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संथाल विद्रोह के नायक सिदो-कान्हू को समर्पित है हूल दिवस : विनोद उरांव

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Latehar :  वासा ओडा लातेहार में अनुसूचित जाति/ जनजाति एकता मंच हुल दिवस मनाया गया. जिसकी अध्यक्षता मंच के श्री सुकू उरांव जी ने किया और मंच संचालन श्री सुरेन्द उरांव ने किया. विस्तृत रूप से हुल दिवस के विषय मे विभिन्न वक्ताओं ने विचार दिए. जिससे मुख्य अतिथि श्री विनोद उरांव जिला परिषद पूर्वी झारखण्ड आंदोलन कारी बिरसा मुंडा जी, समाज सेवी लालमोहन सिंह जी अनुसूचित जाति /जनजाति एकता मंच के मीडिया प्रभारी साजन कुमार उपस्थित थे. मौके पर जिला परिषद सदस्य श्री विनोद उरांव ने कहा कि भारत देश में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के ठीक दो वर्ष पूर्व हूल क्रांति का हूलगुलान किया गया जिसका नेतृत्व वीर शहीद सिदो कान्हू, चांद, भैरव आदिवासियों  दलितों के साथ अंग्रेजों द्वारा शोषण अत्याचार और जमीन हड़पने के खिलाप विद्रोह किया. झारखंड वह क्ष्‍ेात्र है जहां की आदिवासियों ने सबसे ज्यादा संघर्ष किया. झारखंड आंदोलनकारी सह अधिवक्ता श्री बिरसा मुंडा ने कहा कि अगर अंग्रेजों के खिलाफ, जमींदारों के खिलाफ, शोषकों के खिलाफ किसी समुदाय ने सबसे ज्यादा सशस्त्र संघर्ष किया, शहादत दी तो वे झारखंड के क्षेत्र आदिवासी थे. मौके पर अखिल झारखंड खरवार जनजाति विकास परिषद के केन्द्रीय महासचिव लालमोहन सिंह ने कहा कि 30 जून 1855 को संथाल परगना के भोगनाडीह में सिदो ,कान्हू, चांंद और भैरव नामक चार भाइयों ने दस हजार संथालों के साथ संघर्ष का बिगुल फूंका था इसे देश संथाल हूल के नाम से जाना जाता है. इसी लिए हम समाज के एससी, एसटी एकता मंच के द्वारा हम अपने हक अधिकार लेने के लिए हम सभी को जागरूक होना होगा. साजन कुमार ने भी मंच में उपस्थित लोगों को उत्साहित किया.

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भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के संबंध में न केवल भारतीय इतिहासकारों ने लिखा है बल्कि विदेशी ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी इसे त्वज्जों दी है. कहा जाता है कि भारत में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल 1857 में फूंका गया था बैरकपुर में मंगल पांडे द्वारा हथियार उठाने की घटना को इतिहासकारों में प्रथम सैन्य विद्रोह के रूप में मान्यता भी दे रखी है,  हालांकि कई इतिहासकरों का यह भी मत है कि अंग्रेजों के खिलाफ 1857 से पहले भी विद्रोह की घटनाएं हो चुकी थी इन विद्रोह में आदिवासियों की बड़ी भूमिका रही थी यह अलग बात है कि विद्रोह की इन घटनाओं को बड़े पैमाने पर इतिहासकारों ने नजरअंदाज किया था बस 1855  में मुर्शिदाबाद तथा भागलपुर जिले में अंग्रेज कर्मचारियों ने सरकार के अत्याचार से तंग आकर संथाल के सिदो कान्हू के नेतृत्व में आदिवासियों ने एक होकर आंदोलन की शुरुआत की थी. इस कार्यक्रम में मोहन भुइयां, राजेश उरांव, गणेश भगत, श्रवण पासवान, युगेश्वर राम, छठु उरांव, नरेन्द्र राम,  विनोद राम समेत कई लोग उपस्थित थे.

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