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जानें भ्रष्टाचार के उन छह मामलों को जो बिजली वितरण निगम के एमडी राहुल पुरवार के समय हुए

Ranchi :  एक तरफ जीरो टॉलरेंस व बेदाग सरकार की बात और दूसरी तरफ आरोप, घोटाले, कर्जदारों की लंबी सूची के साथ घाटा. यह सब झारखंड राज्य बिजली वितरण निगम (जेबीवीएनएल) में हो रहा है. मुख्यमंत्री रघुवर दास के पास ही उर्जा विभाग भी है. वरिष्ठ आईएएस राहुल पुरवार करीब चार सालों से निगम के एमडी हैं. वितरण निगम में गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने में एमडी की चुप्पी गंभीर है. निगम में भ्रष्टाचार के जो मामले सामने आयें, उसकी न तो सही तरीके से जांच हुई और न ही अफसरों पर कार्रवाई हुई. राजस्व वसूली भी कमजोर हुई. कर्ज भी चुकता नहीं हो रहा है और घाटा भी दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है.

हम यहां बिजली वितरण निगम में हुए भ्रष्टाचार व गड़बड़ियों के छह मामलों का उल्लेख कर रहे हैं. जिन मामलों में विभाग ने या तो कार्रवाई नहीं की या की भी तो बहुत समय बीतने के बाद. जिसके कारण निगम के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. और सरकार को इस पर ध्यान ही नहीं है.

उल्लेखनीय है कि झारखंड सरकार की कंपनी बिजली वितरण निगम का 103 करोड़ का ओवरड्राफ्ट हो गया. सरकार से 290 करोड़ रुपया लोन लिया. जिसका ब्याज ही अब 370 करोड़ रुपया हो गया है. वहीं कंपनी पर 843 करोड़ रुपये का सरकारी लोन भी है. साथ ही बिजली कंपनियों का करीब 8011 करोड़ का बकाया हो गया है.

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पहला मामलाः 15 करोड़ का टीडीएस घोटाला

महालेखाकार ने 30 जुलाई 2015 को उमेश कुमार के प्रमोशन को लेकर आपत्ति जतायी थी. 10 नवंबर 2016 को प्रमोशन देने की जांच के लिए पांच सदस्यीय कमेटी बनायी गयी. कमेटी ने महालेखाकार की रिपोर्ट को सही ठहराया और निष्कर्ष दिया कि उन्हें डिमोट किया था. यह राहुल पुरवार के कार्यकाल में हुआ. उमेश कुमार वही अधिकारी हैं, जिनपर बिजली बोर्ड में टीडीएस घोटाले का आरोप है. टीडीएस घोटाला 15 करोड़ का है. आरोप है कि निगम के एमडी राहुल पुरवार ने उमेश कुमार को संरक्षण भी दिया. न्यूज विंग द्वारा लगातार खबरें प्रकाशित करने के बाद गलत तरीके से मिले प्रमोशन के मामले में दोषी उमेश कुमार को डिमोट किया गया.

दूसरा मामलाः बिजली खरीद की दर का सवाल

खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास ने समीक्षा बैठक में बिजली खरीद की दर की जांच करने को कहा था. सीएम ने बिजली वितरण निगम के एमडी राहुल पुरवार से पूछा था कि जब आधुनिक पावर से 3.60 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदी जा रही है, तो इनलैंड पावर से 4.05 रुपये प्रति यूनिट की दर से क्यों खरीदी जा रही है. पूरा निगोसिएट कर बतायें. अब तक सरकार को इसका जवाब नहीं मिला है.

तीसरा मामलाः बिजली खरीद पर सीएजी की आपत्ति 

इनलैंड पावर से बिजली खरीद के एग्रीमेंट पर सीएजी ने भी आपत्ति जताई है. लेकिन इसका जवाब अब तक बिजली कंपनी ने नहीं दिया. पूछने पर अफसर बताते हैं कि इसपर डॉक्यूमेंट तैयार किया जा रहा है. नियम यह है कि किसी भी पावर प्लांट से 25 फीसदी बिजली के लिए ही पीपीए हो सकता है. जबकि बिजली बोर्ड के अफसरों ने शत-प्रतिशत बिजली के लिए एग्रीमेंट कर लिया. पीपीए के मुताबिक 63 मेगावाट में से 16 मेगावाट ही बिजली मिल सकती है.

चौथा मामलाः शब्दों से खेलकर 02 करोड़ को 22 करोड़ बना दिया

दूसरा बड़ा घोटाला सिकिदिरी हाइडल के जीर्णोद्धार में हुआ. इसमें शब्दों से खेल कर दो करोड़ को 22 करोड़ बना दिया गया. इसकी सीबीआई जांच चल रही है. एक दर्जन से अधिक अफसरों से पूछताछ हो चुकी है. इस मामले में पूर्व सीएमडी एसएन वर्मा को हटाया गया. अब तक कार्रवाई नहीं. काफी दिनों तक राहुल पुरवार उत्पादन के एमडी के प्रभार में रहें.

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पांचवां मामलाः उद्योगों को अवैध बिजली देकर अफसरों ने काटी चांदी

जमशेदपुर में अवैध बिजली देकर खूब कमाने-खाने का खेल चला. जमशेदपुर में बिजली बोर्ड के अफसर गलत तरीके से उद्योगों को बिजली दे रहे थे. इसपर चार करोड़ रुपये का घोटाला किया गया. मीटर की जांच भोपाल में कराई गई. जांच में पाया गया कि मीटर में छेड़-छाड़ कर कमाने-खाने का खेल चला. लेकिन अब तक दोषी अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.

छठा मामलाः स्मार्ट मीटरिंग के नाम पर हुआ खेल

झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल) ने स्मार्ट मीटरिंग के लिए टेंडर निकाला था. इसमें सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) के दिशा-निर्देशों को नजरअंदाज दिया गया. निगम ने लगभग 60 करोड़ के टेंडर में हिस्सा लेने के लिए बिडर्स की वित्तीय क्षमता 400 करोड़ रखा था. ऐसा खास कंपनी को ठेका दिलाने के लिये किया गया था. दिल्ली के मनीष भटनागर ने झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड के तत्कालीन चेयरमैन नितिन मदन कुलकर्णी से इसकी शिकायत की.  शिकायतकर्ता ने कहा है कि जेबीवीएनएल के शीर्ष अधिकारियों ने चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए स्मार्ट मीटर आपूर्ति के लिए जो टर्न ओवर तय किया है, वो सीवीसी के गाइडलाइन के विरुद्ध है. इस पर मामले पर भी कोई कार्रवाई नहीं.

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