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कहीं इतिहास न बन जाये कैथी लिपि, चंद लोग ही हैं जानकार

Praveen Munda

Ranchi :  अधिवक्ता बंशी बाबू, अधिवक्ता बख्शी अयोध्या प्रसाद, रातू रोड निवासी गिरिजानंदन प्रसाद, अंबिका प्रसाद, पिस्कामोड़ निवासी महेश नंदन प्रसाद, कचहरी में बैठनेवाले प्रो रामलाल साहू, कैलाश वर्मा और गिरिडीह निवासी बिंदेश्वरी प्रसाद. ये उन चंद लोगों में शामिल हैं, जो कैथी लिपि के जानकार हैं. इन नामों की फेहरिस्त में शायद कुछ और इजाफा हो जाये, मगर यह हकीकत है कि पूरे राज्य में गिने-चुने लोग ही हैं, जो इस लिपि को पढ़ सकते हैं. लिखनेवालों की तादाद तो और भी कम है. इसे ‘कयथी’ या ‘कायस्थी’ के नाम से भी जाना जाता है.

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पुराने बार भवन में रामलाल साहू और कैलाश वर्मा करते हैं अनुवाद

रांची के पुराने बार भवन के तंग और सीलन भरे गलियारों से होकर उस बरामदे में पहुंचा जा सकता है, जहां पर आप प्रो रामलाल साहू और कैलाश वर्मा को टाइप करते देख सकते हैं. इनके बैठने की जगह पर दीवार में टंगी छोटी तख्तियों पर लिखा हुआ है ‘यहां कैथी पढ़ी जाती है’. इन दोनों के पास आज राज्य के अलग-अलग हिस्से से कैथी में लिखे पुराने दस्तावेजों को पढ़वाने के लिए लोग आते हैं. दोनों विशेष तरह के मैग्नीफाइंग ग्लास, जिसमें लाइट लगी होती है, से दस्तावेजों को पढ़ते हैं और फिर उसे हिंदी में टाइप कर अपने क्लाइंट को सौंपते हैं.

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राज्य के कई हिस्सों से आते हैं दस्तावेजों को पढ़वाने

प्रो रामलाल साहू और कैलाश वर्मा का रोजगार तो कैथी से हिंदी में अनुवाद करना ही है. दोनों 1970 के दशक से यह काम कर रहे हैं. प्रो रामलाह साहू बताते हैं कि वह 1974 से कचहरी में बैठकर यह काम कर रहे हैं. रांची के अलावा अन्य जिलों से भी लोग उनके पास आते हैं. उनका कहना है कि कैथी लिपि के जानकार अब गिने-चुने लोग ही हैं. इस लिपि को जाननेवाले अब बहुत कम रह गये हैं. नयी पीढ़ी को इसमें रुचि नहीं है. ऐसा प्रतीत होता है कि बहुत जल्द अब यह लिपि खत्म हो जायेगी.

सोलहवीं सदी से हो रहा कैथी का इस्तेमाल

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा झारखंड प्रदेश के अध्यक्ष और अधिवक्ता प्रणव कुमार बब्बू कहते हैं कि कैथी का प्रचलन काफी पहले से हो रहा है, पर सोलहवीं सदी में मुगलों के समय में कचहरियों में इसका काफी इस्तेमाल हुआ. कचहरी में लिखने-पढ़ने का काम कायस्थ लोग करते थे और माना जाता है कि इस लिपि का विकास उनके द्वारा ही किया गया था. इस लिपि में हिंदी, उर्दू, फारसी और संस्कृत के शब्दों का प्रयोग किया गया था. पुराने दस्तावेजों, जमीन की रजिस्ट्री (केवाला) और अन्य सरकारी दस्तावेजों को लिखने में इसका इस्तेमाल होता रहा है. इसकी विशेषता यह है कि इसमें ऊपर की ओर लकीर नहीं दी जाती है. यह लिखने की एक संक्षिप्त विधि है.

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बिहार में कैथी लिपि में ही तंत्र-मंत्र की किताबें भी लिखी गयीं

बिहार के बीएल दास बताते हैं कि बिहार में कैथी लिपि में ही तंत्र-मंत्र की किताबें भी लिखी गयीं. 1917 में चंपारण आंदोलन के दौरान राजकुमार शुक्ल नामक व्यक्ति ने महात्मा गांधी के साथ कैथी में पत्राचार किया था. अभी भी बड़ी संख्या में पुराने दस्तावेज कैथी लिपि में ही उपलब्ध हैं. इसलिए कैथी लिपि के जानकारों का होना आवश्यक है.

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