न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

मुस्लिमों का नेतृत्व आज भी धार्मिक गुरुओं के हाथ में है

2,134

MZ KHAN

 

MZ Khan

आज देश का मुस्लिम नेतृत्व मुसलमानों की मआशी (आर्थिक) बदहाली के लिए न तो चिंतित है और न कोई कारगर कदम ही उठा रहा है. सच्चर की रिपोर्ट इन्हें अन्य धार्मिक समूहों से बदतर की हालत में देखती है. ये आदिवासियों और दलितों के आस-पास हैं. इसमे शक नहीं कि आज मुसलमानों का नेतृत्व धार्मिक गुरुओं के हाथ में है. जो, भावनात्मक मुद्दों की ओर इन्हें  हांकता है और ये आंख बंद किये हुए उधर चल पड़ते हैं. और इस नेतृत्व को ऊर्जा भी राजनीति की उस श्रोत से मिलती है, जो कभी नहीं चाहता है कि स्थिति बदले. पर्सनल लॉ, उर्दू, धार्मिक पहचान, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी आदि मुद्दों के हेसार से बाहर आने ही नहीं देता. आज का मुसलमान जज़्बाती तौर पर इस धार्मिक नेतृत्व के प्रभाव में है.
न तो ये अपने रोज़गार की लड़ाई सड़कों पे उतर कर लड़ने की कोशिश करता है और न शिक्षा, स्वास्थ्य, मंहगाई के आंदोलनों का हिस्सा बनता है. ये बड़ी त्रासदी है. आज़ादी के बाद मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए कई आयोग और कमेटियों का गठन किया गया लेकिन स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है.
1953 ने पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू ने कहा था,”सामान्य तौर पर कहा जाये तो सेवाओं में अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व घट रहा है  और कुछ मामलों में अत्यंत खराब है. आंकड़ों को देखकर  मुझे काफी दुख होता है कि अल्पसंख्यकों और मुख्यतः मुस्लिमों की स्थिति अत्यंत ख़राब है. हमारी रक्षा  सेवाओं में मुश्किल से कुछ मुस्लिम बचे  हैं.”
एक साल बाद 1954 में मुख्यमंत्रियों की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था ,”मुस्लिमों में गहरी हताशा है. वे महसूस करते हैं कि रक्षा, पुलिस और नागरिक सेवाएं उनके नहीं हैं अर्थात वे इन सेवाओं में भर्ती नहीं हो सकते हैं.”
आज भी स्थिति में बदलाव नही हुआ है. सरकारी सेवाओं में इनकी उपस्थिति 3-4%के आस-पास है.  अल्पसंख्यकों के अधिकारों से संबंधित संयुक्त राष्ट्रसंघ की उद्घोषणा कहती है कि राष्ट्रीय, जातीय, धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करना और उसे बढ़ावा देना, उस देश की राजनीतिक एवं सामाजिक स्थिरता को सुनिश्चित करता है. इसका अर्थ ये है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करना सभी देशों की सरकारों का संवैधानिक दायित्व है. यदि वे आर्थिक रूप से पिछड़ रहे हों तो उन्हें विशेष सुविधा देकर मुख्यधारा में शामिल करना सरकार की ज़िम्मेदारी है.
आज का मुस्लिम हताशा में जी रहा है. एक तरफ़ आर्थिक तंगी है, न नौकरी है और न रोज़गार और दूसरी तऱफ दहशतगर्दी के दंश से भी जूझ रहा है. डर डर कर दहशत में जीना जैसे नियति सा बन गया हो. देश की एक बड़ी आबादी अगर इस हाल में है तो देश की खुशहाली और तरक़्क़ी की उम्मीद कैसे की जाये.
1965 में इंद्र मल्होत्रा ने प्रकाशित अपने एक दस्तावेज़ में रोजगार के क्षेत्रों में मुस्लिमों के घटते प्रतिनिधित्व पर दुख व्यक्त किया था. अपने प्रमाण में कई सरकारी संस्थानों में इनकी घटती नुमाइंदगी का ब्योरा दिया था. इस स्थिति के लिए  अमेरिकी पत्रकार जोसेफ लेलीवेल्ड ने अपनी रिपोर्ट में मुस्लिमों के गिरते  मनोबल और उनके साथ हो रहे खुले भेदभाव को ज़िम्मेदार ठहराया था.
मंत्रियों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ेः 1971 में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री रामनिवास मिर्धा ने लोकसभा को सूचित किया था कि केंद्रीय सचिवालय में इनकी नुमाइंदगी नगण्य थी.
मोइनुल हक़, पूर्व मंत्री ने मार्च 1971 में लोकसभा को सूचित किया था कि रेलवे में इनकी भागीदारी 2.4% और परिवहन में 1% से भी कम थी.
गोपाल सिंह आयोगः 1980; ये पैनल इंदिरा सरकार ने 1980 में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों की आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए गठन किया था. इस पैनल द्वारा जमा की गई जानकारी चौकाने वाली थी. इसके अनुसार  मुस्लिमों  की आर्थिक स्थिति  अनुसूचित जाति से भी खराब थी. रिपोर्ट की संवेदनशीलता को देखते हुए  न तो इसे इंदिरा गांधी की सरकार और न राजीव गांधी की सरकार ने लोकसभा में पेश किया.
आयोग के अध्यक्ष गोपाल सिंह के देहांत के बाद इसे 24 अगस्त 1990 को लोकसभा में पेश किया था, जिसे उस समय की तत्कालीन सरकार ने आयोग की सभी महत्वपूर्ण सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया.
सुरेंद्र नवलाखा का अध्ययनः इस अध्ययन में स्पष्ट किया गया था कि रोज़गार की सभी श्रेणियों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व 4%से भी कम था. सारे अध्ययन मुस्लिमों की बदहाली की दास्तान कहते हैं.लेकिन अफसोसनाक बात ये है कि इन पर अबतक कोई कार्यवाई नहीं हुई. यूपीए सरकार ने 9 मई 2005 को डॉ राजेन्द्र सिंह  सच्चर की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय कमेटी का गठन मुसलमानों की आर्थिक,सामाजिक,शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन करने के लिये किया.

WH MART 1

(ये लेखक के  निजी विचार हैं)

इसे भी पढ़ेंः मीटू कैंपेन को धार देने के लिए फिशआई ने जारी किया एक मिनट का वीडियो

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

kohinoor_add

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like