिक घट चुकी है, लिहाजा इनकी वैल्यू में गिरावट का असर एलआईसी के पोर्टफोलियो पर भी पड़ रहा है.

2017 के आखिरी महीनों में यह तथ्य जब सामने आये तो एलआईसी के प्रबंधक निदेशक हेमंत भार्गव ने इस बाबत कंपनी का बचाव करते हुए कहा कि बीते तीन सालों में हमने काफी सोच-विचार के बाद सिर्फ बीएसई टॉप 200 कंपनियों में ही निवेश का फैसला किया है. अब आईडीबीआई बैंक कब से टॉप 200 कंपनियों में शामिल हो गयी है. यह राज की बातें मोदी जी के परम ज्ञानी अर्थशास्त्री गोयल साहब और जेटली जी ही बता सकते हैं.

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मूल बात यह है कि जिस भी देश में इस तरह के आर्थिक संकट आये हैं, सबसे पहले वहां का इंश्योरेंस सेक्टर ही तबाह हुआ है. एलआईसी इस देश में भरोसे का एक प्रतीक रही है. उसके पास कुल 29.02 करोड़ व्यक्तिगत पॉलिसी और 12 लाख समूह पॉलिसी का प्रबंधन है.  वह पॉलिसी धारकों को समय- समय पर बोनस का भुगतान करता है. यदि इस तरह से उस पर गलत पोर्टफोलियो में निवेश के लिए दबाव बनाया जाता रहा, तो यह बिल्कुल संभव है कि आप और हम जैसे लोग, सालों से की जा रही अपनी बचत से हाथ धो बैठे.

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